हिरावल-जन संस्कृति मंच का आयोजन- 10वां ‘प्रतिरोध का सिनेमा: पटना फिल्मोत्सव’

“जिसे भारतीय सिनेमा कहा जाता है, उसे भारतीय सिनेमा नहीं कहना चाहिए। वह सच्चे अर्थों में हाशिये के लोगों का सिनेमा नहीं है। इस भारतीय सिनेमा में गांव के लोग शामिल नहीं हैं, उनकी जिंदगी की सच्चाई नहीं है। वह कुछ हद तक शहर का सिनेमा है, नवउदारवाद के दौर में बड़ी-बड़ी कंपनियां फिल्म निर्माण के क्षेत्र में उतरी हैं, जो उसके कंटेट को कंट्रोल करती हैं। देश की बहुत बड़ी आबादी के सवालों से उस तथाकथित भारतीय सिनेमा का कोई संबंध नहीं है। कंपनियां उन फिल्मों के जरिए अपने राजनीतिक-आर्थिक मुद्दों के अनुरूप जनमानस को तैयार करने की कोशिश करती है।” विगत 9 दिसम्बर 2018 को फिल्मकार पवन श्रीवास्तव ने पटना के कालिदास रंगालय प्रेक्षागृह में हिरावल-जन संस्कृति मंच द्वारा आयोजित ‘दसवां पटना फिल्मोत्सव’ का उद्घाटन करते हुए ये विचार व्यक्त किए।

पवन श्रीवास्तव ने कहा कि यह सोचना बेमानी है कि कारपोरेट कंपनियां हाशिये के लोगों के लिए फिल्म बनाएंगी। हाशिये के लोगों की कहानी हमें ही कहनी होगी और हमें ही अपने गांव और वहां की वास्तविक जीवन स्थिति को दिखाना होगा। पवन श्रीवास्तव ने कहा कि इसीलिए उन्होंने जनसहयोग के जरिए फिल्म निर्माण का रास्ता चुना। उन्होंने बताया कि उनकी पहली फिल्म ‘नया पता’ और नई फिल्म ‘हाशिए का जीवन’ जनसहयोग से ही बनी हैं।

फिल्मोत्सव स्वागत समिति के अधयक्ष प्रो. संतोष कुमार ने कहा कि आज जनता के प्रतिरोध और संघर्ष का समर्थन करने वाले बुद्धिजीवियों और कलाकारों को सत्ता ‘अर्बन नक्सल’ और देशद्रोही कह रही है। लेकिन बुद्धिजीवी-कलाकार इससे डर कर चुप नहीं हो जाएंगे। हम सब ‘रंग दे बसंती चोला’ वाली परंपरा के साथ हैं। जनपक्षधर फिल्में बनाना जोखिम का काम है। लेकिन यह दूसरी स्वतंत्रता की लड़ाई का अहम हिस्सा है।

आरंभ में जन संस्कृति मंच के राज्य सचिव सुधीर सुमन ने पटना फिल्मोत्सव के दस साल के सफर के बारे में बताते हुए कहा कि वर्चस्व की ताकतों से हाशिये का समाज बहुत बड़ा है। वह एकताबद्ध हो जाए, तो राजनीति, समाज, संस्कृति और कला – हर जगह वह केंद्र में आ जाएगा। पटना फिल्मोत्सव आरंभ से ही हाशिये के लोगों के जीवन की सच्चाइयों और उनके संघर्षों से संबंधित फीचर फिल्में, डाक्युमेंटरी और लघु फिल्में दिखाता रहा है।

उद्घाटन सत्र में मंच पर मौजूूद फिल्मकार संजय मट्टू, फिल्मकार पवन श्रीवास्तव, आर्ट डाइरेक्टर राधिका, फिल्मों के जानकार आरएन दास, वरिष्ठ कवि आलोकधन्वा, साहित्यकार राणा प्रताप, प्रो. भारती एस कुमार, अरुण पाहवा और सुधीर सुमन ने फिल्मोत्सव की स्मारिका का लोकार्पण किया। उद्घाटन सत्र का संचालन हिरावल के संयोजक संतोष झा ने किया। इस अवसर पर शिक्षाविद् गालिब, पत्रकार-कवयित्री निवेदिता शकील, साउंड इंजीनियर विस्मय, कवि-रंगकर्मी अरुण शाद्वल, एसआरएफटीआईआई (कोलकाता) के निर्देशन के पूर्व छात्र सजल आनंद, रंगकर्मी रोहित कुमार, कवि सुनील श्रीवास्तव, राजेश कमल, मगही कवि श्रीकांत व्यास, यादवेंद्र, का. बृृजबिहारी पांडेय, कवि-पत्रकार संतोष सहर आदि भी मौजूूद थे।

