मोदी के स्वच्छ भारत अभियान का मुखौटा और सफाई कामगारों का संघर्ष

इस वर्ष 2 अक्टूबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘स्वच्छ भारत अभियान’ के चार साल पूरे हुए. 15 सितंबर को प्रधानमंत्री ने दो सप्ताह का ‘स्वच्छता ही सेवा अभियान’ शुरू किया, जहां उन्होंने दिल्ली के पड़ावगंज स्थित बाबा साहेब अंबेडकर हायर सेकंड्री स्कूल का परिसर “साफ करते हुए” टीवी कैमरा को अपना बेहतरीन पोज देने की कोशिश की. उनका गोदी मीडिया इस सजे-संवरे अभियान पर वाह-वाह कर उठा. जल्द ही, राजनाथ सिंह से लेकर धर्मेंद्र प्रधान तक, भाजपा के आला मंत्रियों ने भी प्रधान मंत्री के पदचिन्हों का अनुसरण किया – उन्होंने अपने हाथ में झाड़ू लिए फोटो खिंचवाने का कोई मौका नहीं गंवाया. सदगुरू जग्गी वासुदेव और श्री श्री रविशंकर से लेकर अमिताभ बच्चन और अक्षय कुमार जैसे बॉलीवुड के सुपरस्टार तक और उद्योगपति रतन टाटा ने प्रधान मंत्री के इस “एतिहासिक” स्वच्छता अभियान के लिए उनकी तारीफें कीं. सोशल मीडिया में तो ‘स्वच्छ भारत’ से संबंधित रंग-बिरंगे फोटो और वीडियो की बाढ़-सी आ गई. टीवी चैनलों पर इस तथाकथित स्वच्छता पर मनोरंजन उद्योग की नामचीन हस्तियों को लेकर अनेकानेक कार्यक्रमों की झड़ी लगा दी गई. लेकिन इस स्वच्छ भारत अभियान में एक चीज पूरी तरह गायब थी – और वह चीज थी देश के सफाई कामगारों की दुर्दशा !

जब राजनेताओं और अभिनेताओं को लेकर यह ड्रामा चल रहा था, तभी हमने अपने ‘स्वच्छ भारत’ की एक दूसरी भयावह तस्वीर देखी. 11 वर्ष का एक छोटा लड़का राष्ट्रीय राजधानी के एक शवदाह गृह परिसर में अपने मृत पिता के शरीर के पास गया, उसने अपने पिता के मुंह पर से कफन हटाया और फूट-फूट कर रो पड़ा. उसका पिता अनिल हाथ से मैला साफ करने वाला मजदूर था. जब वह सीवर साफ कर रहा था तो उसकी कमर में बंधी रस्सी टूट गई और वह उस सीवन में गिर पड़ा. उसकी मौत के बाद उसके परिवार वालों के पास उसकी अंत्येष्टि के लिए भी पैसे नहीं थे. स्वच्छ भारत के इस मुखौटे के पीछे, सफाई कर्मचारी आंदोलन द्वारा संग्रहीत आंकड़ों के अनुसार, देश में हर तीसरे दिन एक सफाई मजदूर की मौत होती है. (इंडिया टुडे, 26 सितंबर 2018)

स्वच्छ भारत की शर्म
हालांकि 6 दिसंबर 2013 को लागू हुए एक अधिनियम के अनुसार हाथ से मैला ढोने की प्रथा को प्रतिबंधित कर दिया गया है, लेकिन सफाई मजदूरों को अभी भी अपने हाथों से सीवर और सेप्टिक टैंक साफ करने को मजबूर किया जा रहा है. अधिनियम की धारा 7 में कहा गया है, “कोई व्यक्ति, स्थानीय अधिकारी या एजेंसी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से सीवर या सेप्टिक टैंक की खतरनाक सफाई के काम में किसी को भी नियोजित नहीं कर सकता है.” लेकिन ‘स्वच्छ भारत’ कार्यक्रम ने मैला ढोेने को रोकने वाले इस 2013 के कानून को लागू करने का कोई प्रयास नहीं किया; इसके बजाए गड्ढे वाले शौचालयों के निर्माण को प्रोत्साहित करके यह अभियान दरअसल, हाथ से मैला साफ करने की प्रथा को जारी ही रखना चाहता है.

