विधानसभा चुनाव 2018: फासीवादी राजनीति को करारा धक्का

अब चाहे आप इस परिघटना पर किसी भी कोण से विचार करें, पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों ने भारत में फासीवाद-विरोधी प्रतिरोध और जनता के आंदोलनों को आत्मविश्वास और नई ऊर्जा प्रदान की है.

खास तौर पर तीन हिंदी-भाषी राज्यों मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में भाजपा की हार केन्द्र और राज्यों में सत्तारूढ़ भाजपा सरकारों की नीतियों और उसके प्रदर्शन के खिलाफ सुनाई गई सजा है, और इससे भाजपा और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के अभेद्य और अजेय होने के दावों की पोल खोल दी है. भाजपा का छत्तीसगढ़ में तो सदमा देने वाला सफाया हो गया है, और राजस्थान में बड़ा नुकसान हुआ है. यहां तक कि मध्य प्रदेश में, जहां कांटे की लड़ाई चल रही थी, कांग्रेस ही सबसे बड़ी एकल पार्टी के रूप में उभरी है जो अब वहां सरकार बनाने को तैयार है.

हां जरूर, भाजपा इन चुनावी पराजयों की रत्ती भर भी जवाबदेही से नरेन्द्र मोदी को बचाने की कोशिश कर रही है, और वह दावा कर रही है कि ये नतीजे केवल उन पृथक्-पृथक् राज्यों में सत्तारूढ़ सरकारों के खिलाफ और राज्यस्तरीय भाजपा नेतृत्व के खिलाफ “एन्टी-इन्कम्बेंसी” (शासन में रहने के चलते लोगों के विक्षोभ का निशाना होने) का नतीजा है. खास तौर पर भाजपा इस बात को नामंजूर करने में जुटी हुई है कि इन विधानसभा चुनावों का कोई असर पांच महीने बाद मई 2019 में होने वाले संसदीय चुनावों पर भी पड़ेगा. मगर कई कारणों के चलते यह दावेदारी बहुत खोखली दिख रही है.

यह नहीं भुलाया जा सकता कि अमित शाह और भाजपा ने जीत के उल्लास में दावा किया था कि महाराष्ट्र, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों के नतीजे मोदी सरकार के प्रदर्शन के बारे में जनमतसंग्रह थे- तो भी भला वही भाजपा अब कैसे दावा कर सकती है कि विधानसभा चुनावों के ताजातरीन चक्र का मोदी सरकार के प्रदर्शन से कोई लेना-देना नहीं है? अपनी विफलता को छिपाने के लिये विमर्श को राम मंदिर की ओर मोड़ देने की कोशिश, गरीबों पर विनाश का कहर ढाने की जिम्मेवारी, बेलगाम भ्रष्टाचार के साथ उसकी मिलीभगत, लोकतंत्र और उसकी संस्थाओं का क्षय करने की कोशिश, और यहां तक खुद अपनी पसंद से चुने गये रिजर्व बैंक के गवर्नर उर्जित पटेल जैसे लोगों द्वारा मोदी सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव से लोगों का ध्यान भटकाने के प्रयास मतदाताओं को साफ नजर आ रहे थे.

इसके अलावा खुद मोदी, अपने सहकर्मी स्टार प्रचारक अमित शाह और “योगी” आदित्यनाथ, जिन्होंने विधानसभा चुनावों के दौरान प्रचार को राष्ट्रीय राजनीति पर (राम मंदिर, मुसलमानों को नीचा दिखाने के लिये जगहों का नाम बदलने का अभियान, मुसलमानों को “अवैध आप्रवासी” (घुसपैठिये) और “बिरयानी खाने वाले आतंकवादी” बताना, “अली” के खिलाफ मुकाबले में “बजरंगबली” को खड़ा करना, “अर्बन नक्सल”, पटेल की मूर्ति और नेहरू की निंदा) केन्द्रित कर रखा था, राज्य सरकारों का शासन कैसा रहा इस पर उनका कोई जोर ही नहीं था.

