अमरनाथ हत्याकांड: साम्प्रदायिक एवं फूटपरस्त प्रचार को मुंहतोड़ जवाब दो!

गत 10 जुलाई 2017 को कश्मीर घाटी में हुए एक घृणित आतंकवादी हमले में सात अमरनाथ यात्रियों की हत्या कर दी गई. नफरत के खिलाफ मानवीयता को उत्साहवर्धक रूप से बुलंद करते हुए इस हमले की प्रतिक्रिया में कश्मीर घाटी से लेकर भारत के विभिन्न नगरों एवं कस्बों में सर्वत्र आम लोगों ने इसकी कड़ी निंदा करते हुए जबर्दस्त प्रतिवाद किया.

10 जुलाई का हत्याकांड पिछले 17 वर्षों में कश्मीर घाटी में तीर्थयात्रियों पर आतंकवादी हमले की पहली घटना है. यहां तक कि अमरनाथ की जमीन को लेकर विवाद के मुद्दे पर चरम प्रतिवाद के दिनों में भी, और साथ ही 2010 और 2016 में विशाल-विशाल नागरिक प्रतिवादों के बावजूद, हिंदू तीर्थस्थानों को जाने वाले तीर्थयात्रियों को कभी निशाना नहीं बनाया गया. इसलिये यह घटना राज्य में पीडीपी-भाजपा सरकार और केन्द्र में मोदी सरकार के शासन के दौरान कश्मीर में हालात और अधिक बिगड़ने का एक और अशुभ संकेत है.

यह हमला ‘सुरक्षा’ के मोर्चे पर मोदी सरकार के आक्रामक और जंगखोर दावों की पोल खोल रहा है. इसी जून के अंत में पुलिस महानिरीक्षक (कश्मीर जोन) ने सुरक्षा एजेन्सियों को लिखे एक पत्र में एक ‘अत्यंत आवश्यक’ खुफिया सूचना दी थी जिसमें अमरनाथ यात्रा पर होने वाले किसी हमले की चेतावनी दी गई थी. इस चेतावनी में बताया गया था कि आतंकी लोग तीर्थयात्रियों की गाड़ियों पर फायरिंग कर सकते हैं ताकि ‘समूचे देश में साम्प्रदायिक तनाव भड़काया जा सके’. इसके जवाब में सीआरपीएफ के अधिकारियों ने आश्वासन दिया था कि इस साल यात्रियों की सुरक्षा के लिये ‘अब तक के सबसे बड़े सुरक्षा इंतजामात’ किये जा रहे हैं. तब भला इस चेतावनी के बावजूद और वादे के मुताबिक पूरी सावधानी के साथ विस्तारित सुरक्षा व्यवस्था किये जाने के बावजूद तीर्थयात्रियों से भरी एक बस को सुरक्षा के कई नियमों का खुला उल्लंघन कैसे करने दिया गया?

यह चार्टर्ड बस (जिसकी एक मालिक से दूसरे मालिक को की गई बिक्री की प्रक्रिया अधूरी ही थी) अमरनाथ तीर्थस्थान बोर्ड के तहत पंजीकृत नहीं थी जैसा कि नियमानुसार होना चाहिये था. फिर भी इसे अमरनाथ तीर्थस्थान जाने दिया गया. दूसरी बात, यह बस सूर्यास्त के बाद जा रही थी – जो नियमों का एक और गंभीर उल्लंघन है. यह बस सुरक्षा वाहनों के साथ चलने वाले यात्रियों के अधिकारिक कारवां का हिस्सा नहीं थी, मगर इसके सामने एक पुलिस की वैन चल रही थी. जम्मू-कश्मीर के अधिकारियों ने यह व्याख्या करने की कोशिश की है कि संभवतः आतंकवादी यात्रियों की बस के बजाय पुलिस वैन को निशाना बनाकर फायरिंग कर रहे थे. मगर उन्होंने अभी तक इस बात की व्याख्या नहीं की है कि आतंकियों द्वारा तीर्थयात्रियों के वाहनों को निशाना बनाये जाने की खुफिया एजेन्सियों की विशेष रूप से दी गई पूर्व चेतावनी के बावजूद तीर्थयात्रियों से भरी एक बस को सुरक्षा नियमों का उल्लंघन करते हुए ऐसे इलाके में जाने की इजाजत ही क्यों दी गई? जम्मू-कश्मीर की सरकार, और घाटी में सुरक्षा बलों पर नियंत्रण रखने वाली केन्द्र सरकार दोनों सुरक्षा में हुई इस गंभीर चूक के लिये सीधे जिम्मेवार हैं, जिसमें सात तीर्थयात्रियों की जानें गईं. जम्मू-कश्मीर पुलिस ने इस हमले के बारे में कई परस्पर-विरोधी व्याख्याएं और परिकल्पनाएं पेश की हैं. मगर हमलावरों की शिनाख्त करने के लिये किसी विश्वसनीय और स्वतंत्र जांच की जरूरत है.

इस हमले को किसी ने भी अंजाम दिया हो, इस बात में कोई शक नहीं रह जाता कि इस हमले का एक अहम मकसद समूचे भारत में साम्प्रदायिक तनाव भड़काना है. खुफिया एजेन्सियों द्वारा दी गई हमले की पूर्व चेतावनी में ही इस परिणाम को चिन्हित किया गया था. इस आतंकी हमले के बाद इस प्रकार के साम्प्रदायिक तनाव और नफरत भड़काने के प्रयासों को मुंहतोड़ जवाब देना सबसे महत्वपूर्ण कार्यभार है. कश्मीरी जनता ने इस महत्वपूर्ण कार्यभार को पूरा करने में अगुवा पहल ले ली है.

