जनकन्वेंशन : कॉमरेड दीपंकर भट्टाचार्य का संक्षिप्त वक्तव्य. अवश्य पढें.

बिहार में बहुत तेजी के साथ एक बड़ा राजनीतिक बदलाव आ गया है. इसके लिए कोई चुनाव की जरूरत नहीं हुई. जिस भाजपा के खिलाफ बिहार की जनता ने 2015 में इतना बड़ा जनादेश दिया था, उसी भाजपा को अब फिर से सत्ता में लाएंगे, यह नीतीश कुमार ने तय कर लिया. ये सब कुछ बहुत तेजी के साथ हुआ है, और इसी के साथ बिहार की राजनीति में क्या बदलाव हुआ है, वो भी हम देख रहे हैं. हम लोग तो इसका विरोध कर रहे हैं. लेकिन, इसका समर्थन करने वाले लोग, जद-यू के लोग और भाजपा के बुद्धिजीवी क्या बोल रहे हैं, इसको भी समझना जरूरी है. अखबार में नीतीश जी के एक समर्थक, जो जाने-माने अर्थशास्त्री हैं, उन्होंने लिखा कि देश में भ्रष्टाचार सबसे बड़ा मुद्दा है. यहां गठबंधन की जो सरकार थी वो भ्रष्टाचार के सवाल पर घिर रही थी, और भाजपा इसी मुद्दे को लेकर आगे बढ़ रही थी. नीतीश जी ने जो किया वो एक मास्टर स्ट्रोक है. उन्होंने भाजपा को रोक दिया और उसी के साथ जाकर राजनीति को मोड़ दिया. अब जो सरकार है, वह वही सरकार है जो 2013 में थी. नीतीश कुमार और सुशील मोदी विकास की राजनीति के दो जुड़वां भाई हैं जो अब फिर से मिल गए हैं. ये दोनों मिलकर बिहार को तेजी से विकास के रास्ते पर ले जाएंगे, क्योंकि भाजपा ने कह दिया है कि उसने उन्मादी-उत्पाती तत्वों को किनारे करके सुशील मोदी को राजनीति के केंद्र में रखा है.

यह व्याख्या नीतीश जी के खेमे से है. अब देखिये कि भाजपा के बुद्धिजीवी, जो राज्य सभा के मेंबर भी हैं, वो क्या कहते हैं. उन्होंने एक लेख में लिखा कि बिहार में एक बड़ा आपरेशन हुआ – ‘आपरेशन बिहार’! और जिस तेजी तथा संकल्प के साथ इस आपरेशन को अंजाम दिया गया, उसे समझने के लिए आपको दूसरे विश्व युद्ध के दौरान 1940 के मई माह में दुश्मन सेना के खिलाफ हिटलर का जो तूफानी अभियान चला, उससे इसकी तुलना करनी पड़ेगी, और 1967 में इजरायल ने सिर्फ छह दिन के अंदर फिलिस्तीन के गोलान हाइट्स पर, गाजा पट्टी पर कब्जा कर लिया, उसके साथ इसकी तुलना कर सकते हैं. फर्क इतना है कि हिटलर का अभियान, इजरायल का अभियान सैन्य अभियान थे, और बिहार का यह अभियान राजनीतिक अभियान है. इस प्रकार भाजपा ने स्पष्ट कर दिया कि देश में संपूर्ण सत्ता पर कब्जा कर लेने के लिए, विरोध की हर जगह को खत्म कर देने के लिए भाजपा की जो सोच है, उसकी जो रणनीति है, उसी का ये एक हिस्सा है. 2015 में बिहार में भाजपा को जो चुनावी हार मिली थी, वो उसके लिए बहुत बड़ा झटका था. उत्तर प्रदेश में जीत हासिल करने के बाद उन्होंने बहुत कुछ किया, लेकिन उन्हें एक कमी खल रह रही थी कि अभी तक बिहार उनके कब्जे में नहीं आ पाया है, बंगाल और केरल उनके कब्जे में नहीं आया है. इन बचे-खुचे राज्यों को कब्जे में करने की मुहिम में ही उन्होंने बिहार में ये आपरेशन किया है, और नीतीश जी ने पूरी तरह सरेंडर करते हुए 2015 के जनादेश की हत्या कर दी और भाजपा की इस मुहिम में साथ देते हुए उसको सत्ता में ले आए.

