#NPR पर आखिर क्यों चुप हैं नीतीश कुमार: कविता कृष्णन


यदि एनआरसी के खिलाफ हैं तो एनपीआर के भी खिलाफ में बोलना होगा.
जेएनयू पर हमला लोकतांत्रिक आंदोलनों के पक्ष में उठी आवाज को कुचलने की कोशिश
दंगा फैलाने की कोशिशों के खिलाफ आम नागरिकों से विरोध में उतरने की अपील.
8 जनवरी के देशव्यापी हड़ताल और संपूर्ण भारत बंद को ऐतिहासिक बना दें

पटना 6 जनवरी 2020
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार यदि एनआरसी के खिलाफ हैं तो वे एनपीआर पर क्यों चुपी साधे हुए हैं? ऐसे सीएए के सवाल पर नीतीश जी का पोजीशन हम सबने देख लिया है और उनकी तथाकथित धर्मनिरपेक्षता की पूरी तरह पोल खुल चुकी है. यदि आप एनआरसी के खिलाफ हैं तो आपको एनपीआर के भी खिलाफ होना होगा. उपर्युक्त बातें आज पटना में संवाददाता सम्मेलन को संबोधित करते हुए भाकपा-माले की पोलित ब्यूरो सदस्य व देश की चर्चित महिला नेत्री कविता कृष्णन ने कही. संवाददता सम्मेलन में भाकपा-माले राज्य सचिव कुणाल और ऐपवा की महासचिव मीना तिवारी भी उपस्थित थे.


उन्होंने आगे कहा कि वाजपेयी सरकार द्वारा पारित 2003 के कानून के हिसाब से यूपीए सरकार ने एनपीआर बनवायी थी. यह उसकी गलती थी. लेकिन उसके बाद उसने न तो एनआरसी बनाया, और न ही सांप्रदायिक मंसूबों से भरा कोई नागरिकता संशोधन कानून पास करवाया. यह कानून भाजपा की सरकार कर रही है.
इस बार एनपीआर के फाॅर्म में एक अलग से काॅलम जोड़ा गया है जिसमें माता-पिता के जन्म की तारीख भरनी होगी. इससे साफ है कि इसके जरिए ‘संदिग्ध नागरिकों’ की पहचान की जाएगी और एनआरसी के दौरान उनसे दस्तावेज मांगें जायेंगें. यदि माता-पिता का जन्म स्थान और जन्म तिथि जरूरी नहीं है तो फिर एनपीआर के जरिए यह डाटा क्यों इकट्ठा किया जा रहा है? इस मामले में सरकार द्वारा जारी किया स्पष्टीकरण माता-पिता के जन्म संबंधी दस्तावेज मांगने के बारे में झूल बोल रहा है.


यह पूरी प्रक्रिया मनमानी है. किसी को ‘संदिग्ध नागरिक’ घोषित करने के बारे में कोई दिशा-निर्देश नहीं है. इसका मतलब है कि इसमें भ्रष्टाचार की बड़ी गंुजाइश है. कोई स्थानीय अधिकारी किसी को भी ‘संदिग्ध’ घोषित कर सकता है और ‘संदिग्ध’ न घोषित करने के लिए घूस मांग सकता है. जाति, जेंडर, लैंगिकता और राजनीतिक विचारधारा के चलते किसी को भी ‘संदिग्ध’ घोषित किया जा सकता है. कोई सांप्रदायिक संगठन किसी पूरे धार्मिक अल्पसंख्यक समुदाय को ‘संदिग्ध’ कहकर रिपोर्ट कर सकता है. जगनणना में तो ऐसा कोई प्रावधान नहीं होता. इसलिए एनपीआर बिलकुल ही अलग चीज है. इसलिए यह एनपीआर गरीबों व वंचित समुदाय के खिलाफ है और भ्रष्टाचार का दरवाजा खोलने वाला है. एनपीआर के जरिए प्राप्त आंकड़ा सत्ता में बैठी पार्टी की पहुंच में होगी और यह भारतीय लोकतंत्र के सेहत के लिए बहुत खतरनाक होगा.


एनपीआर का काम एनआरसी को रोकना नहीं है बल्कि एनआरसी व सीएए के लिए आधार तैयार करना है, इसलिए नीतीश कुमार को इस महत्वपूर्ण सवाल पर बोलना चाहिए और इसका विरोध करना चाहिए. हम मांग करते हैं कि बिहार में इसे लागू नहीं किया जाए.


जेएनयू के छात्र आंदोलन पर सत्ता संरक्षित एबीवीपी के गंुडों द्वारा हमला बेहद निंदनीय है. भाजपा सरकार सोच रही है कि देश की जनता को अलग-अलग मोर्चे पर बांट दिया जाएगा, लेकिन आज देश के छात्र-युवा सीएए, एनआरसी, एनपीआर के खिलाफ शिक्षा और अपने अन्य महत्वपूर्ण सवालों पर सड़कों पर उतर चुके हैं. यह लड़ाई अब रूकने वाली नहीं है.


8 जनवरी को मजदूर व किसान संगठनों के आह्वान पर मंदी, बेरोजगारी, सार्वजनिक इकाइयों के निजीकरण के खिलाफ आयोजित आम हड़ताल में भी इन मुद्दों को प्रमुखता से उठाया जाएगा. देश के मजदूर-किसान, छात्र-नौजवान, अल्पसंख्यक समुदाय सब मिलकर तानाशाही के खिलाफ लोकतंत्र के पक्ष में सड़कों पर उतर चुके हैं. मोदी-अमित शाह की तानाशाही को अब यह देश बर्दाश्त नहीं करने वाला है. जेएनयू, जामिया, अलीगढ़ और देश के दूसरे अन्य विश्वविद्यालयों से लेकर खेत-खलिहानों व कारखानों में चलने वाली लड़ाई एकताबद्ध हो रही है, और मोदी-अमित शाह को पीछे हटने के लिए बाध्य करेगी. 21 दिसंबर के बिहार बंद के दौरान फुलवारी शरीफ में संघियों के हमले में मारा गया अमीर हंजला न केवल नौजवान था, बल्कि मजदूरी करके अपने परिवार का भरण-पोषण कर रहा था. जाहिर है कि आज हर तबका संघर्ष के मैदान में उतर गया है.

विरोध आंदोलनों पर हमला करने वाले और दंगा की साजिश रचने वाले लोगों को हम सब अच्छी तरह जानते हैं. दंगाइयों को चिन्हित करके उनका सामाजिक बहिष्कार करना होगा. बिहार की जनता से अपील है कि वे दंगा फैलाने वाली ताकतों से सावधान रहें, ऐसी ताकतों को हतोत्साहित करें, उनका विरोध करें और जनता की बन रही एकता को किसी भी कीमत पर टूटने नहीं दें.

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