‘भय दिखाकर शासन’ का कुचक्र बनाम ‘भय-मुक्ति’ का अधिकार

सम्पादकीय

इधर अर्थतंत्र गहरे संकट में फंसा हो और उधर सरकार दमनचक्र चला रही हो – आधुनिक इतिहास हमें बताता है कि ऐसा खतरनाक सम्मिश्रण अकसर कई देशों में लोकतंत्र पर ग्रहण लगने का पूर्वसंकेत होता है. 2017 में भारत ठीक इसी किस्म के विनाशकारी मोड़ पर खड़ा है.

सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि की दर, वह आंकड़ा जिसके महत्व को अक्सर सत्ताधारी राजनीतिज्ञ और सत्ता-प्रतिष्ठान के भरोसेमंद अर्थशास्त्र बहुत बढ़ा-चढ़ाकर दिखाते रहते हैं, अब लगातार पिछली चार तिमाहियों के दौरान क्रमागत रूप से घटता जा रहा है. पिछली तिमाही (जो नोटबंदी के बाद की पहली तिमाही थी) में वह 6.1 प्रतिशत पर पहुंच गया, और इसे देखते हुए भारतीय अर्थतंत्र चीनी अर्थतंत्र की तुलना में उल्लेखनीय रूप से पीछे रह गया, क्योंकि चीन के सकल घरेलू उत्पाद में इस दौर में 6.9 प्रतिशत की दर से वृद्धि हुई. इस प्रकार, भाजपा नेतागण बड़े फख्र से जो डींग हांकते हैं कि भारत ‘सबसे तेज गति से वृद्धि करने वाला अर्थतंत्र है’, उस दावे की धज्जियां उड़ गई हैं. वित्तीय वर्ष 2016-17 में प्रति व्यक्ति आय की वृद्धि दर (वास्तविक मूल्यों में) पिछले साल के 6.8 प्रतिशत की तुलना में घटकर महज 5.7 प्रतिशत रह गई है.

रोजगार के अवसरों का सृजन तो अब तक के बदतरीन हालात में पहुंच गया है, जहां इन्‍फार्मेशन टेक्नालॉजी क्षेत्र में अब सभी कम्पनियों में भारी पैमाने पर छंटनी हो रही है. सरकार उपरोक्त संकट की महज कुछेक फर्जी व्याख्याएं पेश कर सकती है – मसलन, उसका कहना है कि काला धन का सफाया होने की वजह से सकल घरेलू उत्पाद की दर में कमी आई है, या फिर रोजगार के अवसरों की बढ़ती किल्लत को सरकार ‘स्वैच्छिक बेरोजगारी’ कहकर उड़ा दे रही है – लेकिन वह परिस्थिति में सुधार करने लायक कोई कदम नहीं उठा रही है.

इसी बीच सरकार हर सम्भव तरीके से जनता में विघटन पैदा करने और असहमति का दमन करने की पुरजोर कोशिश कर रही है. मई 2014 में भाजपा के सत्ता में आने के तुरंत बाद हमने देखा कि देश में तथाकथित गौरक्षक गुंडा-गिरोह अचानक कुकुरमुत्तों की तरह उग आये. दादरी से लेकर लातेहार तक और ऊना से लेकर अलवर तक हमने देखा कि ये गिरोह सजा से बेखौफ होकर, कभी-कभी रात में मगर अक्सर दिन-दहाड़े, लोगों की पिटाई और पीट-पीटकर हत्या तक करने लगे. उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्र बनने के बाद तो राज्य ने खुलेआम इन गौरक्षक गिरोहों के पक्ष में खड़ा होना शुरू किया और राज्य के आतंकवाद के भगवाकरण की ताजातरीन धारा के बतौर गौ-आतंकवाद को वैध करार दिया. ‘अवैध’ बूचड़खानों को बंद करने के नाम पर उत्तर प्रदेश में तो वस्तुतः मांस की खरीद-बिक्री पर ही पाबंदी लग गई है. और अब केन्द्र सरकार ने भी इसमें कोर-कसर न छोड़ते हुए समूचे देश में पशुओं के व्यापार पर बड़े सख्त प्रतिबंध लगाने का आदेश जारी कर दिया है.

