सीबीआई, रिजर्व बैंक, सुप्रीम कोर्ट – शासन संस्थाओं के खिलाफ मोदी सरकार ने छेड़ी बेलगाम जंग

2019 के चुनाव से पहले मोदी सरकार शासन की संस्थाओं के खिलाफ अपनी जंग को दिन-प्रतिदिन तीखा करती जा रही है. पहले इन संस्थाओं में जो तोड़फोड़ पर्दे के पीछे से की जा रही थी, वह अब खुलेआम धमकी और टकराव के रूप में सामने आ गई है. सीबीआई, भारतीय रिजर्व बैंक और यहां तक कि सर्वोच्च न्यायालय – सभी इसकी आंच महसूस कर पा रहे हैं जबकि सरकार खुद को जवाबदेह ठहराये जाने के हर प्रयास को दबाकर खत्म कर देने के लिये छिपे तौर पर डराने-धमकाने, हस्तक्षेप करने तथा जबर्दस्ती करने की रणनीति अपना रही है.

पिछली सरकार के कार्यकाल में सर्वोच्च न्यायालय ने यह सुप्रसिद्ध टिप्पणी की थी कि सीबीआई पिंजड़े में बंद तोता है. उस तोते को आजाद करने के बजाय मोदी सरकार शुरूआत से ही पिंजड़े को और सख्त बनाने में लगी हुई है, उसने सीबीआई का इस्तेमाल केवल अपने हित में अवसर देखकर विपक्ष के नेताओं को निशाना बनाने के लिये ही किया है ताकि गठजोड़ बनाया जा सके या बने हुए को तोड़ा जा सके. सीबीआई और इन्फोर्समेंट डायरेक्टरेट को अब शासक एनडीए संश्रय के साझीदार के बतौर जाना जाता है.

सारी आपत्तियों को धता बताते हुए मोदी ने गुजरात के दिनों से अपने सर्वाधिक विश्वसनीय पुलिस अधिकारियों में से एक राकेश अस्थाना को सीबीआई का विशेष निदेशक नियुक्त कर दिया और भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम (प्रिवेंशन ऑफ करप्शन ऐक्ट) में संशोधन करके सीबीआई अथवा अन्य किसी भी जांच एजेन्सी के लिये यह अनिवार्य बना दिया कि भ्रष्टाचार के आरोप पर किसी भी अधिकारी के खिलाफ जांच करने से पहले उसे सरकार से अनुमति लेनी होगी. लेकिन राफेल सौदे के विस्तारित विवरण की पोल खुलने से पैदा घबराहट ने मोदी सरकार को सीबीआई के बारे में भी चिंताग्रस्त कर दिया और अब जो नजारा हम देख रहे हैं, वह सीबीआई को मोदी-शाह गुट के पूर्णरूपेण नियंत्रण में लाने के लिये सरकार द्वारा किये गये तख्तपलट से किसी मायने में कम नहीं है.

सीबीआई के निदेशक आलोक वर्मा, जिनको प्रधानमंत्री समेत पूरे कॉलेजियम ने बाकायदा चुना था और जिनका कार्यकाल जनवरी 2019 तक के लिये सुनिश्चित कर दिया गया था, उन्होंने जब घूसखोरी के मामले में राकेश अस्थाना को निलम्बित करने और उनके खिलाफ मुकदमा चलाने के लिये सरकार की अनुमति मांगी तो सरकार ने खुद निदेशक को ही हटा दिया, उन पर निगाह रखने के लिये उनके सरकारी आवास के इर्द-गिर्द आईबी के कर्मचारियों को ड्यूटी पर लगा दिया, और सिर से पैर तक इल्जामों में फंसे दागी जूनियर अधिकारी एम. नागेश्वर राव को अंतर्वर्ती निदेशक नियुक्त कर दिया. अस्थाना ने गुजरात में अपने कार्यकाल के दौरान ही अपनी प्रभुभक्ति को सिद्ध कर दिया था, चाहे वह गोधरा मामले में मोदी का पक्ष लेना हो, या फिर पुलिस कल्याण कोष से भारी रकम निकालकर भाजपा के चुनावी कोष में डाल देने का मामला हो. इसी प्रकार मिस्टर राव ने ओडि़शा में फायर ब्रिगेड वर्दी घोटाला जैसे अनगिनत भ्रष्टाचार के आरोपों का मामला हो, या फिर संघ ब्रिगेड के विभिन्न कारनामों का खुलेआम और मुखर रूप से पक्षपोषण करने का मामला, अपनी उपयोगिता सिद्ध कर दी है. सीबीआई और केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त (सीवीसी) के पदों पर इस किस्म के अपने विश्वसनीय सहकारियों को भरने के साथ साथ मोदी सरकार ने उन तमाम अधिकारियों को निकाल बाहर किया अथवा उनका स्थानांतरण कर दिया जो जांच-पड़ताल के प्रमुख मामलों में लगे हुए थे और यहां तक कि अनजाने खुफिया अधिकारियों को भेजकर सीबीआई कार्यालय पर छापा मारा और महत्वपूर्ण फाइलों को अपने कब्जे में ले लिया.

