संविधान के रक्षक की भूमिका में सर्वोच्च न्यायालय: इसकी सफलताएं और इसकी विफलताएं

अरिंदम सेन

‘आधार’ पर फैसले: दो दृष्टिबिंदुओं का टकराव
2017 में गोपनीयता के बारे में जो मील-का-पत्थर फैसला आया, उसके मूल में ‘आधार’ संबंधी विवाद ही मौजूद था; और बहुतों को उम्मीद थी कि इसके बाद सर्वोच्च न्यायालय सर्वसत्तावादी घुसपैठिया राज्य के इस हथियार को खत्म कर देगा. लेकिन इस वर्ष 26 सितंबर को यह उम्मीद चकनाचूर हो गई. बहुमत के फैसले ने इस मामले में राष्ट्र को निराश कर दिया, हालांकि डा. चंद्रचूड़ के अल्पमत फैसले ने सर्वोच्च न्यायालय को आइना दिखा दिया कि उसका फैसला कहां-कहां और कितना गलत था. इस प्रकार हमारे सामने दो बिल्कुल विरोधी फैसले हैं जो न केवल कानूनी व्याख्याओं पर टकराते हैं – यह कोई असामान्य बात नहीं है – बल्कि तथ्यों के स्तर पर भी वे टकराते हैं, जो यकीनन कलंकित करने वाली नहीं, तो एक भद्दी बात जरूर है. यहां हम इन दो फैसलों में निहित टकराव के मुख्य बिंदुओं पर नजर डालेंगे – इसमें एक फैसला उसकी तरफदारी करता है जिसका बिल्कुल समर्थन नहीं किया जा सकता है, जबकि दूसरा फैसला समूची ‘आधार’ योजना की कड़ी संवैधानिक जांच-पड़ताल करता है और इसे असंवैधानिक करार देता है.

कल्याणकारी उपाय या बहिष्करण का औजार ?
‘आधार’ के विरोधी याचिकाकर्ताओं ने न्यायालय के समक्ष अत्यंत विश्वसनीय साक्ष्य देते हुए चिंताजनक हद की अभिवंचना को दिखाया और बताया कि ‘आधार’ में दर्ज 27 प्रतिशत विशाल आबादी को उनके अधिकारों से वंचित कर दिया गया है. उन्होंने दिखाया कि ‘आधार’ के अपने 99.76 प्रतिशत शुद्धता के दावे का मतलब है 0.24 प्रतिशत की विफलता – जिसका तात्पर्य यह है कि 27.60 लाख लोगों को गलत ढंग से उन्हें मिलने वाले लाभों से वंचित कर दिया गया है.

भारी-भरकम मात्रा में पेश किए गए दोषारोपण साक्ष्यों की पूरी अनदेखी करते हुए मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अगुवाई में बहुमत ने – 2013 की इस कोर्ट की शर्मनाक बहुमतवादी स्थिति का दुर्भाग्यपूर्ण दुहराव करते हुए1 – बड़ी सहजता से कह दिया कि “जब इससे [आधार-आधारित बायोमेट्रिक अभिप्रमाणन (एबीबीए) प्रक्रिया सेह् करोड़ों जरूरतमंद लोगों के बहुत बड़े हितों की पूर्ति होती है, तो कुछ लोगों के बहिष्करण के अप्रमाणित तर्क के आधार पर इसे शूली पर नहीं चढ़ाया जा सकता है.]

“प्रमाणित तर्क!” “कुछ लोगों का बहिष्करण”! – यह तो काफी दुखद है. क्या वह छोटी स्कूली बच्ची संतोषी भाजपा-शासित झारखंड में ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ का क्रूर मजाक बनाते हुए भात के लिए रोती-बिलखती मौत का शिकार नहीं हो गई? और यह कौन नहीं जानता है कि यह प्रमाणन की प्रक्रिया नेटवर्क की समस्या अथवा शारीरिक श्रम, वृद्धावस्था या जख्म के चलते उंगलियों के निशान या आंख की पुतलियों जैसे बायोमेट्रिक सूचकों में गड़बड़ी की वजह से अक्सरहा नाकाम हो जाती है? और यह कि इन बायोमेट्रिक गड़बडि़यों के चलते करोड़ों लोग ‘आधार’ में पंजीकरण से बाहर रह जाते हैं और इस प्रकार धीरे-धीरे अपनी क्रूर मौत की ओर धकेल दिए जाते हैं?

