भाजपा का फिरकापरस्त नाम बदलो खेल

उत्तर प्रदेश में आजकल अजय सिंह बिष्ट (जिन्होंने खुद योगी आदित्यनाथ की पदवी धारण कर रखी है) के नेतृत्व में चल रही भाजपा सरकार नाम बदलने की दौड़ लगा रही है. कुछ अरसा पहले मुगलसराय का नाम बदलकर “पंडित दीन दयाल उपाध्याय नगर” रख दिया गया. हाल में इलाहाबाद का नाम बदलकर “प्रयागराज” कर दिया गया है और फैजाबाद जिला (जिसका नाम अयोध्या के इसी नाम के जुड़वां शहर पर रखा गया है) का नाम बदलकर “श्री अयोध्या” कर दिया गया. मुख्यमंत्री ने वादा किया है कि और भी कई जगहों या स्मारकों के नाम बदले जायेंगे. उन्होंने घोषणा की है कि वह ताज महल का नाम “राम महल” रखने में भी नहीं हिचकिचायेंगे, और मांग की कि भारत का नाम बदल कर “हिन्दुस्थान” कर दिया जाना चाहिये. उनके कदमों पर चलते हुए गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रूपानी ने कहा है कि वे अहमदाबाद का नाम बदल कर “कर्णावती” रखना चाहते हैं. भाजपा के एक नेता ने मांग की है कि आगरा का नाम बदल कर “अग्रवाल” कर दिया जाना चाहिये; एक अन्य नेता ने वादा किया है कि वह हैदराबाद का नाम बदल देंगे; और दंगे के आरोपी भाजपा विधायक संगीत सोम ने मांग की है कि मुजफ्फरनगर का नाम बदल कर “लक्ष्मीनगर” कर देना चाहिये क्योंकि मौजूदा नाम “दंगे भड़काता है”.

इस नाम बदलने की कवायद के पीछे की राजनीति को पहचानना कोई मुश्किल काम नहीं है. हर ऐसा नाम जो मुसलमानों या मुगलों के साथ जुड़ा है उसका नाम बदलकर हिंदू दिखने वाला नाम रख देना – यह भाजपा की फासिस्ट दृष्टि के साथ संगतिपूर्ण है, जिसके मुताबिक दावा किया जाता है कि भारत एक हिंदू राष्ट्र है. आदित्यनाथ जब गोरखपुर से लोकसभा सदस्य थे तब उन्होंने इसी प्रकार कई नामों को बदल देने की घोषणा की थी: उर्दू बाजार का नाम बदल कर हिंदी बाजार, अली नगर का नाम बदलकर आर्य नगर, मियां बाजार का नाम बदलकर माया बाजार, इस्लामपुर का नाम बदलकर ईश्वरपुर, और हुमायूं नगर का नाम हनुमान नगर रखना, इत्यादि. इसी प्रकार राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुन्धरा राजे ने भी “मुस्लिम सुनाई पड़ने वाले” गांवों का नाम बदल दिया था – मियां का बाड़ा नाम बदलकर महेश नगर हो गया, और झुंझुनू में इस्माइल खुर्द का नाम बदलकर पिछनवां खुर्द कर दिया गया. इनका उद्देश्य भारत में मुसलमानों की उपस्थिति के तमाम प्रतीकों और चिन्हों को धो-पोंछ कर मिटा देना है, जैसे बाबरी मस्जिद का विध्वंस कर दिया गया – और मुसलमानों को यह संदेश देना है कि वे भारत में अनधिकार प्रवेश करने वाले घुसपैठिये हैं.

अब यह बात अलग है कि इन नामों को बदलने से ऐतिहासिक तथ्यों के प्रति और किसी सजीव संस्कृति की समन्वयात्मक प्रकृति के प्रति भारी अवज्ञा जाहिर होती है. उदाहरण के लिये यह बिल्कुल झूठ बात है कि अकबर ने ‘अल्लाह’ के नाम पर प्रयाग का नाम बदलकर इलाहाबाद कर दिया था. वास्तव में अकबर ने एक नये शहर का निर्माण किया था और इस नये शहर का नाम खुद अपने द्वारा कायम किये गये समन्वयात्मक धर्म “दीन-ए-इलाही” के नाम पर रखा था. जब भारत के प्रथम स्वाधीनता संग्राम के सिद्धांतकार अजीमुल्लाह खान ने “हम हैं इसके मालिक, हिंदुस्तान हमारा” लिखा था, तो उन्होंने सिंधु नदी के पास स्थित अंचल के फारसी नाम ‘हिंदुस्तान’ का ही इस्तेमाल किया था. “हिन्दुस्तान” और उसकी भाषा “हिन्दुस्तानी” का हमेशा यही मतलब रहा है – आरएसएस और भाजपा अब इस शब्द का अर्थ बदलकर उसका मतलब “हिन्दुओं की भूमि” कर देना चाहते हैं.

अजीमुल्लाह खान का गीत, जिसे व्यापक तौर पर भारत का पहला राष्ट्रीय गीत माना जाता है, सभी मजहबों के लोगों की उपनिवेशवाद-विरोधी एकता का जयगान करता है. फैजाबाद और अयोध्या दोनों उस महान उपनिवेशवाद-विरोधी संग्राम के केन्द्र रहे हैं, जिसे हिंदुओं और मुसलमानों ने मिलकर लड़ा था. भाजपा और आरएसएस, जिनको स्वाधीनता संघर्ष से कभी कोई लेना-देना नहीं रहा, अब हमारे देश की गंगा-जमनी समन्वयात्मक विरासत में जहर घोलना और उसका साम्प्रदायीकरण करना चाहते हैं.

साम्प्रदायिक आधार पर नाम बदलने की कवायद में भाजपा जो इतनी हड़बड़ी मचा रही है, वह विभिन्न राज्यों में विधानसभा चुनाव और 2019 के लोकसभा चुनाव को नजदीक आते देखकर देश में साम्प्रदायिकता भड़काने तथा नरेन्द्र मोदी के झूठों, घोटालों और लम्बे-चौड़े वादों से जनता का ध्यान बंटाने की उसकी बेताबीभरी कोशिश से प्रेरित है. मोदी ने जिस “विकास” का वादा किया था, वह तो बिल्कुल ही नहीं नजर आ रहा – और साम्प्रदायिक राजनीति ही एकमात्र उपलब्धि है जिसका मोदी बेशक दावा कर सकते हैं. इसलिये हमें 2019 के लोकसभा चुनाव की तैयारी की अवधि में इससे भी ज्यादा जहरीले और दुर्भावनापूर्ण साम्प्रदायिक प्रचार और हिंसा का पर्दाफाश करने तथा उसका मुकाबला करने के लिये खुद को तैयार रखना होगा.

और पढ़ें

ऊपर जायें
%d bloggers like this: