सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की राजनीति के खिलाफ जनप्रतिरोध संगठित करना होगा: का. रामजतन शर्मा

भोजपुर जिले समेत बिहार में भाजपा-आरएसएस द्वारा सांप्रदायिक उन्माद भड़काने की कोशिशों के खिलाफ 19 अगस्त को नागरी प्रचारिणी सभागार, आरा में ‘सांप्रदायिक उन्माद की राजनीति के प्रतिरोध की जरूरत’ विषय पर पार्टी की जिला कमेटी की ओर से एक संगोष्ठी आयोजित की गई, जिसके मुख्य वक्ता पार्टी के केंद्रीय कंट्रोल कमीशन के चेयरमैन का. रामजतन शर्मा थे। इस अवसर पर पूरे जिले से आए पार्टी कार्यकर्ताओं और नागरिकों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि विडंबना है कि जो ताकतें देश की आजादी के संघर्ष में शामिल नहीं थीं, उन्होंने सत्ता की बागडोर संभाल लिया है और कांग्रेस जो स्वाधीनता आंदोलन का नेतृत्व करने वाली पार्टी थी, वह लगभग खत्म हो चुकी है। जनता के भारत का जो निर्माण करना है, उसके पहले के संक्रमण का यह दौर है।

उन्होंने कहा कि हमारी पार्टी भाकपा-माले ने सबसे पहले भाजपा की शिनाख्त एक सांप्रदायिक फासीवादी पार्टी के तौर पर किया था। अब स्वप्नदास गुप्ता जैसे दक्षिणपंथी बुद्धिजीवी बिहार में तख्तापलट के संदर्भ में इनकी शैली की तुलना हिटलर की शैली से की है।

का. रामजतन शर्मा ने कहा कि सांप्रदायिक फासीवादी पार्टी का भी वर्गीय चरित्र होता है। भाजपा काॅरपोरेट घरानों, सामंती शक्तियों और साम्राज्यवाद के सरगना अमेरिका के हित में काम कर रही है। गरीब तो कई कारणों से उनके साथ चले जाते हैं, पर वह उनके वर्गहित की पार्टी नहीं है। भाजपा ने कारपोरेट हित में अरबों रुपये के ऋण माफ किए, नोटबंदी, जीएसटी जैसे फैसले इन्हीं बड़े पूंजीपतियों के हित में लिए गए फैसले हैं। दूसरी ओर वे गरीबों की जनकल्याण योजनाओं, छात्रवृत्ति और शिक्षा-स्वास्थ्य आदि के बजट में कटौती कर रहे हैं।

का. शर्मा ने कहा कि चुनाव के दौरान इन्होंने जो भी वादे किए थे, खुद ही अब उन्हें जुमला कह रहे हैं। दरअसल भाजपा की सरकारें पूरी तरह विफल हो चुकी हैं। विफल होने के बाद वे सांप्रदायिक धु्रवीकरण की रणनीति पर अमल करते हैं। इन्होंने गौगुंडों को मुसलमानों पर हमले की पूरी छूट दे रखी है। सलवा जुडूम की तरह ही ये भी सत्ता प्रायोजित गिरोह हैं। सरकारें इन पर कार्रवाई करने के बजाए अत्याचार के शिकार लोगों पर ही कार्रवाई करती हैं। ठीक इसी तरह दलितों पर हमला करना भी हिंदू राष्ट्र की बात करने वालों की रणनीति है। हिंदू राष्ट्र निर्माण का मकसद लोकतंत्र की हत्या करना और हिंदुत्ववादी सांप्रदायिक फासीवाद को स्थापित करना है। इसी रणनीति के तहत ये अंबेडकर के विचारों की गलत व्याख्या करते हुए उन्हें अपने में समाहित करने की कोशिश कर रहे हैं। सांप्रदायिक फासीवादी विचारों से ग्रस्त भाजपाई दलितों को ही प्रतिनिधि बनाते हैं। दलित राष्ट्रपति के संदर्भ में इसे देखा जा सकता है।
का. रामजतन शर्मा ने कहा कि सांप्रदायिक उन्माद और उत्पात की भाजपाई राजनीति और उसकी लोकतंत्रविरोधी कार्रवाइयों के खिलाफ पूरे देश में किसान, मजदूर और छात्र लगातार प्रतिरोध कर रहे हैं। आज प्रतिरोध की आवाज ज्यादा मुखर है। कुछ नए किस्म के प्रतिरोध भी इस बीच सामने आए, जिसकी शुरुआत बुद्धिजीवियों ने की। वह भी अजीब प्रतिरोध था, उन्होंने कोई बैठक करके निर्णय नहीं लिया था, पर सत्ता प्रायोजित सांप्रदायिक कत्लेआम के खिलाफ कई बड़े लेखक-बुद्धिजीवियों, वैज्ञानिकों, कलाकारों ने अपने पुरस्कार लौटाए। इसी तरह माॅब लिंचिंग के खिलाफ ‘नाॅट इन माई नेम’ के तहत जबर्दस्त प्रदर्शन हुए। पहली बार इस देश के किसान आंदोलन की ताकतें राष्ट्रीय स्तर पर गोलबंद होने की कोेशिश कर रही हैं। उना से लेकर सहारनपुर तक दलित मान-सम्मान, आजादी, बराबरी और जमीन के लिए आवाज उठा रहे हैं। जाति उन्मूलन और भूमि सुधार के सवाल फिर से महत्वपूर्ण हो गए हैं। सच तो यह है कि प्रतिरोध का स्वर और दायरा लगातार बढ़ता ही जा रहा है। गोरखपुर में बच्चों की मौतों के मामले में भाजपा-संघ सबसे ज्यादा एक्सपोज हुए हैं। आम अवाम के प्रति इनकी संवेदनहीन और गैरजिम्मेवार राजनीति का बहुत बड़े दायरे में विरोध हुआ है।