ऐसी दर्दनाक जमीनी हकीकत से बे-असर, सम्मानजनक जीवन के मौलिक अधिकार के ऐसे निंदनीय नकार से बे-असर, मुख्यतः कोर्ट में यूआइडीएआइ अध्यक्ष द्वारा प्रस्तुत ‘पावर प्वाइंट प्रेजेंटेशन’ के आधार पर बहुमत का फैसला सुना दिया गया. यह तो हैरत की ही बात है कि डिजिटल इंडिया के ये विद्वान न्यायाधीश इस ‘पावर प्वाइंट’ से इतने सम्मोहित हो गए कि उन लोगों ने इस महत्वपूर्ण तथ्य को ही नजरअंदाज कर दिया कि, याचिकाकर्ताओं द्वारा प्रस्तुत तथ्यों के विपरीत, यह ‘पावर प्वाइंट’ कोई हलफनामा नहीं था और इसीलिए साक्ष्य के बतौर उसकी कोई कानूनी वैधता नहीं थी. अथवा यह भी हो सकता है कि ये न्यायाधीश उसमें बड़ी सहजता से कोई खास, कोई चतुराई-भरी चीज देख रहे हों जिससे अपने ओछे (यह कहने के लिए दुख है) तर्कों को कुछ हद तक स्वीकार्य बनाया जा सके !

बहरहाल, अल्पमत का फैसला बचाव पक्ष के तर्कों की धज्जियां उड़ा देता है. जो बात सर्वविदित है और जिसे याचिकाकर्ताओं ने निर्णयात्मक ढंग से पुनर्स्थापित किया था, उसे यह फैसला स्वीकार करता है – कि, बहिष्करण का खतरा एबीबीए इकोसिस्टम की रूपरेखा में ही, और खुद ‘आधार’ ऐक्ट में ही, अंतर्निहित है. उन्होंने 2016-17 के आर्थिक सर्वेक्षण तथा ज्यां द्रेज व रीतिका खेरा जैसे प्रख्यात कार्यकर्ता विद्वानों की सर्वेक्षण रिपोर्टों आदि का हवाला दिया – इनमें सब के सब यह दर्शाते हैं कि बहिष्करण का प्रतिशत काफी ज्यादा रहा है. सर्वोच्च न्यायालय इसकी अनुमति नहीं दे सकता है. वे दावा करते हैं कि “सामाजिक कल्याण के लाभों के प्रावधान में नाकामी की किसी भी दर को स्वीकार्य नहीं माना जा सकता है. खाद्यान्न जैसे मामले में बुनियादी अधिकारों के साथ कोई गलती नहीं की जा सकती है. भोजन से इनकार करने का मतलब है किसी परिवार को चरम बदहाली, कुपोषण और यहां तक कि मौत की ओर धकेल देना.” इसीलिए, अल्पमत का फैसला यह कहता है कि एबीबीए को अनिवार्य बनाने के पूर्व यह सुनिश्चित कर देना होगा कि इसे लागू किए जाने की सामान्य प्रक्रिया में वह आम लोगों को बहिष्कृत नहीं करेगी और धारा 14 व 21 के अधिकारों से उन्हें वंचित नहीं करेगी.

टेक्नोलॉजी, शक्ति और हाशिये के लोग
इसमें कोई दो मत नहीं कि टेक्नोलॉजी ही शक्ति है. लेकिन सवाल यह है कि इसका इस्तेमाल कौन किसके खिलाफ करता है? बहुमत बेंच के लिए यह कोई सवाल ही नहीं बना. लेकिन एकमात्र विरोधी जज के लिए यह बहुत महत्वपूर्ण मुद्दा था. इसीलिए, उन्होंने शुरू में ही कहा, “हमारे फैसले में टेक्नोलॉजी और शक्ति के अंतर्संबंध पर जरूर विचार होना चाहिए, और उन्होंने बताया कि बायोमेट्रिक आंकड़े किस प्रकार “पहले से मौजूद असमानताओं को जारी रखने” में ही सहायक होते हैं. उन्होंने अपने फैसले के अंत में इस मुद्दे को पुनः उठाया और इस सीधे सच्चे तथ्य पर फिर से जोर दिया – जिसे बहुमत ने हठपूर्वक देखने से इनकार कर दिया – कि “बायोमेट्रिक उपकरणों के जरिए होने वाले बहिष्करण का हाशिये पर खड़े लोगों और निर्धनों की जिंदगी पर विपरीत असर पड़ता है.” अपने विचार के समर्थन में चंद्रचूड़ अलबनी विश्वविद्यालय में राजनीति शास्त्र की सहायक प्राध्यापक विरजीनिया यूबैंक्स के शोध का हवाला देते हैं. इन्होंने अपने हालिया शोधपत्र ‘ऑटोमेटिंग इनइक्वलिटी: हाउ हाईटेक टूल्स प्रोफाइल, पुलिस, एंड पनिश द पुअर’ में यह दिखाया है – जैसा कि चंद्रचूड़ ने प्रस्तुत किया – “स्वचालित निर्णयकारी टेक्नोलॉजी गरीबों के लिए कल्याणकारी योजनाओं में सहायक भी भूमिका अदा नहीं करती है, बल्कि वह महज दरवाजे पर खड़े संतरी की भूमिका निभाती है…” और इसीलिए उनका मानना है कि “गरीबों के लाभ पाने के अधिकारों को ‘आधार’ के प्रमाणन के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता है.” पीठ के अन्य न्यायाधीश, इसके विपरीत, भोजन और काम को अधिकार मानने से ही इन्कार कर देते हैं और सार्वजनिक वितरण प्रणाली व ‘मनरेगा’ जैसी योजनाओं से निर्धनतम भारतीयों के बहिष्करण के औजार के बतौर इस्तेमाल हो रहे ‘आधार’ को जायज करार देते हैं.