संभवतः छत्तीसगढ़ के चुनाव का नतीजा भाजपा केन्द्रीय नेतृत्व के राजनीतिक एजेंडा के खिलाफ सबसे निर्णायक और महत्वपूर्ण फटकार है. छत्तीसगढ़ को एक्जिट पोल में कांटे की टक्कर बताया गया था, इसलिये उस राज्य में कांग्रेस को मिली विशाल पैमाने पर विजय का अनुमान पहले नहीं लगाया जा सका था. यहां तक कि निवर्तमान मुख्यमंत्री रमन सिंह बड़ी मुश्किल से इस चुनाव में अपनी सीट बचा सके. बस्तर में चुनाव प्रचार अभियान चलाते हुए खुद मोदी ने “अर्बन नक्सल” को दानव बताया था – जाहिर तौर पर उनका आशय सुधा भारद्वाज एवं अन्य मानवाधिकार कार्यकर्ताओं एवं पत्रकारों से था जिन्हें या तो गिरफ्तार किया जा चुका है या फिर छत्तीसगढ़ से राजनिकाला दिया जा चुका है. बस्तर और छत्तीसगढ़ के मतदाताओं ने प्रधानमंत्री, उनके गोदी मीडिया घरानों और पुलिस द्वारा प्रचारित किये गये “अर्बन नक्सल” के हौवे का करारा जवाब दिया है. छत्तीसगढ़ में आदित्यनाथ ने राज्य की ईसाई आबादी को भी दानवी प्रकृति का बताया था और उन पर राम द्वारा परास्त किये जा चुके “राक्षसी शासन” को पुनः कायम करने के प्रयास में आदिवासियों का जबर्दस्ती धर्मांतरण करने का आरोप लगाया था. आरएसएस ने छत्तीसगढ़ एवं अन्य राज्यों में आदिवासियों का हिंदूकरण करने और सम्प्रदायीकरण करने की शेखी बघारी है, और आदित्यनाथ ने तो इतना तक इशारा कर दिया कि वानर देव हनुमान दरअसल जंगल में रहने वाले आदिवासी ही थे. साथ ही भाजपा सरकारों ने छत्तीसगढ़, झारखंड एवं अन्य राज्यों में आदिवासियों के खिलाफ चरम बर्बर किस्म का आतंक और लूट-खसोट मचाई है. छत्तीसगढ़ के नतीजे इस बात का सुस्पष्ट इशारा है कि आदिवासी लोगों ने साफ तौर पर संघ और भाजपा के साम्प्रदायिक-कारपोरेट एजेंडा के खिलाफ जनादेश दिया है.

मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान और तेलंगाना में आदित्यनाथ ने 74 रैलियों को सम्बोधित किया, अमित शाह ने 56 रैलियों को और खुद नरेन्द्र मोदी ने 31 रैलियों को सम्बोधित किया. निस्संदेह रूप से इन तीनों प्रचारकों को भाजपा ने ही चुना था कि वे पार्टी का केन्द्रीय चुनावी संदेश इन जगहों पर पहुंचा दें. आदित्यनाथ की रैलियों में “राम”, मंदिर और मुसलमानों को निशाना बनाने को अपने प्रचार की मुख्य थीम बनाया था. आदित्यनाथ और अमित शाह दोनों ने यह इशारा दिया था कि कांग्रेस और राहुल गांधी अ-हिंदू और मुस्लिम-पक्षधर हैं. अमित शाह ने उन लोगों के खिलाफ, जिन्हें वे “अवैध आप्रवासी” या घुसपैठिये (मुसलमानों के लिये प्रयुक्त साम्प्रदायिक कोडवर्ड) बता रहे थे, नफरत भड़काने का पूरा प्रयास किया कि वे “कांग्रेस अध्यक्ष के चचेरे भाई” हैं और वादा किया कि वे उन्हें “उठा कर बाहर फेंक देंगे.” मोदी के प्रचार की मुख्य थीम रही कांग्रेस सरकारों तथा नेहरू से लेकर राहुल गांधी तक के नेतृत्व की मिट्टी पलीद करना, और साथ ही उन्होंने नोटबंदी और जीएसटी से मची तबाही को, या फिर भारी पैमाने के भ्रष्टाचार को, जिसमें वे खुद और उनका अपना कार्यालय सुस्पष्ट रूप से सांठगांठ में रहा था, के बारे में खुल रहे एक के बाद एक सबूतों को स्वीकार करने से कत्तई इन्कार कर दिया.