पशुओं के व्यापार पर प्रतिबंध का आदेश केन्द्र सरकार के पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा जारी किया गया है और इसमें बहाना बनाया गया है पशुओं के प्रति निर्दयतापूर्ण आचरण को रोकने तथा पशुधन के बाजारों के नियमन का. इस आदेश में कहा गया है कि पशुओं की खरीद-बिक्री केवल वैध दस्तावेजी सबूत के साथ ही हो सकती है, जिससे साबित होता हो कि इस पशु का इस्तेमाल केवल खेती में किया जायेगा. यह न्यायिक तौर पर वैध स्थापित प्रथा के खिलाफ है, जो यह मानती है कि जो पशु दुधारू न रहे और जिसे सामान ढोने के काम में भी न लाया जा सकता हो उसे वध के लिये बूचड़खाने में बेचा जा सकता है. मौजूदा हालात में यह प्रतिबंध चुनिंदा समुदायों को क्षति पहुंचाने के लिये है क्योंकि मांस का निर्यात करने वाली कम्पनियों के बड़े बूचड़खानों में तो पशु-वध बेरोकटोक जारी रहेगा मगर केवल गरीब लोग, जो अधिकांशतः दलित और मुसलमान हैं, जो मांस का उत्पादन और बिक्री करके अपनी गुजर-बसर करते हैं या फिर चमड़ा व जूता उद्योग या टैनरीज में काम करते हैं, इस प्रतिबंध की बुरी तरह से मार झेलेंगे. गरीब लोगों को अपनी खुराक में प्रोटीन के सबसे बड़े और सस्ते स्रोत से वंचित होना पड़ेगा तथा पशुधन आधारित अर्थतंत्र पर निर्भर करने वाले किसानों को भी इससे भारी नुकसान झेलना पड़ेगा. फिर भी भाजपा जोर-जबर्दस्ती अपने साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण और ब्राह्मणवादी वर्चस्व के एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिये यह प्रतिबंध येन-केन-प्रकारेण लादने पर आमादा है.

और इस एजेंडा को लादने के लिये सरकार डंडे के जोर पर शासन चलाने की कोशिश कर रही है. लगभग रोजाना हमारे सामने ऐसे तमाम उदाहरण आते हैं कि मंत्रियों एवं अधिकारियों ने शासन के नाम पर डराने-धमकाने की कोशिश की है. कश्मीर में हमने देखा कि सेना की जीप के सामने एक बेकसूर आदमी को बांधकर घुमाया गया. मानवीय मर्यादा का उल्लंघन करने वाली इस शर्मनाक घटना को अंजाम देने के पीछे जिस शातिर का दिमाग था, उस मेजर लीटुल गोगोइ को थल सेनाध्यक्ष ने विद्रोह-दमन की कार्यवाही में उनके ‘लगातार प्रयासों’ के लिये ‘प्रशंसा पत्र’ दिया है. और जब इस विषय पर बहस तीखी हो गई तो थल सेनाध्यक्ष ने फ्भय पैदा करनेय् के सिद्धांत का सहारा लेते हुए एक सार्वजनिक वक्तव्य जारी किया.