10 जुलाई को हुए हमले के तुरंत बाद कश्मीरी नागरिक हमले में बचे घायल यात्रियों को रक्तदान करने दौड़ पड़े. कश्मीरी नागरिक समाज के समूहों ने हमले के खिलाफ श्रीनगर में एक प्रतिवाद संगठित किया, जिसमें उन्होंने इन हत्याओं पर क्षोभ जाहिर करते हुए इसकी तीव्र निंदा की. वर्ष 2010 में कश्मीर की सड़कों पर प्रतिवाद करने के दौरान पुलिस और अर्ध-सैनिक बलों द्वारा मारे गये कश्मीरी युवकों के माता-पिताओं ने अमरनाथ यात्रा में मारे गये तीर्थयात्रियों के साथ एकजुटता जाहिर करते हुए प्रतिवाद किया, जिसमें उन्होंने हमले के शिकार बने लोगों के परिजनों के साथ शोक-संवेदना का इजहार किया. दिल्ली एवं देश के अन्य हिस्सों में, जिन लोगों ने मुसलमानों को निशाना बनाकर की गई भीड़-हत्याओं की बाढ़ के खिलाफ प्रतिवाद करते हुए ‘नाॅट इन माइ नेम’ का नारा बुलंद किया था, उन्होंने अमरनाथ यात्रियों की हत्या के खिलाफ भी प्रतिवाद संगठित किये. मानवता का प्रदर्शन करने वाले ये प्रयास, निहित राजनीतिक स्वार्थ की रोटी सेंकने के लिये नफरत भड़काने की कोशिशों के मुकाबले में भारी पड़े. नागरिकों ने हर किस्म के साम्प्रदायिक हमले का मुंहतोड़ जवाब देने और प्रतिवाद करने में आगे बढ़कर हिस्सा लिया, चाहे हमले के शिकार किसी भी धार्मिक समुदाय के क्यों न हों. मगर प्रधानमंत्री की प्रतिक्रिया इसके ठीक विपरीत रही जिसमें उनकी पक्षधरता जाहिर हो गई. प्रधानमंत्री मोदी ने अमरनाथ यात्रियों पर हमले के शिकार हिंदू तीर्थयात्रियों के लिये तो तुरंत सहानुभूति जाहिर कर दी – मगर इससे विभिन्न हिंदू गिरोहों द्वारा की जा रही हत्याओं के शिकार मुसलमानों के परिजनों के साथ इसी किस्म की सहानुभूति जाहिर करने में उनकी नाकामी साफ तौर पर जाहिर हो गई.

सोशल मीडिया पर नफरत भड़काने वाले बहुतेरे हल्लाबाज (ट्राॅल्स’) – जो प्रधानमंत्राी का आक्रामक ढंग से समर्थन करने के लिये कुख्यात हैं – यह मांग कर रहे हैं कि इस हमले के प्रतिशोध स्वरूप कश्मीरियों को ‘जिबह’ किया जाय, उनका सफाया किया जाय और जिंदा जला दिया जाय. गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने अपने जिम्मेवारी बोध का परिचय देते हुए इस किस्म के नफरत भड़काने वाले बयानों का विनम्रता के साथ खंडन किया, जो मोदी मंत्रिमंडल के किसी सदस्य के लिये सचमुच विरल उदाहण है. उनके विनम्र ट्वीट की तारीफ करने और उसे दुहराने के बजाय प्रधानमंत्री समेत उनके अन्य सहयोगियों ने इस पर चुप्पी साध ली, जबकि संघी नफरतगर्दों ने उनकी विद्वेषपूर्ण ढंग से लानत-मलामत की.

समूचे भारत में जनता ने तीर्थयात्रियों की बस के ड्राइवर शेख सलीम द्वारा फायरिंग के सामने पड़ने के बावजूद आपा खोने के बजाय साहस से काम लेने और अधिकांश तीर्थयात्रियों की जान बचाने के लिये उसकी तारीफ की है. मगर गुजरात से निकलने वाले कई अखबारों ने झूठी खबरें फैलाते हुए ड्राइवर को (मुस्लिम बताकर) बदनाम करने की कोशिश की है कि हमले में उसकी भूमिका संदिग्ध रही है और वास्तव में तीर्थयात्रियों की जान बचाने में एक हिंदू व्यक्ति का हाथ है – साथ ही इंटरनेट पर नफरत भड़काने वाले कई लोगों ने भी यही कहने की कोशिश की है.

इसी बीच कुछेक गैर-जिम्मेवार टीवी चैनलों ने अपना काम करने और आतंकी हमले के लिये सरकार से सवाल पूछने के बजाय इस झूठी खबर पर आधारित कलंक लेपन को शह देने और इस हमले के लिये मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, ‘नाॅट इन माइ नेम’ प्रतिवादकारियों एवं वामपंथी कार्यकर्ताओं को जिम्मेवार ठहराते हुए उनके खिलाफ नपफरत भड़काने का प्रयास किया है!

यह आवश्यक है कि भारत और कश्मीर घाटी की जनता अमरनाथ यात्रा पर हुए हमले के बाद साम्प्रदायिक तनाव और नफरत भड़काने के प्रयास करने वाली शक्तियों का प्रतिरोध करती रहे और उन्हें परास्त करे. उन्हें यह मांग भी करनी होगी कि इस हमले को अंजाम देने वालों की शिनाख्त करने तथा उनको सजा देने के लिये एक विश्वसनीय जांच पैनल नियुक्त किया जाय, और सुरक्षा नियमों में जिस चूक की वजह से इस हमले को कामयाब होने दिया गया, उसके लिये वर्तमान सरकारों को जिम्मेवार ठहराना होगा.

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