मिजोरम में कांग्रेस को चुनाव में पराजय का सामना करना पड़ा और तेलंगाना में उनका “महाकुटामी” गठजोड़ तेलंगाना राष्ट्रीय समिति (टीआरएस) के साथ टक्कर नहीं ले सका जबकि टीआरएस ने बड़े बहुमत से जीत हासिल कर ली. कांग्रेस पार्टी हिंदी बेल्ट के राज्यों में अपने पुनरुत्थान का अर्थ निकाल रही है कि यह उसकी “हिन्दू धर्म बनाम हिंदुत्व” की राजनीति की पुष्टि है. इस राजनीति में यह सब अपनी हिंदुवानी को साबित करने के लिये कांग्रेस अध्यक्ष द्वारा मंदिरों की यात्राएं करना और ब्राह्मण होने के प्रमाण के बतौर “जनेऊ” दिखाना और अपना “गोत्र” बताना आदि शामिल है. तथ्य यह है कि इन राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों के दौरान उस दुर्भावनापूर्ण साम्प्रदायिक माहौल का सफलतापूर्वक प्रतिरोध किया जा सका, जिस माहौल को भीड़-गिरोह द्वारा हत्याओं के जरिये, मीडिया के बड़े हिस्से द्वारा और भाजपा के प्रचारकों – उसके शीर्षस्थ नेतृत्व एवं सोशल मीडिया में उसके चट्टे-बट्टों – द्वारा तैयार किया गया था. इसका उल्लेखनीय रूप से श्रेय किसान आंदोलनों को जाता है जिन्होंने किसानों के आक्रोश को जाहिर करने के लिये एक सुसंगत और एकताबद्ध मंच मुहैया किया, और साथ ही साम्प्रदायिक विघटनकारी राजनीति, दलित-विरोधी और महिला-विरोधी हिंसा, और कार्यकर्ताओं पर फ्अर्बन नक्सलय् का ठप्पा लगाने की नापाक हरकतों के खिलाफ लगातार चलाये गये अभियानों को भी इसका श्रेय जाता है.

राजस्थान में सीपीआई(एम) को दो सीटों पर विजय मिलने से यह उत्साहजनक और स्वागतयोग्य बात है कि वामपंथ, और किसान आंदोलन को फासीवादी भाजपा के खिलाफ जनादेश में अपना भी हिस्सा मिला. राजस्थान में एक नई पार्टी – भारतीय ट्राइबल पार्टी – को दो सीटों पर जीत हासिल होना भी उल्लेखनीय और स्वागतयोग्य घटना है.

इस हार के बाद ज्यादा मुमकिन है कि मोदी-शाह जोड़ी एवं भाजपा अब और अधिक हताशा से बेताब होगी – और जैसे-जैसे संसदीय चुनाव नजदीक आ रहे हैं, वैसे-वैसे भारत की जनता को साम्प्रदायिक नफरत और हिंसा तथा झूठी खबरों के प्रचार के और बड़े पैमाने पर चलाये जाने वाले अभियान के खिलाफ मुकाबला करने के लिये खुद को तैयार करना होगा. मगर इन विधानसभा चुनावों ने बिल्कुल सही समय पर मोदी के अजेय होने के मिथक का भांडा फोड़ दिया है – और हमको याद दिला दिया है – जनता एकताबद्ध हो सकती है और जीत भी हासिल कर सकती है और उसे यही करना होगा.

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