आंकड़ों की सुरक्षा और गोपनीयता से जुड़े सरोकार
सब को पता है कि जानबूझ कर किए जा रहे अथवा अनजाने में ही हो रहे आंकड़ों के रिसाव (लीकेज) और ‘आधार’ के आंकड़ों (डाटाबेस) की हैकिंग की बेशुमार घटनाएं सामने आ रही हैं. इनमें से कुछ घटनाओं की संक्षिप्त चर्चा कर लेना यहां उचित होगा: अमेरिका-आधारित विशालकाय सोशल नेटवर्किंग ‘फेस बुक’ और ब्रिटिश डाटा एनलाइटिक (विश्लेषण) फर्म ‘कैंब्रिज एनलाइटिका’ द्वारा आंकड़ों को बाहर निकालने का प्रकरण; सरकारी वेबसाइटों के जरिए ‘आधार’ आंकड़ों की ऑनलाइन लीकिंग की अनेकानेक घटनाएं (मसलन, आरटीआइ द्वारा पूछे गए एक सवाल के जवाब में यूआइडीएआइ को बताना पड़ा कि लगभग 210 सरकारी वेबसाइटों ने इंटरनेट पर ‘आधार’-धारकों की सूचनाएं जारी कर दीं हैं; गुजरात-आधारित तीन वेबसाइटों ने अपने साइट पर लाभुकों की ‘आधार’ संख्या डाल दी; झारखंड के सामाजिक सुरक्षा निदेशालय द्वारा संचालित एक वेबसाइट ने तकनीकी गड़बड़ी के चलते लगभग 16 लाख लोगों के ‘आधार’ आंकड़े उजागर कर दिए, आदि, आदि); ‘द ट्रिब्यून’ ने एक घोटाले का पर्दाफाश किया है जिसमें कुछ सौ रुपयों के एवज में किसी भी लाभुक – जिसकी ‘आधार’ संख्या ज्ञात है – के ‘आधार’ आंकड़ों को “बेच देने” की घटनाएं शामिल हैं;  यह तथ्य कि यूआइडीएआइ को आधार-सेवाएं प्रदान करने का दावा करने वाले कई ‘धोखेबाज वेबसाइटों’ और मोबाइल ऐप्स को बंद करना पड़ा है तथा लगभग 1000 ऑपरेटरों को ‘काली सूची’ में डालना पड़ा है और इस किस्म के कदाचार के लिए उसने कम से कम 20 लोगों के खिलाफ एफआइआर दर्ज किया है. … इस तरह की घटनाओं का कोई अंत नहीं है.