2013 के कानून का एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू है हाथ से मैला ढोने वाले व्यक्तियों को वित्तीय सहायता, वासगीत जमीन तथा मासिक स्टाइपेंड के साथ आजीविका की अन्य कोई कुशलता की ट्रेनिंग देकर उनका पुनर्वास करना (धारा 13 और 16). पिछले चार वर्षों में मोदी सरकार ने मैला साफ करने वालों के पुनर्वास के लिए एक पैसा निर्गत नहीं किया है (द वायर, 31 अगस्त 2018). इतना ही नहीं, पिछली सरकार द्वारा इनके पुनर्वास के लिए 2013-14 में अपर्याप्त रूप से निर्गत 55 करोड़ रुपये में से अभी तक 24 करोड़ रुपया बचा ही रह गया है. शर्म की बात यह है कि इसी मोदी सरकार ने 2014-17 के बीच ‘स्वच्छ भारत’ के प्रचार पर 530 करोड़ रुपये की भारी राशि व्यय कर दी है. (द स्क्रॉल, 22 नवंबर 2017)

इसके अलावा, सुरक्षा उपकरणों के अभाव में और सर्वाधिक महत्वपूर्ण रूप से सरकार और निजी एजेंसियों के बीच नापाक गठबंधन से आए दिन सफाई कर्मचारियों की मौत होती रहती है. आज जब सफाई के अधिकांश रोजगार का ठेकाकरण हो गया है, तो सफाई कर्मियों को अमानवीय शोषण का शिकार बनना पड़ रहा है. अधिकांश मामलों में निजी कंपनियां कोई सुरक्षा उपकरण मुहैया नहीं कराती हैं, आवश्यक सुरक्षा मानदंडों का पालन नहीं करती हैं और सफाई कर्मियों की दुर्घटना अथवा मौत होने पर भाग खड़ी होती हैं. और, सरकारी मशीनरी सक्रियतापूर्वक विचित्र ढंग से उनकी मदद करने लगती है. नए साल की शुरुआत में मुंबई में चार सफाई कर्मियों की मौत के मामले में पुलिस ने प्रभारी ठेकेदार के बजाय क्रेन चालक को “घातक लापरवाही बरतने” के आरोप में गिरफ्तार कर लिया !

देश भर में 97 मैला साफ काने वालों की मौत के सिलसिले में हुए एक हालिया अध्ययन में पाया गया है कि इनमें से अधिकांश मामलों में एफआइआर तक दर्ज नहीं किए गए हैं और मृतकों के परिजनों को मुआवजा भी नहीं दिया गया है. और जिन मामलों में एफआइआर दर्ज किए भी गए हैं तो दोषियों को कोई सजा नहीं मिल सकी है (द टेलिग्राफ, 11 अक्टूबर 2018).

स्वच्छ भारत अभियान में खुले शौच को खत्म करने के नाम पर गरीब लोगों के खिलाफ हिंसक और उत्पीड़नकारी कार्रवाइयां चलाई जा रही हैं. खुले में शौच को खत्म करने की मुहिम उन निर्धन लोगों को अपमानित और उत्पीडि़त करने के आधार पर संचालित की जा रही है, जिनके पास निजी या सार्वजनिक शौचालय की कोई सुविधा नहीं है. 16 जून 2017 की सुबह, प्रतापगढ़ (राजस्थान) में भाकपा(माले) कार्यकर्ता कामरेड जफर हुसैन की नगर परिषद अध्यक्ष अशोक जैन के उकसावे पर नगरपालिका कर्मचारियों ने उस वक्त पीट-पीट कर हत्या कर दी, जब वे खुले में शौच करने जा रही गरीब महिलाओं के फोटो लेने और वीडियो बनाने की कोशिशों का प्रतिरोध कर रहे थे. दुख की बात यह है कि कामरेड जफर की मौत के एक वर्ष के अंदर ही राजस्थान पुलिस ने उन नगरपालिका पदाधिकारियों और कर्मचारियों को तमाम आरोपों से मुक्त कर दिया.

उदासीन न्यायपालिका और मीडिया
इस शोषणकारी प्रणाली को जारी रखने में सरकार और निजी एजेंसियों की प्रत्यक्ष भूमिका के अलावा, सफाई कर्मियों के सवाल पर न्यायपालिका की भूमिका भी उतनी ही परेशान करने वाली है. उदाहरण के लिए, कुछ माह पूर्व मद्रास उच्च न्यायालय ने एक दलित दंपत्ति को आर्थिक दंड दे दिया, क्योंकि उन्होंने आरोप लगाया था कि अन्ना विश्वविद्यालय के डीन ने उन्हें हाथ से मैला साफ करने को मजबूर किया था और साथ ही डीन के पति ने महिला कर्मी का यौन उत्पीड़न भी किया था. दुखद फैसले में न्यायालय ने कहा, “सफाई कर्मी यह शिकायत नहीं कर सकती है कि उसे शौचालय साफ करने को कहा गया; आौर इसीलिए यह शिकायत पूरी तरह अ-स्वीकार्य है कि उसे शौचालय साफ करने को मजबूर किया गया.” (न्यूज मिनट, 26 फरवरी 2018)

