पीयू छात्र संघ चुनाव : जदयू-भाजपा की राजनीतिक चाल – रामजतन शर्मा

पटना विश्वविद्यालय छात्र संघ का चुनाव अभी हाल में संपन्न हुआ. इस चुनाव में जदयू-भाजपा की सुनियोजित दखलअंदाजी दिखलाइ पड़ी. जदयू के नवनियुक्त उपाध्यक्ष प्रशांत किशोर वोटिंग के ठीक पूर्ववेला में वीसी से मिलने पहुंच गए, जदयू का यह आपत्तिजनक कदम चुनाव आचार संहिता का खुल्लम खुल्ला उल्लंघन था, लिहाजा इसका काफी विरोध हुआ. भाजपा ने इस विरोध-प्रदर्शन में एक नंबर पर रहने की जीतोड़ कोशिश की. भाजपा के छात्र संगठन के लोगों के द्वारा प्रशांत किशोर पर ढेले मारे गए. भाजपा के कुछ विधायक प्रशांत किशोर की गिरफ्तारी की मांग को लेकर धरने पर बैठ गए. कुछ अखबारों ने इसे जदयू-भाजपा गठबंधन के बीच दरार के रूप में प्रचारित किया.

तथ्यों से ऐसा लगता है कि दोनों के बीच दरार नहीं, बल्कि दोनों की सोची समझी एक सुनियोजित चाल थी. यह चुनाव नतीजों से भी जाहिर होता है. बहरहाल छात्र संघ के चुनाव में दोनों की जो राजनीतिक चाल देखी गई, वह बिहार की राजनीति में पिछले कुछ महीनों से चल रही है, जो विभिन्न मुद्दों पर दिखलाई भी पडी है. मगर छात्र संघ के चुनाव में वह बहुत नंगे रूप में सामने आई. इसकी वजह यह है कि आगामी संसदीय चुनावों के लिहाज से छात्र संध चुनाव की एक अहमियत थी और वामपंथी छात्र संघों व राजद के छात्र संगठन के संश्रय ने अपेक्षाकृत मजबूत दावेदारी पेश की थी. इस संश्रय की जीत बिहार में एनडीए के खिलाफ राजनीतिक गठबंधन के लिए एक सकारात्मक असर डालती. लिहाजा भाजपा-जदयू नंगे रूप में हर तिकड़मबाजी पर उतर आए.

नीतीश कुमार खुद को भाजपा से दूरी का दिखावा करने की कोशिश करते रहते हैं ताकि भाजपा विरोधी वोट वह हासिल करने में कामयाब हो. इससे भाजपा को भी फायदा दिखता है क्योंकि वह भी चाहेगी कि हमारा विरोधी वोट एकमुश्त रूप से विपक्ष में न जाने पाए और नीतीश सरकार के खिलाफ जन विक्षोभ का भी कुछ फायदा मिले. यहां पर दोनों के बीच कोई विरोध नहीं है क्योंकि वोट तो आखिर एनडीए में ही जाएगी. फिर भी दोनों के बीच एक अंतरविरोध भी दिखता है, नीतीश कुमार भाजपा के साथ पिछले गठबंधन में जो उनकी स्थिति थी उसे वह फिर से हासिल करने की कोशिश कर हरे हैं. पिछले गठबंधन में भाजपा की शक्ति जदयू की शक्ति से आधी से भी कम थी. इधर भाजपा भी अपनी शक्ति में इजाफा करने की कोशिश कर रही है, इसलिए नीतीश कुमार की हैसियल पर चोट भी करती रही है. अभी हाल में भाजपा के एक मंत्री ने सार्वजनिक तौर पर यह बयान जारी किया कि नीतीश कुमार खुद ही भाजपा के पास आए हैं, उन्हें हमने नहीं बुलाया था. कहने का मतलब कि नीतीश कुमार को भाजपा के पास आना उनकी लाचारी थी. इस बयान को लेकर अब चर्चा चल पड़ी है कि यदि नीतीश कुमार भाजपा के पास नहीं गए होते तो उन्हें सृजन घोटाला में जेल जाना पड़ता.

कुल मिलाकर कहा जाए तो भाजपा चाहती है कि नीतीश कुमार हमसे एक हद तक दूरी दिखाएं, पर अपने राजनीतिक कद बढ़ाने की ज्यादा कोशिश न करें. बहरहाल दोनों के बीच गठबंधन ही मुख्य बात है, अंतरविरोध गौण है. दोनों ही एनडीए को मजबूत करने के पक्ष में हैं. लिहाजा नीतीश कुमार के प्रति ऐसा कोई भ्रम पालना कि वह भाजपा का विरोध करते हैं और इसलिए नीतीश कुमार का हाथ मजबूत किया जाए, भारी धोखा होगा. नीतीश कुमार का हाथ मजबूत करना, भाजपा और एनडीए का हाथ मजबूत करना होगा. व्यवहार ने दिखला दिया है कि दोनों ही घोर जनविरोधी, खासकर दलित-गरीबों, कमजोर वर्गों, मजदूरों-किसानों, मेहनतकशों के विरोधी हैं और कारपोरेटों व सामंतों-नवधनाढ्यों के हितों के पक्षधर हैं. नीतीश कुमार भाजपा की नीतियों पर अमल करते हैं और भाजपा के दिल से हिमायती हैं.

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