जब इतिहासकार पार्थ चटर्जी ने इस घटना का चित्रण भारतीय सेना में ‘जनरल डायर का कारनामा’ के बतौर किया, जिसमें उन्होंने जलियांवाला बाग हत्याकांड के समर्थन में ब्रिटिश सेना के कुख्यात ब्रिगेडियर जनरल रेजिनाल्ड डायर द्वारा पेश किये गये तर्कों को फिर से याद दिलाया, तो सत्ता के चमचे प्रचारकों ने प्रोफेसर पार्थ चटर्जी पर तथा उनके द्वारा की गई इस ‘दुस्साहसी’ तुलना का प्रसारण करने वाले न्यूज पोर्टल पर हमला शुरू कर दिया. लेकिन यह ‘भय दिखाने’ का सिद्धांत ही है जिसके आधार पर सरकार शासन कर रही है और अपने ही देश के नागरिकों के साथ ‘युद्धबंदी’ की तरह आचरण कर रही है, जिसके चलते यह तुलना सामने आई है, और प्रोफेसर पार्थ चटर्जी एवं ‘द वायर’ मैगजीन पर हमले हो रहे हैं, और इसी तरह खुद सत्ता प्रतिष्ठान इस किस्म की तुलना को वैध ठहरा रहा है.

लोकतंत्र के प्रति इसी प्रकार की हिकारत और ‘भय दिखाने’ पर भरोसे को एनडीटीवी के कार्यालय पर सीबीआई द्वारा छापामारी में भी देखा जा सकता है. आरोप लगाया गया है कि एनडीटीवी के प्रमोटरों पर एक निजी बैंक का 48 करोड़ रुपया बकाया है, मगर यह आरोप सफेद झूठ निकला. लेकिन यह तथ्य कि सीबीआई ने इस ‘आरोप’ को तो छापा मारने के लिये उपयुक्त केस माना, जबकि विजय माल्या 9000 करोड़ रुपये के बहुचर्चित बकाये के साथ आराम से लंदन में बैठा हुआ है, और गौतम अडानी भारतीय बैंकों से 72000 करोड़ रुपये की भारी रकम लिये बैठा है, और सीबीआई उंगली भी नहीं उठा रही, सरकार के चरम पाखंड का पर्दाफाश कर रहा है. एनडीटीवी पर छापा और कुछ नहीं बल्कि असहमति का गला घोंटने की एक हताशाभरी कोशिश है, वह भारत में जो मीडिया की जो थोड़ी सी स्वायत्तता बनी हुई है उसको ध्वंस करने की कोशिश है. हम इस तथ्य को नहीं भूले हैं कि एनडीटीवी की हिंदी चैनल के प्रसारण पर जो एक दिन का प्रतिबंध (8 नवम्बर 2016 को) लगा था उसे प्रेस एवं नागरिक समाज के शक्तिशाली प्रतिवाद के चलते सरकार को निलम्बित करना पड़ा था. ‘भय दिखाकर शासन’ के इसी तर्क का नतीजा हुआ कि आज मध्य प्रदेश के मंदसौर में किसानों पर पुलिस ने गोली चलाकर पांच किसानों की जान ले ली है.

अगर भय दिखाकर शासन चलाना संघ-भाजपा स्कूल का आधारभूत उसूल है, तो भय से आजादी ही उस स्वप्नदृष्टि का केन्द्र थी जिसने भारत का आजादी के आंदोलन के दौरान मार्गदर्शन किया था. टैगोर ने इसी बात को अपनी कविता में चित्रित किया है जब उन्होंने भारत की ऐसे देश के रूप में कामना की है ‘जहां चित्त हो भय मुक्त’. कोई चार दशक पहले भारत एक और नेता को देख चुका है जिन्होंने डर दिखाकर देश पर शासन करने की कोशिश की थी. भारत की जनता ने उस भय और आतंक के शासन को बर्दाश्त नहीं किया और उन्नीस महीनों के इमरजेन्सी के दुस्वप्न का अंत करके लोकतंत्र की वापसी स्वातंत्रयोत्तर भारत के इतिहास में एक सर्वाधिक महत्वपूर्ण घटना बनी हुई है. अगर मोदी और योगी तथा उनके गुंडा-गिरोह एवं प्रचारक ऐसा सोचते हैं कि वे इक्कीसवीं सदी में डर पैदा करके और नफरत का माहौल भड़काकर भारत पर शासन चला सकते हैं, तो इससे ज्यादा मूर्खता की बात और क्या हो सकती है?

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