सीबीआई में यह तख्तपलट इस बात का परिचायक है कि सरकार देश की आर्थिक, प्रशासकीय और न्यायपालिका के शासन की सभी प्रमुख संस्थाओं के साथ कैसा सलूक करती है. रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन को दूसरा कार्यकाल देने से इन्कार करने के बाद और रिजर्व बैंक को मोदी सरकार के नोटबंदी जैसे सर्वाधिक अरक्षणीय और सनकभरे कदम का पक्षपोषण करने के लिये मजबूर करने के बाद सरकार भारत की सर्वोच्च बैंकिंग संस्था को पहले जो स्वायत्तता और नियमन का प्राधिकार हासिल था उसको लगातार खोखला करती जा रही है- रिजर्व बैंक द्वारा कर्ज न चुकाने वाली कारपोरेट कम्पनियों के खिलाफ और सख्त बैंकिंग नियम-कानूनों को अपनाने पर जोर दिये जाने अथवा अपने खुद के बैंकिंग रिजर्व की रक्षा करने या फिर भुगतान की तमाम प्रणालियों पर अपने नियमन के प्राधिकार को बरकरार रखने पर जोर देने के खिलाफ सरकार और आरएसएस-समर्थित अर्थशास्त्री हमला किये जा रहे हैं, जिन्हें सरकार ने इसी बीच रिजर्व बैंक के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स में घुसा दिया है.

पर सबसे खुला टकराव अब संभवतः सरकार और सर्वोच्च न्यायालय के बीच खुलकर सामने आ रहा है. सबरीमाला मंदिर के बारे में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का शुरूआत में स्वागत करने के बाद अब भाजपा ने यू टर्न लेकर पीछे मुड़कर रास्ता बदल लिया है. अमित शाह ने सर्वोच्च न्यायालय से कहा है कि वह ऐसे फैसले लिया करें जिन्हें लागू किया जा सके, और अपनी पार्टी कतारों का आह्नान किया है कि वे केरल की वाम-जनवादी मोर्चा (एलडीएफ) की सरकार को उखाड़ फेंके क्योंकि उसने सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को लागू करने पर प्रतिबद्धता घोषित की है. और अब चूंकि सर्वोच्च न्यायालय ने अयोध्या के भू-स्वामित्व सम्बंधी मामले की अगली सुनवाई की तारीख जनवरी में तय कर दी है, तब भाजपा के मंत्रीगण न्यायालय को सलाह दे रहे हैं कि वह “हिन्दुओं के सब्र का इम्तहान न ले” सोशल मीडिया पर हिंदुत्व ब्रिगेड ने और भी स्पष्ट शब्दों में अपनी बात कही है. सर्वोच्च न्यायालय की इमारत के गुम्बद की तुलना अब ध्वस्त की जा चुकी बाबरी मस्जिद के गुम्बदों से की जा रही है.

अगर आप सोच रहे हैं कि मोदी सरकार केवल मुसलमानों, दलितों और “अर्बन नक्सलियों” के खिलाफ युद्ध छेड़ रही है, तो अब आपको अपनी आंखें खोल लेनी चाहिये और व्यापक परिदृश्य को देखना चाहिये. अब युद्ध अल्पसंख्यकों और दबे-कुचले व हाशिये पर खड़े तबकों तक सीमित नहीं रह गया है. फासीवादी शक्ति का बुलडोजर अब लोकतांत्रिक शासन की कमजोर और आक्रमणयोग्य संस्थाओं को निशाना बना रही है. जब आपदा आती है तो वह समूचे क्षेत्र की हर चीज को निगल जाती है. मोदी सरकार चौतरफा आपदा – आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक आपदा – का अग्रदूत बन चुकी है. बिना देर किये हमें भारत को मोदी नामक आपदा से बचाना होगा.

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