अब भाजपा बिहार में सत्ता पर कब्जा कर ‘विकास का कारवां’ चलाने के बजाय कौन सा कारवां चला रहा है, ये हम देख रहे हैं. पूरे देश में गाय के नाम पर उनकी गुंडागर्दी चल रही है, गाय की रक्षा के नाम पर दलितों और मुस्लिमों की पिटाई और हत्या की जा रही है. बिहार अब तक बचा हुआ था. लेकिन इस सत्ता-बदल के साथ, तख्त-पलट के साथ, ही अब बिहार में भी हम देख रहे हैं कि किस तरह भोजपुर के रानीसागर में मॉब-लिंचिंग (भीड़ हिंसा) की घटना हुई है. सासाराम से रिपोर्ट आई है, और अब बिहार के कोने-कोने से ऐसी रिपोर्टें आएंगी. दशहरा-मुहर्रम का समय आ रहा है, आप तैयार रहिये, सूबे के हर कोने से, कभी यहां कभी वहां, कभी इस बहाने कभी उस बहाने, दंगा का माहौल बनाने की खबरें लगातार आएंगी. हम कहते थे कि बिहार को गुजरात नहीं बनने देंगे, लेकिन अब बिहार को वही गुजरात बनाने के मुहिम चलेगी. देश में एक ओर अडानी, अंबानी और अब इसमें बाबा रामदेव का ‘पतंजलि’ भी जुड़ गया है, इनकी लूट चलेगी’ जल-जंगल-जमीन पर इनका साम्राज्य होगा, बैंक और बैंक की तमाम पूंजी उनकी होगी. और दूसरी ओर जनता गाय के नाम पर और भी तरह-तरह के नाम पर आपसी दंगे-फसाद में उलझ कर झुलस जाएगी. ये है जनता के लिए; वो है कंपनी के लिए, मोदी के दोस्तों के लिए. ये जो पूरी प्लानिंग है उनकी, उसमें अब बिहार को भी शामिल कर लिया गया है. इसी को वे बिहार में गुजरात मॉडल बनाना कहते हैं – गुजरात कह लीजिए, हरियाणा कह लीजिए और अगर इसी तरह चलता रहा तो एक दिन वे बिहार मॉडल भी कह देंगे. यह खतरा हमारे सामने है, हमें इसका मुकाबला करना है.

यह मुकाबला करने के लिए, जैसा कि साथियों ने कहा, वामपंथी एकता चाहिए, और भी व्यापक एकता चाहिए. लेकिन एकता के साथ-साथ मैं कहूंगा कि गति चाहिए. फुर्सत से, तैयारी का समय लेकर नहीं, बल्कि जिस तेजी से यह हमला हुआ है, उसी तेजी से, उसी गति के साथ मुकाबला करना होगा. वामपंथी आन्दोलन के अंदर, प्रगतिशील और लोकतांत्रिक शक्तियों के अंदर यह गति चहिए. गति के साथ साहस चाहिए, हिम्मत चाहिए. मुझे याद है, 2015 के चुनाव के वक्त एक तरफ महागठबंधन था, तो दूसरी तरफ वामपंथियों का तालमेल था. बहुतेरे लोग कह रहे थे कि ये क्या किया आपने! इतने बड़े दुश्मन से मुकाबला करने के लिए वामपंथ के अलग रहने से क्या होगा? वामपंथ को महागठबंधन में ही शामिल हो जाना चाहिए. आज, पता नहीं वे लोग क्या बोलेंगे. इस महागठबंधन का कोई ठिकाना नहीं है. अगर उस समय वामपंथ महागठबंधन में चला जाता तो आज जो ये विचारधारा के स्तर पर, आन्दोलन के स्तर पर जो राजनीतिक विकल्प, साहस और हिम्मत चाहिए, उसका क्या होता? मुकाबला करने के लिए एकता जरूर चाहिए, लेकिन एकता करके बीच रास्ते में विश्वासघात कर दे, यह नहीं चाहिए. उत्तर प्रदेश के बारे में भी लोग कह रहे थे कि अगर वहां भी बिहार की तरह सपा और बसपा के बीच एकता बन जाती तो वह राज्य भी भाजपा के हाथ में जाने से बच जाता. लेकिन आज वहां सपा के लोग धीरे-धीरे भाजपा में जा रहे हैं. बसपा के लोग कह रहे हैं कि इसकी राजनीति से भाजपा का मुकाबला नहीं किया जा सकता, वहां अब भीम आर्मी बनाई जा रही है. तो सवाल विकल्प बनाने का है, उसके लिए लड़ाई चाहिए, मुकाबले की हिम्मत चाहिए. इसी के लिए एकता चाहिए. इसीलिए आज बिहार में तय हो गया कि वामपंथी शक्तियों को, लोकतांत्रिक व प्रगतिशील ताकतों को पूरे अपने तेवर के साथ, हिम्मत के साथ और संकल्प के साथ आगे आना होगा. लड़ाई कठिन है, ये आसान लड़ाई नहीं है, हम इसे हल्के से नहीं ले सकते हैं. आज इन्होंने संकेत दिया है कि वे वामपंथ के सबसे मजबूत गढ़ भोजपुर को घेरने की कोशिश कर रहे हैं, क्योंकि भोजपुर 70-दशक से ही गरीबों, दलितों, किसानों, अल्पसंख्यकों को नई दिशा दे रहा है, वहां तमाम किस्म के जनसंहारों और मंदिर-मस्जिद के फसादों के बीच भी माले को खत्म नहीं किया जा सका है. उस भोजपुर को कमजोर करने के लिए वे हर तिकड़म के जरिये उत्पात मचाने की कोशिश कर रहे हैं. वे सिवान को घेरने की कोशिश कर रहे हैं. बगल में गोरखपुर है, आज गोरखपुर से उत्तर प्रदेश चल रहा है. वहां से योगी आदित्यनाथ के लोग इस पूरे क्षेत्र में सांप्रदायिकता की राजनीति करना चाहते हैं. वे लोग जिन इलाकों को चुन रहे हैं, उससे स्पष्ट है कि बहुत सोच-समझ कर, पूरी तैयारी के साथ वे आ रहे है. इसीलिए हमलोगों को भी पूरी एकता के साथ, सोच-समझ के साथ इसका मुकाबला करना होगा.