इसके बाद हिरावल के रेशमा खातून, रत्नावली कुमारी किशन, अंजली कुमारी, निक्की कुमारी, नेहा कुमारी, प्रिंस, प्रीति, संतोष, गौतम, सुमन, संगीत, भारती, पलक, पीहू आदि ने 1857 के प्रथम स्वाधाीनता संग्राम के दौरान लिखे गए अजीमुल्ला खां के गीत ‘हम हैं इसके मालिक हिंदुस्तान हमारा’ और ब्रजमोहन के गीत ‘चले, चलो’ का गायन किया।

दसवें पटना फिल्मोत्सव में फिल्मों के प्रदर्शन की शुरूआत ‘अपनी धुन में कबूतरी’ से हुई। संजय मट्टू द्वारा निर्देशित यह फिल्म उत्तराखंड की कुमांउनी भाषा की लोकगायिका कबूतरी के जिंदगी के अनुभवों और गायकी पर आधारित थी। यह फिल्म एक सामान्य स्त्री की ताकत और प्रतिभा से बहुत ही सहजता से दर्शकों को रूबरू कराती है। फिल्म के प्रदर्शन के बाद संजय मट्टू ने कबूूतरी देवी पर फिल्म बनाने की वजह, राज्य सरकारों से फिल्म निर्माण के लिए मदद की अपेक्षा, भाषाई संस्कृति, वितरण आदि से संबंधित सवालों के जवाब भी दिए. प्रो. भारती एस. कुमार ने फिल्मोत्सव की ओर से संजय मट्टू को स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया।

दूसरे दिन की शुरूआत युवा फिल्मकारों और सिनेमा के विद्यार्थियों द्वारा बनाई गई फिल्मों से हुई। इसके तहत पांच लघु फिल्में – वुमनिया, गुब्बारे, छुट्टी, बी-22 और लुकिंग थ्रू दी फेंस – दिखाई गईं। दूसरे दिन दिखाई गई महीन मिर्जा निर्देशित एक बेहद महत्वपूर्ण डॉक्युमेंटरी फिल्म ‘अगर वो देश बनाती’ में छत्तीसगढ़ में भूमि कानूनों का सहारा लेकर अपने हक की लड़ाई लड़ने वाली उन अनाम महिलाओं के जज्बे को विषय बनाया गया था, जिनके होने से ही देश और लोकतंत्र को सही मायने में सार्थकता मिलती है। कोयला खदान, थर्मल पावर और विभिन्न किस्म के खदानों और परियोजनाओं के लिए आदिवासियों के जल, जंगल, जमीन को जिस तरह सरकार और कारपोरेट कंपनियों ने निर्ममता के साथ हड़पने का काम किया, उससे उत्पन्न त्रसदी को यह कहानी दिखाती है।

फिल्म ‘नाच, भिखारी नाच’ भिखारी ठाकुर के साथ काम कर चुके चार कलाकारों रामचंद्र मांझी, शिवलाल बारी, लखिचंद मांझी एवं रामचंद्र मांझी की स्मृतियों, गीत-संगीत की उनकी प्रस्तुतियों और बातचीत पर आधारित थी। इनके जीवनानुभवों के जरिए महान लोक नाटककार और लोक नर्तक भिखारी ठाकुर भी एक तरह से मूर्त हो उठते हैं। इस फिल्म को देश-दुनिया के कई पुरस्कार और सम्मान मिल चुके हैं। फिल्म की प्रस्तुति के बाद दर्शकों का निर्देशक जैनेंद्र दोस्त से संवाद भी हुआ। दर्शक दीर्घा में मौजूद वरिष्ठ नाट्य निर्देशक परवेज अख्तर और संजय उपाध्याय ने फिल्म पर टिप्पणी की।

‘मैं तुम्हारा कवि हूं’ जनकवि रमाशंकर यादव ‘विद्रोही’ के जीवन और कविता-कर्म पर आधारित फिल्म थी। जेएनयू कैंपस में और दिल्ली के लोकतांत्रिक-वामपंथी आंदोलनों में वे अपनी कविताओं के साथ सदैव मुखर रहे। विद्रोह, प्रतिरोध, परिवर्तन और क्रांति की अदम्य भावनाओं वाली कविता ही उनकी जिंदगी की पहचान थी। दिल्ली से बाहर भी जहां उन्होंने कविता पाठ किया, उनकी कविताओं सेे लोग जबर्दस्त रूप से प्रभावित हुए। ‘हिरावल’ द्वारा ही आयोजित एक आयोजन में कालिदास पटना का प्रेक्षागृह इसका गवाह बना था। उस अद्भुत आवेग से भरे कविता पाठ को सुनने वाले कई लोग दर्शक दीर्घा में मौजूद थे।