का. रामजतन शर्मा ने कहा कि भोजपुर गरीब-मेहनतकश जनता के संघर्ष का इलाका है। यह लंबे समय से उनके निशाने पर है। रणवीर सेना परिघटना में भी सांप्रदायिक विद्वेष की भूमिका थी। भोजपुर और बिहार में अब भाजपा-संघ सांप्रदायिक धु्रवीकरण के जरिए गरीबों की एकता तोड़ने की कोशिश कर रही हैं। लेकिन बिहार की जनता इनका यहीं कब्र खोद देगी। आज जरूरत यह है कि जनप्रतिरोध को और मजबूत किया जाए।

का. शर्मा ने कहा कि नीचे जमीनी स्तर पर प्रतिरोध की राजनीति करना बहुत जरूरी है। नीचे बहुत लोग तथ्यों को नहीं जानते, उन्हें भाजपा-आरएसएस के सांप्रदायिक दुष्प्रचार और अफवाहों के खिलाफ वास्तविक तथ्यों से अवगत कराना होगा।

का. रामजतन शर्मा ने कहा कि सिर्फ चुनावी मोर्चाबंदी के जरिए सांप्रदायिक फासीवादी ताकतें निर्णायक तौर पर नहीं हारेंगी। बेशक चुनाव को पारदर्शी बनाने, संविधान और लोकतंत्र की रक्षा की लड़ाइयां भी हमें लड़नी होगी, पर इसके लिए जनता की राजनीतिक चेतना को उन्नत करना होगा। जनता की राजनीतिक चेतना अगर पिछड़ी रह जाए, तो सांप्रदायिक ताकतें हार-हार कर भी सत्ता में आ जाएंगी। अब तो शायद कोई क्षेत्रीय पार्टी भी नहीं बची इस देश में, जो सत्ता में न आई हो, पर इनकी मौकापरस्ती और जनविरोधी रवैये ने भी भाजपा को मौका दिया है। ऐसी स्थिति में जनांदोलन और जनप्रतिरोध की ताकतों को बढ़ाकर ही हम इन्हें शिकस्त दे सकते हैं। हमें याद रखना चाहिए कि हिटलर को जनता ने अंततः कहां पहुंचा दिया। हमारा तो नारा ही है- जो हिटलर की चाल चलेगा, वो हिटलर की मौत करेगा।

संगोष्ठी में अखलाक, पहलू खान, जुनैद और का. जफर समेत देश भर में हिंदुत्ववादी सांप्रदायिक गिरोहों द्वारा मारे गए बेगुनाह लोगों, गोरखपुर के बीआरडी अस्पताल में सरकारी संवेदहीनता और गैरजिम्मेवारी की वजह से असमय जीवन गंवा चुके बच्चों और बिहार में सरकारी बदइंतजामी के कारण बाढ़ की तबाही से मरने वाले डेढ़ सौ अधिक लोगों को श्रद्धांजलि दी गई। संगोष्ठी के दौरान ही अगले 25 अगस्त तक चलने वाले बाढ़ राहत अभियान की घोषणा की गई। सभागार में मौजूद लोगों ने राहत कोष में अपना योगदान दिया।
संगोष्ठी में पहले भोजपुर जिला सचिव का. जवाहरलाल सिंह ने विस्तार से भोजपुर और देश में सांप्रदायिक उन्माद की घटनाओं के संदर्भ को रखा और इसके खिलाफ मुकम्मल लड़ाई लड़ने की जरूरत को चिह्नित किया। भोजपुर के रानीसागर में हाल में मांस का कारोबार करने वाले मुसलमानों पर हमलों के प्रसंग में कहा कि उन्हंे अंगरेजों के जमाने से ही मांस के कारोबार का लाइसेंस मिला हुआ है। इसके बावजूद बीफ का अफवाह उड़ाकर उन पर हमला किया गया है। विडंबना यह है कि राजद के स्थानीय विधायक तो पीड़ितों से मिलने भी नही गए।