आज का यह जन कन्वेंशन इसी के लिए बुलाया गया है. पूरे बिहार में एकता बनाने और हिम्मत बटोर कर तेज लड़ाई खड़ा करने का संकल्प लेने के लिए हम इसमें शामिल हो रहे हैं. एक छोटा उदाहरण आपके सामने रखता हूं. अभी कुछ दिन पहले बल्लभगढ़ में घर लौट रहे नौजवान जुनैद की ट्रेन में हत्या कर दी गई, आप लोग इस घटना को जानते हैं. इसके बाद भी ये सिलसिला नहीं रुका है. अभी उत्तर प्रदेश में आगरा के नजदीक फर्रुखाबाद में एक मुस्लिम परिवार पर हमला किया गया. किसी की जान तो नहीं गई, लेकिन परिवार के लोगों को मारपीट कर घायल कर दिया गया और सारा सामान लूट लिया गया. 1850 के दशक में जिस रेलवे का निर्माण हुआ – देश के एक छोर को दूसरे छोर से जोड़ने के लिए – तीन-तीन दिनों का सफर करते हुए, न जाने कितने और कहां-कहां के लोगों के साथ मिलकर, आपस में बातचीत करते, खाते-पीते हम सफर करते हैं मिल्लत की भावना के साथ; आज अगर इसी रेलगाड़ी में मुस्लिम लोगों को सफर करना पड़े तो उन्हें अपनी जान हथेली पर लेकर जाना पड़ता है. इसकी आहट पहले ही सुनाई पड़ी थी. उत्तर प्रदेश में जब योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बनाया गया तो दिल्ली के मेट्रो में इसका असर दिखाई पड़ा. वहां मेट्रो में बुजुर्गों के लिए, महिलाओं के लिए आरक्षित सीटें होती हैं; लोग उनके लिए आदर के साथ अपनी सीट तक छोड़ देते हैं. लेकिन उत्तर प्रदेश में भाजपा की सरकार बनने के बाद खबर मिली कि उसी मेट्रो में एक बुजुर्ग मुस्लिम खड़े थे और सीनियर सिटीजन के लिए आरक्षित सीट पर दो नौजवान बैठे हुए थे. जब उस बुजुर्ग ने उन नौजवानों से कहा कि आप सीट छोड़ दीजिये, मुझे बैठना है, तो पहले तो उन नौजवानों ने कुछ नहीं कहा; दुबारा आग्रह करने पर उन्होंने कहा कि आपको सीट चाहिये तो पाकिस्तान चले जाइए, आपकी सीट पाकिस्तान में है. ये असर है यूपी चुनाव में भाजपा के जीतने का. संयोग से उसी जगह हमारी पार्टी के एक ट्रांसपोर्ट कर्मी नेता भी थे. जब उन्होंने इन नौजवानों से पूछा कि ऐसा क्यों कह रहे हो, तो उनको जवाब दिया गया कि आप भी पाकिस्तान चले जाओ. शुरू में तो उन नौजवानों को लगा कि वे हमारे नेता को खामोश कर देंगे. चंडीगढ़ में भाजपा अध्यक्ष के बेटे ने एक लड़की के साथ बदसलूकी की और सीसीटीवी फुटेज नहीं होने का बहाना बनाकर पुलिस ने केस को कमजोर बना दिया. मोदी-भक्तों को लगता है कि वे कुछ भी कर सकते हैं और कोई उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता है. वैसे ही मेट्रो में बैठे उन नौजवानों को भी ये गुमान था कि उनका भी कोई कुछ नहीं कर सकता है. लेकिन हमारे कामरेड ने कड़ा प्रोटेस्ट किया, धीरे-धीरे और भी लोग बोलने लगे. अंत में पुलिस आई और उन लड़कों के खिलाफ सीसीटीवी फुटेज के आधार पर केस दर्ज कर लिया. तब उनके गार्जियन लोग आए और गिड़गड़ाने लगे कि लड़कों का भविष्य बर्बाद हो जाएगा, माफ कर दीजिए. तब उस बुजुर्ग ने उन्हें माफ कर दिया. जब दिल्ली के मेट्रो में ऐसा असर दिख रहा है तो बल्लभगढ़ की घटना पर हमें कोई आश्चर्य नहीं होता है. इससे हमें ये सीख मिलती है कि जहां कहीं भी उन्माद और उत्पात की घटना देखें, वहां हमें बिल्कुल साहस के साथ कड़ा प्रतिवाद करना होगा.

