खेग्रामस का गाँव और गरीबों की ओर से प्रधानमंत्री के नाम खुला पत्र


माननीय प्रधानमंत्री जी,
लोकतंत्र, सामाजिक न्याय और सामाजिक सौहार्द के संघर्षों की ऐतिहासिक धरती , बिहार में आप ऐसे समय में चुनावी सभा करने आ रहे हैं जब अवाम का ध्यान सीमा पर बने तनाव पर है. जब पूरा मुल्क विंग कमांडर अभिनंदन की सकुशल वापसी चाहता था और मुल्क के प्रधानमंत्री के बतौर आपकी यह प्राथमिकता होनी चाहिए थी, आप ‘मेरा बूथ सबसे मजबूत अभियान’ में लगे थे. खैर, देश की जनता इसका फैसला करेगी!


आप राजग की चुनावी रैली सम्बोधित करने गाँधी मैदान, पटना आ रहे हैं! आपका स्वागत है! आपकी राजनीति और एजेंडा पर हमें कुछ नहीं कहना है क्योंकि गांव के मजदूर-किसान आपके अम्बानी-अडानी सरीखे करपोरेटपरस्त किसान-मजदूर विरोधी नीतियों से भलीभांति परिचित हैं। हम गांव और गरीबों से सम्बंधित कुछेक नीतिगत सवालों को आपके समक्ष रखना चाहते हैं. हमारी अपेक्षा होगी कि आप उसका ठोस और युक्तिसंगत जवाब देंगे: -क्या यह सही नहीं है कि आपकी सरकार द्वारा वनाधिकार कानून 2006 पर मजबूती से पक्ष नहीं लिए जाने के चलते दसों लाख आदिवासियों-वनवासियों के समक्ष सुप्रीम कोर्ट के आदेश से बेदखली का तलवार लटक गया है? हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने आपको फटकार लगाते हुए तत्काल बेदखली पर रोक लगा दी है, लेकिन यह मामला हल नहीं हुआ है। क्या यह प्राकृतिक न्याय का उल्लंघन नहीं है, क्या यह औपनिवेशिक शासन के आदिवासी विरोधी नजरिए को एक बार पुनः स्थापित नहीं करता है ? अगर यह बात सही है तो क्या आप की सरकार अध्यादेश लाकर लाखों आदिवासियों – वनवासियों की जमीन – जीविका की रक्षा करेगी ?


आपको इस बात की जानकारी होगी कि बिहार समेत पूरे देश में लाखों दलितों- गरीबों को उजाड़ दिया गया है अथवा उजाड़ने की नोटिस थमा दी गई है क्या यह हाउस टू ऑल के वादे के साथ विश्वासघात नहीं है ? हाउसिंग राइट को मौलिक अधिकार बनाने के प्रति क्या आप की कोई प्रतिबद्धता नहीं है ? क्या यह सही नहीं है कि बिहार में गरीबों को घर देने के बदले गरीब उजाड़ो अभियान चलाया जा रहा है।


नोटबन्दी के समय काले धन पर वार करने की बात आपने बहुत की थी। क्या यह सही नहीं है कि देश में काला धन की बहुत बड़ी मात्रा जमीन और मकान के खरीद फरोख्त में लगा हुआ हैं? बड़ी मात्रा में आवासीय भूखंड और अपार्टमेंट्स मुट्ठी भर लोगों के पास है ? क्या आवासीय भूखंड और अपार्टमेंट्स की हदबंदी भारत जैसे गरीब राष्ट्र के समग्र विकास के लिए जरूरी नहीं है?


आपने 5 -6 लोगों के किसान परिवारों को 500 रु. की मासिक किसान सम्मान योजना शुरू की है। संकटग्रस्त किसानों की कर्ज माफी और लाभकारी मूल्य पर फसलों की अनिवार्य खरीद की गारंटी को नकार कर किसानों के सम्मान की बात करना क्या उनका अपमान नहीं है? क्या यह बात सही नहीं है कि देश के अधिकांश भागों खासकर बिहार में आधी से ज्यादा खेती बटाई पर होती है, उन बटाईदारों जैसे वास्तविक किसानों को लेकर आप की योजना मौन है। क्या यह बड़ी खेतिहर आबादी के साथ मजाक नहीं है?


बिहार के गांव और गरीब बेरोजगारी की भयावह मार के शिकार हैं। ऐसी स्थिति में मनरेगा में मजदूरों को 1 दिन का भी काम नहीं मिलना और राज्य की तय मजदूरी नहीं मिलना क्या गांव गरीबों के साथ महा विश्वासघात नहीं है? देश के लाखों स्कीम वर्कर आशा -रसोईया – आंगनबाड़ी सेविका- सहायिका को न्यूनतम मजदूरी आधारित मानदेय के न्याय संगत सवालों के प्रति आप की सरकार मौन क्यों हैं ? मनरेगा को मारने की आपकी सरकार द्वारा की जा रही कोशिश ग्रामीण गरीबों के साथ क्या जघन्य अपराध नहीं है? असंगठित मजदूरों से जिन्हें जीने लायक न्यूनतम मजदूरी तक नहीं मिलती हैं, प्रतिमाह 100 रु. जमा कराना और उस आधार पर 60 साल के उम्र के बाद 3000 का पेंशन देना क्या मजदूरों के साथ बड़ा छलावा नहीं है ? सभी मजदूरों किसानों को जीने लायक मासिक पेंशन देने की गारंटी करना क्या सरकार की जिम्मेदारी नहीं हैं ?


ठीक ऐसे दौर में जब दलित – गरीबों की बड़ी संख्या शिक्षा के प्रति आग्रही बना है, ऐसी स्थिति में शिक्षा का बाजारीकरण करना और उच्च शिक्षा के क्षेत्र में उनके प्रवेश पर रोक लगाना और 13 प्वाइंट रोस्टर लाकर उनके वाजिब हकों को छीनना क्या दलितों वंचितों के प्रति अन्याय नहीं है ?
हमें उम्मीद है कि पटना की 3 मार्च की रैली में आप हमारे इन प्रश्नों का जवाब देंगे.

अखिल भारतीय खेत एवं ग्रामीण मजदूर सभा

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