इसके अलावा राष्ट्रीय संप्रभुता से जुड़े सरोकार भी हैं जो इस तथ्य से सामने आते हैं कि यूआइडीएआइ ने एल-1 पहचान प्रणाली के साथ एक अनुबंध पर दस्तखत किए हैं जो सीआइए की एक करीबी कंपनी के बतौर जानी जाती है. इससे एल-1 कंपनी को हमारे बायोमेट्रिक आंकड़ों तक पहुंचने का रास्ता मिल जाता है, क्योंकि एल-1 प्रणाली के पास ही बायोमेट्रिक डाटाबेस का स्रोत कोड मौजूद रहता है. और, बात यहीं खत्म नहीं होती है. ‘विकीलीक्स’ ने ट्वीट करते हुए यह दावा किया है कि हमारे डाटाबेस तक सीआइए पहुंच जा सकता है. अनेकानेक ट्वीट्स में यह बताया गया है कि ‘आधार’ आंकड़ों तक जा पहुंचने के लिए सीआइए क्रॉस मैच टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल कर रहा है. मार्केट रिसर्च उद्यम ‘वेलोसिटी एमआर’ ने बताया है कि इन सब चीजों से भारतीय नागरिकों की लंबे समय से चली आ रही चिंता काफी बढ़ गई है और बहुत संभावना है कि उन पर निगरानी रखी जा रही हो तथा उनकी निजी सूचनाओं का गलत इस्तेमाल किया जा रहा हो. इस चिंता पर गौर करते हुए बहुमत के फैसले में ‘आधार’ ऐक्ट की कुछ धाराओं (खासकर धारा 57, जो बैंकों और दूर संचार सेवा प्रदाताओं समेत निजी कंपनियों को ‘आधार’ संख्या मांगने की छूट देती है) को असंवैधानिक करार दिया गया है. निश्चय ही, यह एक स्वागतयोग्य कदम है. लेकिन बहुमत का फैसला ‘जियो’ जैसी निजी संस्थाओं के पास मौजूद विशाल आंकड़ा भंडार पर आराम से चुप्पी साध लेता है – निजी कंपनियां इन आंकड़ों के सहारे भारी-भरकम मुनाफा बटोर रही हैं और आगे भी वे ऐसा करती रह सकती हैं. यह फैसला लोगों को ऐसे स्कीम से बाहर निकल आने की भी छूट नहीं देता है, जिसमें उचित तरीके से पूर्व सूचना दिए बगैर आंकड़े इकट्ठा कर लिए जाते हैं. इसके विपरीत अल्पमत का फैसला काफी आगे बढ़कर यह निर्देश देता है कि निजी संस्थाओं के पास मौजूद ऐसे तमाम आंकड़ों को जल्द से जल्द नष्ट कर देना चाहिए (यह अलग बात है कि राज्य अधिकारियों और कॉरपोरेट शक्तियों से यह उम्मीद नहीं की जा सकती है कि वे अल्पमत के इस फैसले – जो बाध्यकारी नहीं है – के अनुरूप कार्य करेंगे).

सर्वोच्च न्यायालय का उल्लंघन और संविधान के साथ छल
बहुमत का फैसला काफी निराशाजनक तो है ही, इसके अलावा कोर्ट ने इस मामले को निपटाने में कछुए की चाल चलते हुए वर्षों लगा दिए. कोर्ट ने कई अंतरिम आदेश भी दिए थे जिसमें केंद्र सरकार को कहा गया था कि वह तमाम किस्म के लाभ प्राप्त करने के लिए ‘आधार’ को अनिवार्य बनाने से परहेज करे. सरकार ने निर्लज्जतापूर्वक उन सब आदेशों की अवहेलना की, और कोर्ट चुपचाप देखता रहा तथा इस पूरी परियोजना को हमारे निजी व सार्वजनिक जीवन के हर क्षेत्र में अपना जहरीला पंजा फैलाने की छूट देता रहा. इसके बाद, कोर्ट ने इसमें कुछ छोटी-मोटी कटौतियां और सुधार करके इसे वैधता के संकट से उबारने में भी मदद की और यह तर्क दे डाला कि ‘आधार’ एक अनूठी चीज है और इसीलिए सर्वोत्तम से भी ज्यादा अच्छा है (कोई उनसे पूछे, क्या यह वैसा ही ‘अनूठा’ है जैसा कि डिजिटल इंडिया की एक अन्य ‘अनूठी’ उपलब्धि – विनाशकारी 86 प्रतिशत नोटबंदी – थी ?)

बहरहाल, अल्पमत का फैसला कर्तव्यपालन में कोताही के लिए सरकार की गिरेबान पकड़ने से नहीं चूकता है. इस फैसले में कहा गया कि “इस कोर्ट के अंतरिम आदेशों और इसके संस्थागत प्राधिकार की अवज्ञा … का नतीजा किसी आम नागरिक की जिंदगी के लिए जरूरी सब्सिडियों व अन्य लाभों से नकार के बतौर भी सामने आया है…. कोर्ट के अंतरिम आदेशों के बावजूद जिस निर्लज्जतापूर्ण ढंग से ‘आधार’ को अनिवार्य बनाने वाली अधिसूचना जारी की गई, वह बेहद चिंता की बात है.”

