एकरसता, बेधड़क मनमानी और विभेद की मूर्तियां

जब भाजपा और मोदी सरकार देश की लगभग प्रत्येक संस्था, हर क्षेत्र और जनता के हर तबके को संत्रस्त करने वाले घोटालों, अनैतिक आचरणों और संकटों के दलदल में फंस गई है, तो वह जवाबदेही से बचने और राजनीतिक विमर्श की दिशा बदल देने के लिये फूटपरस्ती और ध्यान भटकाने वाली तरकीबों का ज्यादा से ज्यादा सहारा लेती जा रही है.

भारत के प्रथम गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल के 597 फीट ऊंचे ‘स्टैच्यू ऑफ युनिटी’ (एकता की मूर्ति), जिसको दुनिया की सबसे ऊंची मूर्ति कहा जा रहा है, का निर्माण मोदी सरकार द्वारा जनता का ध्यान भटकाने का ताजातरीन प्रयास है. मोदी की वादाखिलाफी, सफेद झूठ बोलने की आदत और अनैतिक आचरणों के चलते उनका कद गिरता जा रहा है और अब वे वल्लभभाई पटेल के नाम पर अपना कद ऊंचा करने की कोशिश में लगे हुए हैं.

मोदी के आख्यान में पटेल नेहरू के प्रतिद्वंद्वी थे, वे नेहरू के धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रवाद के बजाय हिंदू राष्ट्रवाद का प्रतिनिधित्व करते थे. जब मोदी और भाजपा “एकता” की बात करते हैं तो उनका अर्थ है “एकरसता” – दूसरे शब्दों में, बहुसंख्यकवादी रवैया अपनाते हुए सभी भारतीयों के ऊपर एक ही धर्मनिष्ठा, एक ही भाषा, एक ही किस्म का भोजन थोप देना, और खुद विविधता को ही राष्ट्र-विरोधी और अनबन या विभेद का स्रोत बताना. यह तो वास्तव में “एकता” की आरएसएस द्वारा दी गई परिभाषा है; आरएसएस के द्वितीय सरसंघचालक एम.एस. गोलवलकर ने अपनी पुस्तक “बंच ऑफ थॉट्स” में यह स्पष्ट कर दिया था कि आरएसएस मुसलमानों, ईसाइयों और यहां तक कि बौद्धों और सिखों को विभाजनकारी और साम्प्रदायिक मानता है क्योंकि उन्होंने खुद को हिंदू कहने से इन्कार कर दिया है; और तमिल लोग भी इसलिये विभाजनकारी हैं क्योंकि वे हिंदी भाषा को गले लगाने से इन्कार करते हैं!

मोदी और भाजपा ने पटेल को हड़पने और उनकी विरासत को नेहरू के खिलाफ खड़ा करने की बेईमानीभरी कोशिश भी की है. यह बिल्कुल जाहिर सी बात है कि नेहरू ने ही पटेल को भारत का पहला गृहमंत्री बनने का निमंत्रण दिया था और अपनी एक चिट्ठी में उन्होंने पटेल को “मंत्रिमंडल का सबसे मजबूत खम्भा” कहा था. इसके अलावा, गृहमंत्री की हैसियत से पटेल ने आरएसएस पर प्रतिबंध लगाने में कोई हिचकिचाहट नहीं दिखाई, उन्होंने जो विज्ञप्ति जारी की थी उसमें उन्होंने लिखा था “फिर भी संघ की आपत्तिजनक और हानिकारक गतिविधियां जारी रही हैं और संघ ने जो हिंसा की पूजा की पैरवी की है उससे तथा उसकी गतिविधियों से प्रेरित होकर की गई हरकतों ने बहुत सारे लोगों को अपना शिकार बनाया है. इस हिंसा का शिकार बनने वालों में ताजातरीन और सबसे मूल्यवान इन्सान खुद गांधी जी थे.” पटेल ने श्यामाप्रसाद मुखर्जी को एक चिट्ठी में यह भी लिखा था: “मेरे दिमाग में इस बात के प्रति कोई संदेह नहीं है कि हिंदू महासभा का चरमपंथी गुट ही इस ¹गांधी जी की हत्या केह् षड्यंत्र में लिप्त था- आरएसएस की गतिविधियां सरकार और राजसत्ता के अस्तित्व के लिये बिल्कुल स्पष्ट खतरा बनी हुई हैं. हमारी रिपोर्ट बताती है कि प्रतिबंध के बावजूद ये गतिविधियां बंद नहीं हुई हैं. सच तो यह है कि समय बीतने के साथ आरएसएस की शाखाएं और अधिक उद्दंड होती जा रही हैं और पहले से बड़े पैमाने पर अपनी तोड़फोड़ की गतिविधियों में लग गई हैं.” पटेल ने सीधे गोलवलकर को भी, यह बताते हुए कि आरएसएस द्वारा फैलाये जा रहे साम्प्रदायिक जहर का क्या नतीजा होगा, लिख भेजा था कि “देश को गांधी जी के बहुमूल्य जीवन के बलिदान के रूप में क्षति सहनी पड़ी है”, जिसके बाद उन्होंने उल्लेख किया था कि “आरएसएस के लोगों ने गांधी जी की मृत्यु के बाद उल्लास प्रकट किया था और मिठाइयां बांटी थीं.” नेहरू और पटेल के बीच चाहे जो मतविरोध रहा हो, निश्चित तौर पर वे उस हिंसक साम्प्रदायिक राजनीति के विरोध में एकताबद्ध थे जिसका प्रतिनिधित्व आरएसएस करता था, और दोनों इसी बात पर यकीन करते थे कि इसी जहरीली राजनीति ने गांधी जी की जान ली है.