बिहार के गांव-गांव में, हर गरीब दलित मुस्लिम बस्ती में यह ऐलान कर दीजिये कि हम इस तरह की उन्मादी गुंडागर्दी को हर्गिज बर्दाश्त नहीं करेंगे. सांप्रदायिकता के खिलाफ हमें इस तेवर के साथ, प्रतिरोध की इस ताकत के साथ आगे बढ़ना होगा. आज हम सबके लिए ये जरूरी है. जमीन की लड़ाई अलग और सांप्रदायिकता के खिलाफ लड़ाई अलग; मजदूरी की लड़ाई अलग और हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए लड़ाई अलग – ये नहीं होगा. ये सब लड़ाइयां एक हैं. किसान के बीच जाकर सिर्फ कर्ज-माफी की बात नहीं कहनी है, उनके बीच ये भी कहना है कि अगर दूध-उत्पादक किसान पहलू खान पर हमला होता है तो देश के हर किसान को इसके प्रतिरोध में खड़ा हो जाना चाहिए. कर्ज-माफी की बात हो, लाभकारी कीमत की बात हो; लेकिन अगर हिंदू-मुस्लिम के नाम पर किसान बंट जाएं तो कुछ हासिल नहीं होगा. जमीन की लड़ाई लड़ेंगे, मजदूरी की लड़ाई लड़ेंगे, राशन-किरासन के लिए लड़ेंगे, मनरेगा की मजदूरी की लड़ाई लड़ेंगे, स्कूल और अस्पताल के लिए लड़ेंगे; लेकिन उसमें अगर दलित के नाम पर, हिंदू-मुसलमान के नाम पर बांट दिया जाए, और विभाजन की इस साजिश के सामने अगर हम कमजोर पड़ जाएं, तो हमारी पूरी लड़ाई कमजोर हो जाएगी.