इस एकमात्र विरोधी फैसले में आगे कहा गया, “अगर सरकारें जानबूझ कर न्यायिक निर्देशों की अनदेखी करने के लिए स्वतंत्र होंगी, तो क्या नागरिकों के लिए कोई भिन्न मापदंड अपनाया जा सकेगा ?… हमारे अंतरिम आदेशों की खुली अवहेलना को देखते हुए हमारे पास मजबूत कदम उठाने के अलावा कोई अन्य रास्ता नहीं बच जाता है.”

वास्तव में जस्टिस चंद्रचूड़ ने सख्त कदम उठाया और उन्होंने आधार बिल को ‘मनी बिल’ के बतौर छलपूर्वक पारित कराने पर करारी चोट की – जिसे अन्य न्यायाधीशों ने लोकसभा अध्यक्ष का विशेषाधिकार मानते हुए सहजता से स्वीकार कर लिया था. उन्होंने लोस अध्यक्ष के जरिए शासक पार्टी द्वारा इसे ‘मनी बिल’ के बतौर सदन में पेश कराए जाने की इस रणनीति को “संविधान के प्रति छल” बताया और व्याख्या की कि ऐसा क्यों है:

“किसी साधारण बिल को मनी बिल घोषित करने का लोकसभा अध्यक्ष का फैसला राज्य सभा की भूमिका को सीमित कर देता है. संवैधानिक मानदंडों और मूल्यों का उल्लंघन करते हुए मनमाने तौर पर लोकसभा अध्यक्ष की शक्तियों का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है, क्योंकि इससे द्वि-सदनी संघवाद का मूलतत्व ही क्षतिग्रस्त हो जाता है जो हमारे संविधान के बुनियादी ढांचे का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है. कोई बिल मनी बिल है या नहीं, इस मामले में लोस अध्यक्ष के फैसले की न्यायिक समीक्षा इस वजह से जरूरी हो जाती है ताकि संविधान के बुनियादी ढांचे की हिफाजत की जा सके. …”

अल्पमत का यह फैसला अपने अंतिम पैराग्राफ ‘निष्कर्ष’ में अपनी तार्किक परिणति पर पहुंच कर घोषित करता है:
“वर्ष 2009 से ही यह समूचा ‘आधार’ कार्यक्रम संवैधानिक ढुलमुलपन और मौलिक अधिकारों के उल्लंघन से ग्रस्त रहा है. ‘आधार’ ऐक्ट का क्रियान्वयन इस ‘आधार’ परियोजना को नहीं बचा सकता है. यह ‘आधार’ ऐक्ट, इसके तहत बनाए गए कायदे-कानून और इस ऐक्ट के क्रियान्वयन के पूर्व निर्मित पूरा खाका – ये सब के सब असंवैधानिक हैं.”

भीमा कोरेगांव गिरफ्तारियां: सर्वोच्च न्यायालय ने विरोधी आवाज को कुचलने के प्रयासों को माफ किया

हम सब सर्वेाच्च न्यायालय में रोमिला थापर और अन्य लोगों द्वारा दायर लोकहित याचिका (पीआइएल) की पृष्ठभूमि और तथ्यों से अवगत हैं; इसीलिए हम सीधे मुख्य मुद्दे पर आ जाते हैं.

पुणे पुलिस ने गिरफ्तार किए गए मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और वकीलों के खिलाफ – कोर्ट में नहीं, बल्कि प्रेस बयानों में – जो गंभीर आरोप लगाए हैं, उनमें से एक यह है कि ये लोग प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी की हत्या की साजिश में शामिल थे. स्पष्टतः, आरोपियों के खिलाफ मीडिया उन्माद भड़काने का यह एक राजनीति-प्रेरित प्रयास था. सर्वोच्च न्यायालय पीठ के बहुमत ने इस पीआइएल की सुनवाई करते हुए इस महत्वपूर्ण तथ्य से नजरें चुरा लीं और साथ ही महाराष्ट्र पुलिस की गंभीर प्रक्रियागत भूल को भी नजरअंदाज कर दिया (मसलन, जिन गवाहों ने गिरफ्तारी और सर्च वारंट पर दस्तखत किए थे, वे स्थानीय निवासी नहीं थे, उन्हें पुणे से लाया गया था). बहुमत पीठ ने पेश किए गए साक्ष्य की भी जांच-परख नहीं की और सर्वोच्च न्यायालय की निगरानी में एसआइटी जांच चलाने की प्रार्थना को भी अस्वीकार कर दिया. पीठ ने आंशिक और तात्कालिक राहत देते हुए केवल गिरफ्तारी को नजरबंदी (होम अरेस्ट) की सजा में बदल दिया और इस दौरान इन कार्यकर्ताओं को संबंधित कोर्ट में जमानत के लिए अपील करने की अनुमति दे दी.