दूसरे दिन की अंतिम फिल्म ‘लिंच नेशन’ आज के समय की ज्वलंत समस्या पर केंद्रित थी। पिछले साल चलती ट्रेेन में 16 साल के लड़के जुनैद की भीड़ द्वारा हत्या से मर्माहत दिल्ली के स्वतंत्र पत्रकार अशफाक ने अपने पत्रकार दोस्तों फुरकान अंसारी, विष्णु सेजवाल और शाहीद अहमद से सलाह-मश्वरे के बाद पूरे देश में ‘मॉॅब लिंचिंग’ की घटनाओं को दस्तावेजीकृत करने का निर्णय लिया था। ‘लिंचिंग नेशन’ इसी प्रक्रिया में बनाई गई एक ऐसी फिल्म है, जो उत्पीडि़त परिवारों की व्यथा और उनके सवालों के जरिए दर्शकों को बेचैन करती है और नफरत की उस राजनीति का प्रतिकार करने की भावना से भरती है, जो भीड़ को हिंसक भेडि़ये में तब्दील कर रही है। मॉब लिचिंग को प्रोत्साहित करने वाली सत्ता और राजनीति के खिलाफ इस फिल्म ने प्रतिरोध का संदेश दिया कि अगर यह सिलसिला नहीं थमा तो हम एक डेमोक्रेटिक नेशन नहीं रह पाएंगे, पूरी तरह यह देश लिंच नेशन बन जाएगा जिसमें किसी के हिफाजत की गारंटी नहीं होगी।

10 वें पटना फिल्मोत्सव के आखिरी दिन की शुरूआत छोटे बच्चों के लिए चयनित (कार्लोस सलदान्हा निर्देशित) एनिमेशन फिल्म ‘फर्दीनांद’ से हुई। बच्चों के साथ-साथ बड़ी संख्या में हर उम्र के लोगों ने इस फिल्म को देखा, जिसमें हिंसा और उन्माद के विरुद्ध अमन का पैगाम था।
फिल्मोत्सव की अंतिम फिल्म ‘एसडी: सरोज दत्त एंड हिज टाइम्स’ प्रसिद्ध कम्युनिस्ट क्रांतिकारी बुद्धिजीवी, कवि-आलोचक, पत्रकार, अनुवादक और भाकपा(माले) की पहली पीढ़़ी के सर्वोच्च नेताओं में एक का. सरोज दत्त पर केंद्रित दस्तावेजी फिल्म थी। शासक वर्ग ने नक्सलबाड़ी विद्रोह का भीषण दमन किया था, जिसमें कई महत्वपूर्ण नेताओं की हत्या कर दी गई थी। कामरेड सरोज दत्त भी उनमें से एक थे। 4 अगस्त 1971 को पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार किया और 5 अगस्त को उन्हें मार दिया, उनकी लाश भी नहीं मिली थी। कामरेड सरोज दत्त नक्सली आंदोलन के सिद्धांतकारों में से थे। उनकी कविताओं, आलोचना और उनके राजनीतिक नजरिये का साठ-सत्तर के दशक के वामपंथी क्रांतिकारियों पर खासा प्रभाव था। इस फिल्म का निर्माण का. सरोज दत्त के जन्म शताब्दी वर्ष 2014 के ठीक एक वर्ष पहले शुरू हुआ था और यह नक्सलबाड़ी विद्रोह की अर्धाशताब्दी के अवसर पर 2017 में पूरी हुई। फिल्म की निर्देशिका कस्तुरी बासु और मिताली विश्वास ने इस फिल्म के लिए काफी रिसर्च किया, उस दौर के लोगों से बातचीत की, आंदोलन के इलाकों में लोगों से मिलीं, कई अर्काइवल सामग्री जुटाए। रिसर्च के दौरान उन्हें नक्लबाड़ी के किसानों के बीच उनके दो गीत मिले, जिन्हें रिकार्ड करके फिल्म में शामिल किया गया। एक और गीत का इस्तेमाल प्रसिद्ध अभिनेता और रंगकर्मी उत्पल दत्त ने अपने नाटक ‘तीर’ में किया था तथा दूूसरे गीत को संगीतकार हेमांग विश्वास की पुत्री रंगोली विश्वास ने अपनी आवाज में गाया था। इस फिल्म में सरोज दत्त की रचनाओं और अर्काइवल फोटोग्राफ्रस और उस समय के दुर्लभ फुटेज का इस्तेमाल किया गया था।

फिल्म प्रदर्शन के बाद फिल्म की निर्देशिका मिताली विश्वास ने दर्शकों से संवाद के क्रम में कहा कि नक्सलबाड़ी विद्रोह के जो बुनियादी कारण या सवाल थे, अभी तक उनका समाधान नहीं हुआ है।