आप बाजार में जाकर दूकानदारों से पूछिये, आम ग्राहकों से पूछिये तो सब यही कहेंगे कि पहले तो नोटबंदी की मार झेल रहे थे, अभी उसका असर खत्म भी नहीं हुआ कि ये उपर से जीएसटी की मार आ गई. लेकिन सरकारी रिपोर्ट आती है कि भारत में कारोबार करने की सहूलियत के लिए जीएसटी लागू किया गया है. ये सहूलियत किसके लिए ? – अडानी और अंबानी के लिए, विदेशी कंपनियों के लिए. ये लोग सर्टिफिकेट दे रहे हैं कि हमारे लिए भारत में कारोबार करना आसान हो गया. लेकिन छोटे-मोटे कारोबारियों से, दूकानदारों से पूछिये तो वे यही कह रहे हैं कि हमारे उपर तो आफत आ गई, दस तरह की एकाउटिंग रखिये, फार्म भरिये, कंप्यूटर एक्सपर्ट रखिये, हम तो मारे जा रहे हैं. तो इस सब आर्थिक मार के पीछे भाजपा की ये कोशिश है कि जमीन छीन लो, रोजगार छीन लो, आर्थिक रूप से बर्बाद कर दो. लेकिन उनको खुश रखने के लिए कभी गाय की रक्षा का तूफान खड़ा करो तो कभी चीन के सामान के बहिष्कार का हल्ला करो और कभी पाकिस्तान के खिलाफ उन्माद फैला दो. और इस तरह से किसानों को, व्यापारियों को, नौजवानों को बांट दो, और जिंदगी के तमाम सवालों पर पर्दा डालकर उनकी आंखों में धूल झोंक दो. धोखे की इस राजनीति के खिलाफ हमें बड़ी एकता बनाकर लड़ना होगा.

भाजपा वाले, आरएसएस वाले आज हिटलर का नाम लेने से कुछ परहेज करते हैं, क्योंकि वे समझते हैं कि आम लोग आज हिटलर के बारे में जान गए हैं; लेकिन शुरू में आरएसएस वाले कहते थे कि हिटलर और मुसोलिनी का रास्ता ही भारत का रास्ता होना चाहिए. तो, लोकतंत्र और जिंदगी पर ये जो खतरा मंडरा रहा है, फासीवाद की ये जो आहट सुनाई दे रही है, ये सब अचानक नहीं हुआ है. जब देश में पहला लोकसभा चुनाव भी नहीं हुआ था, संविधान भी लागू नहीं हुआ था; जब संविधान पारित ही हो रहा था, संविधान सभा की अंतिम बैठक हो रही थी, उसमें अंबेदकर ने भाषण दिया था. आज जो हम देख रहे हैं उसका संकेत हमें उनके उस भाषण में मिल जाता है. 1949 के नवंबर में अपने उस भाषण में उन्होंने कहा था कि संविधान में स्वतंत्रता, बराबरी और भाईचारा की बात लिखी हुई है, यही संविधान की बुनियाद है; और ये तीनों चीजें अलग-अलग नहीं हैं. अगर इनमें से किसी एक पर हमला करो, तो बाकी दोनों चीजें कमजोर पड़ जाएंगी. अगर स्वतंत्रता छीन लो, तो गुलामों की कैसी बराबरी, उनके साथ कैसा भाईचारा? हमारे देश में सिर्फ आर्थिक गैर-बराबरी नहीं है, उससे भी ज्यादा ये सामाजिक गैर-बराबरी है जिसको जाति के नाम पर संस्थाबद्ध कर दिया गया है, ये सबसे बड़ा खतरा था. इसीलिए उस समय अंबेदकर ने कहा कि ये जिस लोकतंत्र की हम देश में शुरूआत कर रहे हैं, जो संविधान हम देश में ला रहे हैं, वो है तो अच्छ; लेकिन जिस जमीन पर हम इसको ला रहे हैं, वो अ-लोकतांत्रिक है. हम लोकतंत्र का मुलम्मा चढ़ा रहे हैं अ-लोकतांत्रिक जमीन पर. अगर ये जमीन नहीं बदलेंगे तो पता नहीं, ये संविधान कब तक चल पाएगा. संविधान और लोकतंत्र को खो देने के खतरे के बारे में अंबेदकर ने 1949 के अंत में ही आशंका जता दी थी. सामाजिक गैर-बराबरी इसे चलने नहीं देगी.