जस्टिस चंद्रचूड़ ने इस घुटनाटेकू स्थिति से बड़ी असहमति जाहिर करते हुए कहा: “अनुसंधान की प्रक्रिया को (पुलिस के प्रेस बयानों के दौरान) यह आरोप लगाकर भटकाने का प्रयास किया गया कि प्रधान मंत्री की हत्या की साजिश की गई थी. यह निश्चय ही एक गंभीर किस्म का आरोप है. ऐसे आरोपों पर जिम्मेदार ढंग से ध्यान देने की जरूरत है और इन पर प्रेस कंफ्रेंस में पुलिस अधिकारियों के द्वारा चर्चा नहीं की जा सकती है. लेकिन इस सुनवाई के दौरान एएसजी ने ऐसा कोई वक्तव्य नहीं दिया कि इन पांचों लोगों के मामले में ऐसा कोई अनुसंधान चलाया जा रहा है. इसके विपरीत, उन्होंने साफ-साफ कहा कि ऐसा कोई आधार नहीं बनता है जिससे प्रधान मंत्री की हत्या की कथित साजिश के साथ इन पांच गिरफ्तार व्यक्तियों का रिश्ता जोड़ा जा सके.”

इस चालबाजी – जिसे जस्टिस चंद्रचूड़ “जनमत बनाने के लिए इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का चुनिंदा इस्तेमाल” बताते हैं – उन्होंने कहा कि महाराष्ट्र पुलिस पूर्वाग्रह से ग्रस्त है और कि उस पर भरोसा नहीं किया जा सकता है.2 उन्होंने जोर देकर कहा कि “कोर्ट को उन लोगों की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए सजग रहना होगा जो अ-लोकलुभावन मुद्दे उठाते हैं. विपक्ष की आवाज को सिर्फ इसलिए नहीं दबाया जा सकता है कि वह विरोधी आवाज है.” उन्होंने यह भी कहा कि कोर्ट की निगरानी में इस मामले की एसआइटी जांच जरूरी है.

फुटनोट:

1. उस वर्ष सर्वोच्च न्यायालय ने 2009 के दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले (जिसमें समलैंगिकता को अपराध नहीं माना गया था और एलजीबीटी अधिकारों को मान्यता दी गई थी) को यह कहते हुए उलट दिया कि “अत्यंत तुच्छ अल्पसंख्या” (अर्थात् एलजीबीटी) संवैधानिक संरक्षा पाने की हकदार नहीं हैं. फिर, 2017 के गोपनीयता संबंधी फैसले में सर्वोंच्च न्यायालय ने 2013 में अपनाई गई अपनी खुद की स्थिति को साफ-साफ खारिज कर दिया और माना कि किसी एक व्यक्ति का भी अधिकार अनुल्लंघनीय है. अब, यह ‘आधार’ फैसला वास्तव में कोर्ट को उसी असंवेदनशील, बहुसंख्यावादी दृष्टिकोण की ओर वापस ले जाता है जो यह मानता है कि जब “करोड़ों लोगों” को लाभ मिल रहा हो, तो अल्पसंख्या (“कुछ”) के हितों को तिलांजलि दी ही जा सकती है – यह ऐसी अवधारणा है जो उस संवैधानिक नैतिकता को ही दागदार बना देती है जिसकी दुहाई देते सर्वोच्च न्यायालय थकता नहीं है.

2. महाराष्ट्र और दिल्ली की भाजपा सरकारों की ओछी नीयत पुनः स्पष्ट हो गई जब भीमा कोरेगांव में दलित हिंसा के असली मुजरिमों संभाजी भिंडे और मिलिंद एकबोटे के खिलाफ चल रहे मुकदमों को वापस ले लिया गया. अभी हाल ही में, महाराष्ट्र पुलिस ने पुणे सत्र न्यायालय में दायर अपने चार्जशीट में एक बार फिर 6 जून को गिरफ्तार कार्यकर्ताओं के खिलाफ प्रधान मंत्री की हत्या करने की माओवादी साजिश में संलिप्त रहने का आरोप लगा दिया.
(अगले अंक में जारी …)

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