मीडिया और सार्वजनिक विमर्श में भी सफाई कर्मचारियों के सवाल पर पूरी खामोशी छाई हुई है. सफाई के मुद्दे को हमेशा ही मध्यम वर्ग की समस्या के रूप में देखा जाता है. हम प्रायः अखबारों की सुर्खियों में देखते हैं कि सफाई कर्मियों की हड़ताल की वजह से “खूबसूरत” शहरों में कूड़े-कचरे का ढेर लग जाता है. ये अखबार सहजता से इस बात को भुला देते हैं कि सफाई कर्मी क्यूं हड़ताल पर जाने को विवश होते हैं और वे सरकार-ठेकेदार गठबंधन द्वारा किए जाने वाले अमानवीय शोषण को भी नजरअंदाज कर देते हैं. सिर्फ उनकी मौत ही सफाई कर्मी को “खबरों के लायक” बनाती है ! हाथ से मैला साफ करने की प्रथा का विरोध करने वालों को तरह-तरह से उत्पीडि़त किया जाता है. उदाहरण के लिए, इस प्रथा पर दिव्या भारती के सनसनीखेज डॉक्यूमेंटरी फिल्म ‘कक्कू’ जारी होने के बाद दिव्या को प्रताड़ना, गाली-गलौज और मौत की धमकियों का सामना करना पड़ा था. फिल्म के जारी होने के बाद 2009 में एक छात्र-प्रतिवाद में शामिल होने के चलते दिव्या को गिरफ्तार कर लिया गया था.

सफाई कर्मचारियों का प्रतिवाद संघर्ष
लेकिन सफाई कर्मचारी कर्नाटक से लेकर दिल्ली तक, पूरे देश में इसके खिलाफ लड़ रहे हैं. ऐक्टू के झंडे तले ठेका सफाई कर्मियों ने गंगावती (कर्नाटक) में पिछले नौ महीनों के बकाये वेतन की अदायगी, सभी ठेका कर्मचारियों को सीधी भुगतान तथा ठेका प्रथा की समाप्ति की मांग पर कई दिनों का विशाल प्रतिवाद संगठित किया. तमाम पुलिस दमन का सामना करते हुए पूर्वी दिल्ली नगर निगम के सफाई कर्मचारियों की 28-दिनी हड़ताल ने रोजगार के नियमितीकरण की उनकी मांग को मानने पर निगम पदाधिकारियों को मजबूर कर दिया. 25 सितंबर को दिल्ली में और देश के अन्य हिस्सों में भी लगातार जारी सीवर मौतों के खिलाफ राष्ट्रीय राजधानी में हजारों सफाई कर्मचारियों ने प्रदर्शन किया. इन सीवर मौतों में जिन्होंने अपने परिजन को खोया है, उन्होंने और साथ ही अन्य सफाई कर्मियों ने भी अपने भयावह अनुभवों और मोदी के स्वच्छ भारत के खोखलेपन को वहां साझा किया.

सफाई कर्मचारियों और ट्रेड यूनियनों की प्रतिवादकारी आवाज दिनों-दिन मजबूत होती जा रही है. समय पर मजदूरी के भुगतान, चिकित्सा सुविधा तथा दस्ताने, गमबूट (जूते), मास्क जैसी सुरक्षा सामग्रियां मुहैया कराने, मृत व घायल कर्मियों के लिए समुचित मुआवजे, आदि मांगों को लेकर ये लोग कई बार सड़कों पर उतरे हैं. सरकार को सीवर और सेप्टिक टैंकों की सफाई के लिए आधुनिक उपकरणों का इस्तेमाल करना होगा. सबसे आवश्यक रूप से सफाई कर्मियों के संघर्ष के दौरान हाथ से मैला साफ करने वालों के पुनर्वास की मांग जोरदार ढंग से उठाई गई है. हाथ से मैला साफ करना एक अमानवीय जातिवादी प्रथा है और इसे खत्म करना ही होगा. जाति उन्मूलन के लिए यह प्रथा खत्म होनी ही चाहिए.

– अग्नित्र

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