उन्होंने कहा था कि अगर इस देश में हिंदू राज आ जाए तो वह इस देश के लिए सबसे बड़ी आफत होगी. क्योंकि हिंदू राज का मतलब होगा ब्राह्मणवाद का राज, मनुवाद का राज. आजादी, बराबरी तथा भाईचारे का इससे बड़ा दुश्मन और कोई नहीं है. अगर ब्राह्मणवादी, मनुवादी ताकतों के हाथ में देश की पूरी सत्ता चली जाए तो ये संविधान भला क्या कर लेगा? आज ये खतरा हमारे सामने है. आज देश में फासीवाद दिख रहा है, तानाशाही चारों तरफ दिख रही है. हम जिस जातिवाद के खिलाफ, ब्राह्मणवाद के खिलाफ, सामंतवाद और पूंजीवाद के खिलाफ हम लड़ते हुए यहां तक पहुंचे हैं, किसानों के हक के लिए, जमीन के लिए, मजदूरी के लिए, शिक्षा और मकान के लिए, स्वच्छता, शौचालय, पीने का पानी, स्वास्थ्य का अधिकार, हर अधिकार के लिए हमारे साथी जो लड़ाई लड़ रहे हैं, इन्हीं संघर्षों को आगे बढ़ाते हुए आज इस खतरे का मुकाबला करना होगा.

मैं एक बार फिर तमाम वामपंथी शक्तियों से अपील करना चाहता हूं कि हमें सिर्फ बिहार को ही नहीं बचाना है. 1942 के आन्दोलन के 75 साल पूरे होने जा रहे हैं; उस आन्दोलन में बिहार अगली पांत में शामिल था, 1857 की लड़ाई में बिहार अगली कतार में, सन् ’74 के आन्दोलन में बिहार अगली कतार में, इमरजेंसी के खिलाफ लड़ाई में बिहार सबसे आगे रहा. अगर फासीवाद लाने वाली ताकत यह समझ ले कि इस बिहार में हम अपनी प्रयोगशाला, अपनी कार्यशाला बनाएंगे, तो आज इसे रोकने के लिए, इस साजिश को चकनाचूर करने के लिए, इन ताकतों को पूरी तरह से खदेड़ने के लिए हमें साहस के साथ आगे आना होगा. और, अगर बिहार से हम उन्हें खदेड़ देंगे तो दिल्ली में भी वे नहीं बच पाएंगे, पूरे हिंदुस्तान से हम इन्हें खदेड़ देंगे. इसीलिए 2019 के चुनाव में क्या होगा, कैसे-कैसे गठबंधन बनेंगे, कैसे वोट का जुगाड़ होगा, ये सब बात दिमाग से निकाल दीजिए. यह सब सोचकर वामपंथी राजनीति नहीं चलती है, कोई क्रांति आगे नहीं बढ़ी है – समय आने पर वह सब देखा जाएगा. आज हमें इस बात की गारंटी चाहिए कि बिहार में कहीं भी ‘लिंचिंग’ की कोशिश हो, गाय के नाम पर उन्माद फैलाने की कोशिश हो, दंगा फसाद करने की कोशिश हो, उसका मुंहतोड़ जवाब दिया जाएगा – हमें यह सुनिश्चित करना होगा. स्वच्छता अभियान के नाम पर बिहार में कहीं भी गरीबों, दलितों, महिलाओं को अगर जेल में भेजा जाए, तो ऐसा करने वाले अधिकारियों को घेर लिया जाएगा – चाहे वह बीडीओ हों, एसडीओ हों या और कोई हों. बिहार में यह सब चलने नहीं दिया जाएगा. शराबबंदी के नाम पर जहां भी दलितों पर हमला होगा – हमने देखा कि जहानाबाद में दो दलितों को गिरफ्तार किया गया है – तो यह सामाजिक अन्याय का, गरीबों-दलितों पर हमले का ही मामला कहा जाएगा. इसीलिए, जहां कहीं भी ऐसे हमले होंगे, हमें तुरत पूरी ताकत के साथ इन हमलों का जवाब देना होगा. तभी हम अपने एजेंडे पर – जमीन, मजदूरी, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, मकान और सम्मान के अधिकारों पर – अपनी लड़ाई में आगे बढ़ेंगे और इसी तरह बिहार की राजनीति बदलेगी और इस बदली हुई राजनीति में हमारा एजेंडा भी सामने आएगा. तब राजनीति में बातें होंगी जनता के अधिकारों को पूरा करने की, संविधान में कही गई स्वतंत्रता, बराबरी और भाईचारे की बुनियाद को स्थापित करने की. जब हमारी एकता और लड़ाई आगे बढ़ेगी, तभी आधुनिक देश बनाने और जो ताकतें हमें पीछे की ओर ले जाना चाहती हैं उनका मुकाबला करने में हम आगे बढ़ पाएंगे.

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