मस्तान-पेन्टर मांझी का परिवार भूखमरी के कगार पर, प्रियंका की पढाई छूटी : एक रिपोर्ट

प्रस्तुति : रामबली सिंह यादव (राज्य कमिटी सदस्य, भाकपा-माले)

जहानाबाद शहर के ऊंटा मुशहर टोली के दो गरीब सहोदर भाई मस्तान मांझी व पेंटर मांझी को जहानाबाद फास्ट ट्रैक कोर्ट ने ताड़ी पिए होने के आरोप में आनन – फानन में 10 जुलाई 2017 को महज 40 दिनों के भीतर 5 साल के सश्रम कारावास व 1 लाख रुपए का जुर्माना ठोक दिया है. जुर्माना नहीं देने पर उन्हें 6 साल जेल में रहना होगा. पेंटर मांझी की पत्नी क्रांति देवी को भी पुलिस ने शराब बरामदगी का झूठा आरोप लगाकर जेल में डाल दिया था. वह 20 दिन जेल में गुजारकर आई हैं. पुलिस ने उन्हें भी गिरफ्तार कर जेल भेज दिया था. कोर्ट में गवाही जितनी तेजी से चल रही है, परिवार वाले भयभीत हैं कि क्रांति देवी को भी सजा होना तय है. लोग बताते हैं कि जहानाबाद में जल्द ही सजा सुनाए जाने की लाइन में मुशहर समुदाय के 13 गरीब और हैं. शराबबंदी कानून के काले प्रावधानों के तहत राज्य की यह पहली बर्बर सजा है, जिससे गरीबों के बीच भय व आतंक की सर्द लहर दौड़ गयी है.

(सियामनी देवी और उनकी बेटी प्रियंका)

यह वही जहानाबाद है, जहां बाथे जनसंहार पीड़ितों को वर्षों न्याय के लिए टकटकी लगाए रहना पड़ा लेकिन अंत में तमाम अपराधियों को बाइज्जत बरी कर दिया गया. यहीं के निर्दोष टाडा बन्दी आज भी जेल की सीखचों में बंद हैं. सामाजिक न्याय के ढोंग का यह अभूतपूर्व नमूना है. दलितों की दुश्मन नंबर एक पार्टी भाजपा आजकल दलित प्रेम का ढोंग करते नहीं अघाती, लेकिन मस्तान मांझी व पेंटर मांझी की सजा पर उसने अभी तक एक शब्द नहीं बोला है. जीतनराम मांझी और रामविलास पासवान जैसे तथाकथित दलित नेताओं की भी बोलती पूरी तरह बंद है. जाहिर है, जहां कहीं भी दलित-गरीब के दमन-उत्पीड़न की बात आती है, दलितों के ये तथाकथित स्वंयभू नेता चुप्पी साधने में ही भलाई समझते हैं.

मस्तान मांझी और पेंटर मांझी का घर जहानाबाद के ऊंटा मुहल्ले में है. भाकपा-माले की एक जांच टीम ने जाकर पूरे घटना का विस्तार से अध्ययन किया. जो तथ्य उभरकर आए वे बड़े भयावह हैं.शराबबंदी के बाद सरकार द्वारा पुनर्वास की कोई व्यवस्था नहीं की गई है और इस तरह हजारों मुशहर परिवार को भूखमरी की ओर धकेल दिया गया है. यह जानी हुई बात है कि बिहार में शराब के कारोबार को सबसे ज्यादा नीतीश कुमार ने ही बढ़ावा दिया. जब बिहार के गांवों गलियों तक में शराब की बिक्री होने लगी थी, उस वक्त उसे पूरी तरह बंद करने का सवाल उठाने वालों में सबसे आगे महिलायें ही थीं. उस शराबी संस्कृति वाले दौर में हर जगह शराब का उत्पादन होता था और उसमें स्थानीय पुलिस भारी पैसा उगाहा करती थी, जो ऊपर के महकमों तक पहुंचता था. शराबबंदी के बाद गरीबों का यह पेशा जाता रहा, लेकिन प्रशासन के लिए पैसा उगाही और धौंस जमाने का यह सबसे सरल तरीका बन गया. शराबबंदी के कानून के काले प्रावधानों का इस्तेमाल वे अक्सर गरीबों से पैसा उगाहने और न देने पर शराब बरामदगी अथवा कुछ भी झूठ दिखलाकर उन्हें भयभीत करने, जेल में डाल देने और सजा करा देने का काम कर रहे हैं. जाहिर है, जहां बड़े लोग बच जा रहे हैं, वहीं छोटे लोग इसमें बुरी तरह पिस गये हैं.

