जद (यू)-भाजपा के अवैध शासन का प्रतिरोध करो, बिहार-2015 के जनादेश की भावना का पुनरुद्धार करो.

‘‘एक सबसे बड़े राजनीतिक यू-टर्न को सफलतापूर्वक अंजाम तक पहुंचाने में मात्र 36 घंटे का समय लगा. आॅपरेशन बिहार, हिटलर के 1940 के तूफानी हमले और 1967 में मात्र छह दिन के युद्ध में इजरायल को प्राप्त सफलता के साथ राजनीतिक रूप से समतुल्य कारनामा था.’’ हाल में बिहार में हुए राजनीतिक तख्तापलट के बारे में यह गहरी अंतर्दृष्टि सम्पन्न प्रेक्षण भाजपा के एक प्रमुख बुद्धिजीवी और राज्यसभा सदस्य स्वपन दासगुप्ता की कलम से आया है. टाइम्स आॅपफ इंडिया (30 जुलाई 2017) में बिहार की घटनाओं के तात्पर्य पर लिखते हुए स्वपन दासगुप्त ने भाजपा की ‘किलर इन्सटिंक्ट’ (घातक सहजबुद्धि) की और खासतौर पर मोदी-शाह की जोड़ी के ‘परिचालन कौशल’ (आॅपरेशनल फिनेस) की प्रशंसा की है.

हाल के अरसे में भाजपा अपनी ‘घातक सहजबुद्धि’ का अक्सर ही प्रदर्शन करने लगी है. जिस तरह से भाजपा ने गोवा और मणिपुर में सत्ता हथिया ली µ गोवा में तो भाजपा चुनाव में सत्ता से बाहर हो ही गई थी, और मणिपुर में भी वह बहुमत के आंकड़े से काफी पीछे थी µ उससे हाल ही में भाजपा की घातक सहजबुद्धि और परिचालन कौशल का पर्याप्त सबूत मिल चुका है. बिहार में भाजपा ने नीतीश कुमार के साथ लालू प्रसाद के राजद और कांग्रेस को लेकर बने नये गठजोड़ को तोड़ने की लगातार कोशिशें चलाईं, और जैसे ही इसकी जमीन तैयार हो गई, उसने मौके का झपट कर इस्तेमाल करते हुए त्वरित गति और बारीकी से तख्तापलट को अंजाम दिया. नीतीश कुमार ने 26 जुलाई की शाम को मुख्यमंत्री के बतौर अपना त्यागपत्र राज्यपाल को सौंपा और अगले ही दिन सुबह उन्होंने एक बार फिर से जोड़कर खड़ा किये गये जद (यू)-भाजपा गठजोड़ के नेता के बतौर, सुशील मोदी को अपना उपमुख्यमंत्री बनाते हुए मुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली.

अब इस कथानक को किसी बहाने की तो जरूरत थी ही, और तेजस्वी यादव कांड ने इस जरूरत को पूरा कर दिया. नीतीश कुमार और उनके बौद्धिक प्रशंसक एवं प्रचारक दुनिया को समझाना चाहते हैं कि यह बहाना ही मुख्य कथानक था, और इस तरह वे नीतीश द्वारा भाजपा के सामने किये गये अवसरवादी आत्मसमर्पण को भ्रष्टाचार के खिलाफ जिहाद बताकर जायज ठहराने की कोशिश कर रहे हैं. लेकिन क्या बिहार में 2005 से चल रहे नीतीश कुमार के शासन काल में बड़े-बड़े भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद के कारनामे नहीं भरे पड़े हैं? उनके प्रथम शासनकाल में हुए 11,000 करोड़ रुपये के खजाना घोटाला और बियाडा भूमि आवंटन घोटाला से लेकर जारी शासन के दौरान हुए टाॅपर्स घोटाला और बीएसएससी घोटाला तक µ भ्रष्टाचार के ऐसे बड़े बड़े कांड हुए हैं जिनसे करोड़ों की तादाद में आम आदमी बुरी तरह प्रभावित हुए हैं और छात्र-युवाओं की एक समूची पीढ़ी की शिक्षा एवं रोजगार की संभावनाओं पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है. मगर ऐसे कांडों के सामने आने पर भी नीतीश कुमार ज्यादातर चुप्पी ही साधे रहे और इन मुद्दों से कन्नी काटते रहे.

अगर लालू प्रसाद के साथ गठजोड़ कायम करने का मतलब ही भ्रष्टाचार को स्वीकार करना था, तो नीतीश को इस बात का अवश्य ही जवाब देना होगा कि उन्होंने 2015 में इस गठजोड़ के बल पर चुनाव क्यों लड़ा? अगर साम्प्रदायिकता इतना बड़ा मुद्दा नहीं है तो 2013 में उन्होंने भाजपा के साथ नाता क्यों तोड़ा? अगर आरएसएस और मोदी देश के सामने कोई गंभीर खतरा नहीं हैं तो भला उन्होंने बिहार में 2015 का विधानसभा चुनाव जीतने के बाद मोदी के बनारस में जाकर ‘संघ-मुक्त भारत’ का आह्नान क्यों किया? 1990 के दशक से लेकर उन्होंने सिलसिलेवार ढंग से जितनी कलाबाजियां खाई हैं, उनकी एकमात्र व्याख्या यही हो सकती है कि वे लगातार कुरसी के पीछे भागते रहे, और अब यही जानना बाकी है कि उन्होंने एनडीए की गोद में जाने के लिये ठीक यही वक्त क्यों चुना, जहां वे केवल भाजपा की दया पर ही जिंदा रह सकते हैं.