इस अवसर पर विधायक का. सुदामा प्रसाद ने सहार और पीरो में इसके पूर्व घटी घटनाओं के हवाले से बताया कि राजद के नेता ऐसी घटनाओं के वक्त हमलावर सांप्रदायिक शक्तियों के साथ ही खड़े नजर आते रहे हैं, जबकि भाकपा-माले के कार्यकर्ताओं ने हर जगह सांप्रदायिक ताकतों को मंसूबों को विफल करने का काम किया है। निश्चित तौर पर यह संघी-भाजपाई लोगों का सवर्णकाल है, पर रोजी-रोटी और खेती-किसानी के मुद्दों पर जनता को संगठित करते हुए हम इन्हें जरूर परास्त करेंगे।
कवि-आलोचक जितेंद्र कुमार ने कहा कि सेकुलरिज्म एक मूल्य है, जिसे भारतीय जनता ने लड़कर हासिल किया है। सेकुलरिज्म हो या खाने-पीने, पहनने, अपनी भाषा में बोलने की आजादी के लिए कौन सी सामाजिक-राजनीतिक ताकत संघर्ष कर रही है, इसकी पहचान करनी होगी। बिहार में भाकपा-माले जैसी ताकत जो सामंती-सांप्रदायिक-जातिवादी शक्तियों के खिलाफ सड़कों पर लड़ रही है, उसके साथ खड़ा होना होगा। भारत के स्वाधीनता आंदोलन से गद्दारी करने वाले आज सरकार में हैं और उनके द्वारा प्रायोजित संगठित गिरोह जनता पर हमले कर रहे हैं, इसलिए भी इनका संगठित प्रतिरोध जरूरी है। हमें वर्गीय तौर पर संगठित होना होगा। राज्य प्रायोजित हिंसा से लड़ना होगा। इस दिशा में बड़ी सामाजिक कार्रवाइयों की जरूरत है।

भाकपा-माले, बिहार राज्य स्थाई समिति के सदस्य का. संतोष सहर ने कहा कि भोजपुर में यह एक नई और बड़ी शुरुआत हो रही है। इस जिले में सांप्रदायिक सौहार्द की जो विरासत है, उसे नीचे तक तोड़ने की जो कोशिश है, उसका करारा जवाब देना होगा। जनकवि रमाकांत द्विवेदी रमता जी, जिनका यह जन्मशताब्दी वर्ष है, उन्होंने वाजपेयी के शासनकाल में लिखा था- गद्दी प शैतान के जमात बइठल बा/ एकरा मन में नमूना गुजरात बइठल बा। मोदी-शाह की शैतानी जोड़ी में उसे देखा जा सकता है। गाय के नाम पर दलितों और अल्पसंख्यकों पर हमला और पड़ोसी देशों के खिलाफ अंधराष्ट्रवादी उन्माद की संघी रणनीति को यही शैतानी जोड़ी अंजाम दे रही है। दूसरी ओर आर्थिक लूट और घोटालों का सिलसिला भी जारी है। ‘राफेल’ से लेकर ‘सृजन’ तक इसके उदाहरण हैं।
का. संतोष सहर ने कहा कि जिस प्रकार दलित-अल्पसंख्यक समुदाय पर हमले हो रहे हैं, उसके तुरत प्रतिरोध के लिए संगठनात्मक पहलकदमी की जरूरत है। ‘इंसाफ मंच’ जैसे संगठन की इसमें कारगर भूमिका हो सकती है। उसके जरिए सत्ता प्रायोजित सामाजिक अन्याय, हिंसा और उन्माद के खिलाफ उत्पीड़ित लोगों के प्रतिरोध को संगठित किया जा सकता है।
प्रो. दूधनाथ चैधरी ने कहा कि आज रोजी-रोटी के अवसर, अमन-चैन- सब खतरे में है। गाय को सांप्रदायिक औजार बनाकर बुनियादी सवालों को दरकिनार किया जा रहा है। सांप्रदायिक उन्माद की राजनीति के खिलाफ पंचायत स्तर तक अभियान चलाने की जरूरत पर उन्होंने जोर दिया।
राज्य कमेटी सदस्य का. क्यामुद्दीन अंसारी ने कहा कि भोजपुर में अल्पसंख्यकों के हर सवाल पर भाकपा-माले लड़ाई लड़ती रही है। हम देख रहे हैं कि भाजपा के साथ वही लोग खड़े हैं, वही आरएसएस की राजनीति कर रहे हैं, जो गरीब-मेहनतकश लोगों पर जुल्म करते रहे हैं। गरीबों की लड़ाई को और ताकतवर बनाना ही इनकी सांप्रदायिक राजनीति का करारा जवाब होगा।