29 मई 2017 का मनहूस दिन
उस दिन 29 मई 2017 था. काफी तेज लू चल रही थी. मस्तान मांझी व पेंटर मांझी मिट्टी के अपने छोटे से कमरे (70 वर्गफीट का रहा होगा) में आराम कर रहे थे. शहीद भगत सिंह नगर पूर्वी ऊंटा में 200 गरीब परिवार 40 वर्षों से बसे हुए हैं, जिन्हें उजाड़ने की कोशिश जरूर हुई, लेकिन आज तक किसी सरकार ने आवास का पर्चा नहीं दिया. इसके पश्चिमी हिस्से में 15 घर मांझी (मुशहर) हैं. 3 बजे अपराह्न में पेंटर मांझी अपनी पत्नी से 5 रु. मांगकर पान खाने के लिए कमरे से बाहर निकले ही थे कि पुलिस आने का हल्ला हुआ और वे गिरफ्तार कर लिए गए. मस्तान मांझी भी जब बाहर निकले आबकारी पुलिस ने उन्हें भी गिरफ्तार कर लिया. परिवार के लोगों ने विरोध किया और कहा कि दोनों ने ताड़ी पी रखी है, जो प्रतिबंधित नहीं है. तब पुलिस ने पेंटर मांझी की पत्नी क्रांति देवी को भी पकड़ लिया. रास्ते में मुहल्ले के बख्खो टोला से पुलिस ने सड़क किनारे नल पर पानी के लिए रखा 5 लीटर वाला गैलन उठा लिया और उसमें पानी भर लिया. पुलिस ने आॅफिस जाकर पहले से जब्त शराब से एक बोतल शराब गैलन में डालकर सील किया और उसे कोर्ट में पेश किया.
परिवार के लोगों ने बताया कि जब गिरफ्तारी के गवाह के बतौर मुहल्ले का कोई आदमी हस्ताक्षर के लिए तैयार नहीं हुआ तो नाला निर्माण में काम कर रहे दो बाहरी मजदूरों के अंगूठे का निशान जबरन पुलिस ने गवाह के बतौर ले लिया. मुकदमे की नकल निकालने पर पता चला कि पुलिस ने गिरफ्तार का गवाह रमेश मांझी, पिता-बिगन मांझी और भिखु मांझी, पिता-रामेन्द्र मांझी, दोनों पूर्वी ऊंटा लिखा है, जबकि उपरोक्त नाम का कोई व्यक्ति उस मुहल्ले में या आसापास के मुहल्ले में नहीं है. कोर्ट में पुलिस ने बयान दिया कि दोनों सपरिवार जहानाबाद छोड़कर कहीं भाग गए हैं. इस फर्जी गवाह व बयान को कोर्ट ने सही मानकर सजा सुना दी. शराबबंदी के बाद फल दुकान खोलने के लिए दोनों भाइयों ने पंजाब नेशनल बैंक से 20-20 हजार कर्ज लिए थे, जो इस समय खाता में ही था. जहानाबाद कोर्ट में केस लड़ने में बैंक में जमा पूरे 40 हजार खर्च हो गये. हाईकोर्ट के लिए कर्ज लेकर 10 हजार फिलहाल दिया गया है. (

भूखमरी के कगार पर खड़ा परिवार
मस्तान मांझी अपने छोटे से कमरे में पत्नी सियामनी देवी और 4 बच्चे (शादीशुदा बेटा चंदन-16 वर्ष, विनय-15 वर्ष, रंजन-14 वर्ष, व बेटी प्रियंका-12 वर्ष) के साथ गुजारा करते हैं. पेंटर मांझी भी पत्नी क्रांति देवी व 3 बच्चों (लालू कुमार – 14 वर्ष, नीतू कुमारी – 10 वर्ष व मुस्कान कुमारी – 8 वर्ष) के साथ रहती हैं. 70 वर्षीया माँ देव्मतिया देवी भी इन्हीं बेटों के साथ घूम-फिरकर रहती हैं.