सामंती रिवाज नहीं छोड़ोगे तो सब खत्म हो जाओगे: ‘पागल की डायरी’ ने दिया संदेश
दसवें पटना फिल्मोत्सव का समापन दुनिया के महान साहित्यकार लू शुन की कहानी ‘पागल की डायरी’ पर आधारित नाट्य प्रस्तुति से हुई। लू शुन ने यह कहानी आज से 100 साल पूर्व, यानी 1918 में लिखी थी। यह एक गहरे अवसाद से ग्रस्त नौजवान के अनुभव हैं, जो डायरी की शक्ल में हैं। हिंसा, हत्या, अविश्वास, नफरत की प्रवृत्तियों से वह बेहद आहत है। उसे लगता है कि चार हजार साल से समाज में आदमखोरी की परंपरा चल रही है। हर कोई एक दूसरे को खा जाने को आतुर है। लू शुन ने हिंसा और नफरत पर टिके समाज की आलोचना के लिए इस कहानी में अद्भुत शिल्प का इस्तेमाल किया है।

नाटक में एक जगह पागल नौजवान अपने समय और समाज पर जो टिप्पणी करता है, वह जितनी सौ साल पहले प्रासंगिक थी, उतनी आज के लिए भी उचित जान पड़ती है। पागल कहता है- “दूसरों को खा लेने का लालच, परंतु स्वयं आहार बन जाने का भय! सबको दूसरों पर संदेह है, सब दूसरों से आशंकित हैं, यदि इस परस्पर भय से लोगों को मुक्ति मिल सके तो वे निःशंक होकर काम कर सकते हैं, घूम-फिर सकते हैं, खा-पी सकते हैं, चैन की नींद सो सकते हैं। बस, मन से वह एक विचार निकाल देने की जरूरत है। परंतु लोग यह कर नहीं पाते और बाप-बेटे, पति-पत्नी, भाई-भाई, मित्र, गुरु-शिष्य, एक दूसरे के जानी दुश्मन और यहां तक कि अपरिचित भी एक-दूसरे को खा जाने के षड्यंत्र में शामिल हैं, दूूसरों को भी इसमें घसीट रहे हैं और इस चक्कर से निकल जाने को कोई तैयार नहीं।” पागल एक दूसरी जगह निर्णायक चेतावनी देता है -“अगर तुम आदमखोरी नहीं छोड़ोगो, तो तुम सब खत्म हो जाओगे, एक-दूसरे को खा जाओगे।” नाटक के अंत में सूत्रधार ने दर्शकों से मार्मिक गुहार की- “संभव है, नई पीढ़ी के छोटे बच्चों ने अभी नर-मांस न खाया हो। क्या हम इन बच्चों को बचा सकते हैं?” नाट्य प्रस्तुति की दृष्टि से ‘पागल की डायरी’ आसान और सहज कहानी नहीं है, पर परिकल्पना और निर्देशन के कठिन कार्य को संतोष झा ने अंजाम दिया। आदमखोरी, यानी हत्या और हिंसा की जो लंबी संस्कृति है, उसके समकालीन राजनीतिक प्रतीकों का इस्तेमाल करके उन्होंने इसे आज के दौर की कहानी बना दिया। यह कहीं से नहीं लगा कि यह कहानी सौ साल पहले लिखी गई थी। पागल नौजवान की शानदार भूमिका के जरिए विक्रांत चौहान ने इसे और प्रभावशाली बनाया। प्रकाश संयोजन की इस नाटक में खास भूमिका थी, जिसे रोशन ने निभाया। निर्देशक ने प्रोजेक्टर के जरिए कुछ दृश्यों को नाटक के साथ संयोजित किया, जिसमें रोहित वेमुला की तस्वीर गहरा अर्थ रखती थी। काली की भूमिका प्रीति प्रभा ने निभाई। भीड़ की भूमिका में रेशमा खातुन, पायल, पलक और पीहू थीं। बड़ा भाई, डॉॅक्टर और सूूत्रधार की भूमिका क्रमशः राम कुमार, राजन कुमार और सुमन कुमार ने निभाई। सुधांशु किसान और नौजवान की भूमिका में थे। प्रोजेक्टर संचालन राजीव के जिम्मे था। मेकअप जितेंद्र जीतू का था, ध्वनि दी सजल आनंद ने। प्रकाश पर प्रोपर्टी और व्यवस्था की जिम्मेवारी थी।

रोजाना दिन के 2 बजे से रात्रि 8 बजे तक चले इस फिल्मोत्सव में पटना और आसपास के इलाकों से तीन दिनों के दौरान हजारों की संख्या में दर्शक उपस्थित हुए। दर्शकों की उपस्थिति के लिहाज से भी यह एक यादगार आयोजन बन गया। इस अवसर पर हमेशा की तरह किताबों और सीडी का स्टॉॅल भी लगाया गया था। प्रेक्षागृह के बाहर कैंपस को खूबसूरत तरीके से सजाया गया था.
– पुनीत / रोहित

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