राज्य कमेटी सदस्य का. अजित कुशवाहा ने कहा कि सांप्रदायिक उन्माद की राजनीति सिर्फ अल्पसंख्यकों के खिलाफ ही नहीं है, बल्कि यह सामाजिक न्याय और आम जनता के लोकतांत्रिक अधिकारों के खिलाफ भी है। इनके सत्ता में आने के बाद अल्पसंख्यकों के साथ-साथ छात्र-नौजवानों, मजदूूर-किसानों, दलित-पिछड़ों, आदिवासियों- सबके जीवन पर हमले बढ़े हैं।

राज्य कमेटी सदस्य का. राजू यादव ने कहा कि शिक्षा, महंगाई, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी जैसे मुद्दों से ध्यान हटाने के लिए ही भाजपा सांप्रदायिक उन्माद की राजनीति कर रही है। शायर रसिक भोजपुरी ने कहा कि सांप्रदायिकता का जिन्न जो कैद था, उसे खोल दिया गया है। उसके जरिए पूरे देश पर कब्जे की कोशिश की जा रही है।

संचालन करते हुए का. सुधीर सुमन ने कहा कि भाजपा-संघ परिवार के रुख से सारे पर्दे बहुत तेजी से उतर चुके हैं। चुनाव में किए गए वायदों के विपरीत ये अत्यंत क्रूरता के साथ जनविरोधी नीतियों पर अमल कर रहे हैं। इनकी निर्ममता और संवेदनहीनता की घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं। आरएसएस के जहरीले नेटवर्क और कारपोरेट मीडिया पर कंट्रोल के जरिए बहुसंख्यक हिंदुओं के भीतर सांप्रदायिक विद्वेष और नफरत फैलाकर ये जनता के विक्षोभ को संगठित होने से रोकने की कोशिश कर रहे हैं। इनकी शैतानी राजनीति की जान इसी सांप्रदायिक विद्वेष के भीतर है। इस विद्वेष और अविश्वास को खत्म करके भी इन्हें कमजोर किया जा सकता है। परिवर्तनकारी ताकतों के लिए यह सिर्फ तात्कालिक मुद्दा नहीं हो सकता। पिछले साढ़े तीन दशक में नई आर्थिक नीति के कारण बेरोजगारी, कृषि की तबाही, महंगाई और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के अभाव के बढ़ने के साथ-साथ ही समाज में सांप्रदायिक सौहार्द को खत्म करने की कोशिशें भी लगातार हुई हैं। सर्वधर्म सम्भाव’ में यकीन करने वाले लोग हों या भ्रष्टाचार और लूट से मुक्त समाज के लिए ईमानदारी से लड़ने वाले व्यक्ति या संगठन या जल, जंगल, जमीन समेत अपने लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए आंदोलन करने वाले समूह या जनांदोलन की अन्य ताकतें- ये सब प्राकृतिक संसाधनांे की लूट में लगी पूंजी और उनके हित में काम कर रही उन्मादी, दमनकारी और तानाशाही प्रवृत्ति से ग्रस्त भाजपा-संघ की राजनीति के निशाने पर हैं। ऐसी स्थिति में सांप्रदायिक उन्माद की राजनीति के खिलाफ बड़े जनांदोलन को संगठित करना बेहद जरूरी है। जिंदगी के बुनियादी मसलों पर विभिन्न समुदायों की बड़ी एकजुटता कैसे बने और किस तरह साझी संस्कृति, आपसी भाईचारा मजबूत हो, इस दिशा में हर स्तर पर काम करना होगा।

संगोष्ठी से पूर्व जनगायक बबन शर्मा और रामचंद्र जी ने अपने जनवादी गीत सुनाए। इस मौके पर मंच पर भाकपा-माले, शाहाबाद जोन के प्रभारी का. नंदकिशोर प्रसाद, अखिल भारतीय किसान महासभा के जिला अध्यक्ष का. चंद्रदीप सिंह, आइसा के राज्य सचिव का. शिवप्रकाश रंजन, वली अहमद आदि मौजूद थे। अध्यक्षता का. रमेश, का. संजय, का. क्यामुद्दीन अंसारी, प्रो. दूधनाथ सिंह ने की।

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