दोनों भाई भाड़ा पर लेकर रिक्शा या ठेला चलाते हैं. उनके पास अपना रिक्शा या ठेला नहीं है. रिक्शा-ठेला नहीं मिलने पर गोदाम से सामान गाड़ी पर चढ़ाने-उतारने का काम तथा दिहाड़ी मजदूरी भी करते हैं. मस्तान मांझी का बड़ा बेटा चंदन भी दिहाड़ी मजदूर है. विनय 4था तक पढ़कर पढ़ाई छोड़कर काम की तलाश में हैं. रंजन लिट्टी की दुकान पर नौकर है. बेटी प्रियंका गड़ेरिया खान मध्य विद्यालय में 5 वीं कक्षा में पढ़ती थी, लेकिन पिता मस्तान मांझी के जेल जाने के बाद पढ़ाई छूट गयी है. पेंटर मांझी का बड़ा बेटा लालू कुमार प्राथमिक विद्यालय ऊंटा में 5 वां में, बेटी नीतू गड़ेरिया खान मध्य विद्यालय में 4था में तथा मुस्कान कुमारी 2रा में पढ़ती थी. मां-पिता के जेल जाने के बाद सबों की पढ़ाई छूट गयी है. नीतू पढ़ने में तेज है और ट्यूशन पढ़ना चाहती थी, लेकिन मां क्रांति देवी ने बताया कि यह गरीबी के कारण संभव नहीं था.
गिरफ्तारी के बाद पूरे परिवार पर विपत्ति का पहाड़ टूट पड़ा है. जीवन अनिश्चय से भर गया है. भूखमरी की नौबत है और परिवार कर्ज में डूबता जा रहा है. मां, 12 वर्षीया प्रियंका तथा दोनों भाइयों की पत्नियां 10 किलोमीटर दूर शकुराबाद टेंपो से जाकर धान की रोपनी कर रही हैं और टेंपो भाड़ा के बाद शेष बची मजदूरी से परिवार का गुजर-बसर चल रहा है. धान की रोपनी का काम समाप्ति पर है. आगे घर कैसे चलेगा, कौन सा काम मिलेगा – सोचकर परिवार भारी चिंता में है. क्रांति देवी की सजा के बाद तो परिवार का जीवन और कठिन हो जाएगा. निचली अदालत में जब 40 हजार रु. खर्च हो गये, तो सहज अंदाजा लगाया जा सकता है कि परिवार हाईकोर्ट का खर्च कैसे वहन करेगा! फल दुकान वाला कर्ज का पैसा तो पहले ही खत्म हो चुका है.

45 हजार हैं शराबबंदी में जेल में बंद
हम सभी जानते हैं कि शराब बन्दी के वर्तमान काले कानून के तहत जेल में करीब 45 हजार लोग बंद हैं. संभव है, उसमें मुठ्ठी भर अपराधी व शराब माफिया भी हों. लेकिन अमूमन करीब- करीब सभी गरीब – गुरबे व आम नागरिक हैं. बिहार के 45 हजार बन्दियों के ऊपर अब जहानाबाद जैसी ही सजा की तलवार लटक रही है. सूत्रों से पता चला है जहानाबाद कोर्ट में 13 मुशहर जाति के गरीब सजा सुनाये जाने की लाइन में है. सजा जल्दी ही होने वाली है.

दूसरी ओर, पूरे राज्य में शराब माफियाओं की चांदी है. दुगुनी – तिगुनी कीमत पर शराब की होम डिलीवरी जारी है. क्या यह राजनीतिक – प्रशासनिक संरक्षण के बिना संभव है? लेकिन न तो शराब माफिया और न ही इस नापाक गठजोड़ पर कार्रवाई हो रही है. उल्टे शराब की आदत के पीड़ितों को ही निशाना बनाया जा रहा है.
पूरे राज्य को शराब में डूबोनेे का काम माननीय नीतीश कुमार ने ही किया था. लेकिन अपने इस आपराधिक कृत्य के लिए बिहार की जनता से उन्होंने माफी तक नहीं मांगी. उल्टे ‘सामाजिक सुधार’ के नाम पर गरीबों पर ही हमला बोल दिया गया है.
शराब की आपराधिक अर्थव्यवस्था भी है और अपराध के साथ इसके रिश्ते भी हैं. लेकिन शराब की बुरी आदत के शिकार लोग बेशक अपराधी नहीं हैं. उनके साथ अपराधियों जैसा व्यवहार कहां तक उचित है? उन्हें सुधार गृह की जरूरत है न कि जेल की. सरकार को उनके पुनर्वास का पुख्ता इंतजाम करना चाहिए और सुधार गृह की पूरी अवधि में उनके परिवार को गुजारा भत्ता देना चाहिए. लेकिन गरीबों का वोट लेकर सत्ता में आई सरकार उनपर ही जुल्म ढा रही है. यह जनादेश का अपमान है.
सरकार को शराब की बुरी आदत के शिकार तमाम बंदियों को तत्काल रिहा कर सुधार गृह भेजने और उनके बच्चों की पढ़ाई व परिवार के भरण-पोषण के लिए गुजारा भत्ता देने का प्रबंध करना चाहिए.

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