2019 के चुनाव की तरफ बढ़ते भारत के राजनीतिक नक्शे पर केवल पटेल की अकेली मूर्ति ही नहीं छा रही है. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ घोषणा कर रहे हैं कि अयोध्या में राम की ऐसी मूर्ति बनाई जायेगी जिसकी ऊंचाई पटेल की मूर्ति से भी अधिक होगी. इन विशालकाय मूर्तियों का मकसद मोदी और योगी सरकारों की साफ तौर पर जाहिर हो चुकी नाकामियों को ढकने और लोगों का ध्यान भटकाने के अलावा और कुछ नहीं है, जिन नाकामियों की वजह से भारत बेरोजगारी, कृषि क्षेत्र में बदहाली और भ्रष्टाचार के सबसे बुरे संकटों के दौर से गुजर रहा है.

पटेल की विशालकाय मूर्ति की सामाजिक कीमत क्या है? इस मूर्ति को बनाने में 2,989 करोड़ रुपये खर्च हुए हैं – इतनी रकम से तो, ‘इंडियास्पेंड’ के अनुसार, इंडियन इंस्टीट्टयूट ऑफ टेक्नालॉजी (आईआईटी) के दो नये कैम्पस, एआईआईएमएस (एम्स) के दो नये कैम्पस, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट (आईआईएम) के पांच नये कैम्पस और मंगल ग्रह को जाने वाले इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गनाइजेशन (इसरो) के छह मिशनों का खर्च पूरा किया जा सकता था. इस रकम का इस्तेमाल 40,192 हेक्टर जमीन की सिंचाई के लिये, 162 लघु सिंचाई योजनाओं की मरम्मत, पुनर्नवीकरण और पुनरुद्धार के लिये और 425 छोटे चेक-डैम के निर्माण के लिये किया जा सकता था. पटेल के स्टैचू की परियोजना के चलते गुजरात के नर्मदा जिले के 72 गांवों के जिन 75,000 आदिवासी लोगों को विस्थापित किया गया है, उन्होंने स्टैचू के उद्घाटन के अवसर पर प्रतिवाद जाहिर किया. गुजरात के चार जिलों से आये 1,500 किसानों ने भी, जो सनखेदा स्थित सरदार शुगर मिल को बेचे गये गन्ने की बकाया रकम 12 करोड़ रुपये की प्राप्ति के लिये असफलता के साथ इंतजार कर रहे हैं, इस स्टैचू के उद्घाटन पर हुए प्रतिवाद में हिस्सा लिया.

विडम्बना यह है कि मोदी सरकार ने “स्टेचू ऑफ युनिटी” के उद्घाटन के अवसर पर विपक्ष के एक भी नेता को निमंत्रित नहीं किया – और एक तरह से “एकता” का ही मखौल उड़ाया. मोदी सरकार के लिये, जो हमारे देश में अब तक के इतिहास में देखी गई सबसे ज्यादा विभेद और फूटपरस्ती को हवा दे रही है – जिसकी वजह से साम्प्रदायिक हिंसा, पीट-पीट कर हत्या की घटनाओं तथा भाजपा नेताओं द्वारा दिये गये नफरतभरे जहरीले भाषणों की बाढ़ आ गई है – “स्टेचू ऑफ युनिटी” का प्रचार महज लोगों की आंखों में धूल झोंकना है. मोदी सरकार और भाजपा बेहयाई से बिना किसी दंड-भय के मनमानी करने का भी सजीव रिकार्ड तोड़क साबित हुए हैं – वे मानवता के खिलाफ सबसे जघन्य अपराधों की जिम्मेवारी उठाने से इन्कार करने के लिये संस्थाओं के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं. इसका ताजातरीन उदाहरण यकीनन सोहराबुद्दीन हत्याकांड के एक गवाह द्वारा अदालत में दिया गया वह बयान है, जिसमें गवाह ने जाहिर किया है कि गुजरात के पूर्व पुलिस अधिकारी डी.जी. वंजारा ने गुजरात के पूर्व गृहमंत्री हरेन पांड्या की हत्या के लिये उसे सुपारी दी थी. इस बात को कौन भूल सकता है कि जेल में रहते हुए वंजारा ने मोदी को एक खुली चिठ्ठी लिखी थी जिसमें उसने मोदी को याद दिलाया था कि वंजारा तथा अन्य पुलिस अधिकारियों पर हत्या करने के जो भी आरोप लगे हैं वे सब के सब मोदी की सेवा में, और मोदी के वफादार सेवक अमित शाह के आदेश से किये गये थे? क्या कोई भी स्टैचू, चाहे वह कितना भी ऊंचा हो, कभी भी इन जघन्य, राजनीति से प्रेरित सुपारी हत्याओं की लम्बी शृंखला को ढक सकती है?

भारत की विविधतापूर्ण जनता के लिये एकता की सबसे बड़ी दावेदारी है – भारत को विभाजित करने और भारत के लोकतंत्र का विध्वंस करने पर उन्मत्तता से उतारू फासीवादी शक्तियों के खिलाफ एकजुट होना.

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