बिहार में नीतीश कुमार की सरकार को कोई खतरा नहीं था और अगर सचमुच तेजस्वी यादव के त्यागपत्र का ही सवाल था तो नीतीश कुमार के पास राजद को मनाने तथा गठजोड़ द्वारा कोई अन्य विकल्प पेश किये जाने के सारे साधन मौजूद थे. यकीनन जो लोग यकीन करते हैं कि सीबीआई द्वारा जांच शुरू किये जाने के बाद तेजस्वी यादव का इस्तीफा देना जरूरी था उन्हें इस बात का भी जवाब देना चाहिये कि कैसे उमा भारती, जिनको सीबीआई ने चार्जशीट दी है, और कैसे वे सभी नेता जिनके नाम पर हत्या, नफरत भड़काने के गंभीर अपराध, तथा विभिन्न आर्थिक एवं अन्य किस्म कि अपराधों के आरोप लगे हैं, भाजपा की एक के बाद एक तमाम सरकारों में मंत्री पद पर बने हुए हैं? अगर सचमुच नीतीश को अपने गठजोड़ के साझीदारों के साथ काम करने में इतनी मुश्किलें आ रही थीं तो उन्हें विधानसभा को भंग करने और नया जनादेश प्राप्त करने के लिये जल्दी-से-जल्दी चुनाव कराने की मांग करनी चाहिये थी. इसके बजाय नीतीश कुमार ने बिहार के 2015 के जनादेश की जगजाहिर दिशा के खिलाफ जाते हुए भाजपा को सत्ता हड़पने का मौका देकर बिहार की जनता के साथ ऐसी गद्दारी की है जिसके लिये उनको कत्तई माफ नहीं किया जा सकता. अब जनता को इस अवैध जद (यू)-भाजपा शासन को मुंहतोड़ जवाब देने के लिये तैयार होना होगा.

भाजपा के लिये तो येन-केन-प्रकारेण सत्ता में वापस आना ही लक्ष्य था (हम उसकी हिटलर और इजरायल के साथ बिल्कुल सटीक समतुल्यता दिखलाने के लिये स्वपन दासगुप्ता के इतिहासबोध के प्रति तहेदिल से आभारी हैं) और नीतीश कुमार का लक्ष्य था एनडीए में वापस जाना (समय ही बतायेगा कि ठीक इसी मोड़ पर यह कदम उठाने के पीछे क्या मजबूरियां थीं या क्या उन्होंने क्या गुणा-भाग किया था). नीतीश कुमार अब हमें बताते हैं कि मोदी को रोकना नामुमकिन है और वे अजेय हैं. अगर यही वह कारण है जिसके चलते उन्होंने मोदी-शाह की जोड़ी के सामने आत्मसमर्पण किया है, तो यह उनकी राजनीति के खोखलेपन को दर्शाता है. और वे तमाम उदारवादी जिन्होंने कल तक नीतीश कुमार को मोदी के सम्भावनामय विकल्प के तौर पर देखा था, और जो अब ‘धर्मनिरपेक्षता’ को बेकार का मुद्दा बताकर खारिज करने में व्यस्त हैं, केवल फासीवादी आक्रमण का मुकाबला करने के लिये जरूरी राजनीतिक साहस और वैचारिक संकल्प की महत्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित करने में मददगार हो रहे हैं.

नीतीश कुमार अब भी विधानसभा में संख्या के लिहाज से भाजपा से बड़े हो सकते हैं, मगर राजनीतिक लिहाज से उनका कद बेहद छोटा हो गया है. सच कहा जाय तो उनकी सरकार अब एक कठपुतली सरकार है, जिसे नरेन्द्र मोदी और संघ-भाजपा शासन अपनी धुन पर नचायेगा. जिन्होंने 2015 के बिहार के जनादेश की प्रासंगिकता और ताकत का श्रेय केवल लालू प्रसाद और नीतीश कुमार के एक साथ मिलने को दिया था, उनको लाजिमी तौर पर मनोबल गिरता महसूस होगा. मगर बिहार की लड़ाकू जनता, जिसने इतनी स्पष्टता से 2015 में संघ-भाजपा के एजेंडा को खारिज कर दिया था, यकीनी तौर पर भाजपा के हमले के खिलाफ लड़ाई तेज करेगी और अपनी पूरी ताकत लगाकर इस अवैध भाजपा-जद (यू) शासन का मुकाबला करेगी. जब जनादेश से फायदा उठाने वाले लोग गद्दार बन गये हैं तो जनता की जिम्मेदारी है कि वे अपने जनादेश का पुनरुद्धार करें और लोकतंत्र एवं जनता की सत्ता की पताका बुलंद करें.

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