बिहार में न तो कोरोना टेस्ट, न ही प्रवासी मजदूरों को मिल रहा रोजगार #cpiml

अपनी जवाबदेहियों से भाग खड़ी हुई हैं भाजपा-जदयू, चुनाव हड़पने की कर रहीं साजिश
प्रधामनंत्री गरीब कल्याण योजना के नाम पर गरीबों-प्रवासियों से किया गया क्रूर मजाक.
आय व रोजगार के साधन उपलब्ध करवाने पर प्रधानमंत्री ने कुछ भी नहीं कहा.

पटना 2 जुलाई 2020

भाकपा-माले राज्य सचिव कुणाल ने कहा है कि नीतीश कुमार ने कहा था कि प्रवासी मजदूरों को उनकी योग्यता के अनुसार बिहार में ही काम दिया जाएगा, लेकिन ऐसा कहीं कुछ दिख नहीं रहा है. न तो सरकार कोरोना टेस्ट करवा रही है और न ही प्रवासी मजदूरों के लिए रोजगार की व्यवस्था कर रही है. मनरेगा में भी काम नहीं मिल रहा है. नतीजतन, एक तरफ बिहार में कोरोना का विस्फोट हो रहा है, तो दूसरी ओर प्रवासी मजदूर काम की तलाश में एक बार फिर वापस लौटने लगे हैं, जहां उनके रोजगार की कोई गारंटी नहीं है.


भाजपा और जदयू ने पूरी तरह से इन समस्याओं से मुंह फेर लिया है और लोगों को अपने रहमो-करम पर छोड़कर चुनाव की तैयारी में लग गई हैं. जनता के आक्रोश से बचने के लिए ये ताकतें वर्चुअल तरीके से बिहार विधानसभा चुनाव को हड़प लेने की कोशिश कर रही हैं. प्रधानमंत्री मोदी के संबोधन को भी इसी आलोक में देखा जा रहा है.
विगत दिनों प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में गरीबों, प्रवासी मजदूरों के रोजी-रोजगार व आय के बारे में एक शब्द नहीं कहा. गरीबों को मुठ्ी भर अनाज मुहैया कराने की बात उनके साथ क्रूर मजाक नहीं तो और क्या है? देश की जनता की लंबे समय से मांग रही है कि आयकर के दायरे के बाहर के सभी परिवारों को अगले 6 माह तक प्रति माह 7500 रु., 6 महीने तक प्रति व्यक्ति 10 किलो अनाज, मनरेगा में 200 दिन काम व 500 रु. न्यूनतम मजदूरी तथा रोजगार के साधन उपलब्ध करवाए जाएं, लेकिन प्रधानमंत्री मोदी ने निराश ही किया.


उन्होंने अपने संबोधन में महज 5 किलो प्रति माह अनाज देने की बात कही. औसतन हिसाब लगाया जाए तो एक व्यक्ति पर एक दिन में 166 ग्राम अनाज बैठता है. प्रधानमंत्री को यह बताना चाहिए कि 166 ग्राम अनाज में कोई व्यक्ति तीन शाम अपना पेट कैसे भर सकता है?


ऐसा लगता है कि सरकार नमक, तेल, सब्जी, कपड़ा, इलाज, बच्चों की शिक्षा-चिकित्सा आदि चीजों की कोई जरूरत गरीबों के लिए नहीं समझती है. पेट भर भोजन हर एक व्यक्ति का अधिकार है. ‘आत्मनिर्भर’ बनने की बड़ी-बड़ी बातें करने वाली सरकार को सबसे पहले अपने देश की जनता के लिए पेट भर भोजन का इंतजाम करना चाहिए. प्रधानमंत्री के संबोधन में किसानों की कर्ज माफी के संबंध में भी कुछ नहीं कहा गया है.


साथ ही, उनके संबोधन में एक खास समुदाय के त्योहारों को लेकर योजना को उससे जोड़ना आपत्तिजनक है. इस तरह की बातों से यह भी स्पष्ट होता है कि उनकी नजर में जनता की कल्याण की चिंता से ज्यादा बिहार का चुनाव है.

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