सबरीमाला पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को बुलंद करें

यह शर्मनाक और निंदनीय है कि भाजपा और आरएसएस सबरीमाला मंदिर में 10-50 वर्ष की आयु सीमा की लड़कियों और स्त्रियों के प्रवेश पर प्रतिबंध को हटाने से संबंधित सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को बहाल करने के लिए वामपंथी सरकार पर हमला कर रहे हैं. एक भाजपा नेता – ऐक्टर कोल्लम तुलसी – ने एलान किया है कि सबरीमाला के अंदर जाने वाली महिलाओं को “दो टुकड़ों में फाड़ दिया जाएगा.” सबरीमाला मुद्दे की खबर प्रकाशित करने वाली महिला पत्रकारों और छात्रों पर हिंसक हमले किए जा रहे हैं और उन्हें मंदिर के करीब जाने से भी रोका जा रहा है. केरल पुलिस हिंसक भीड़ों के खिलाफ कुछ नहीं कर पा रही है.

‘तीन तलाक’ और माहवारी की आयु सीमा वाली लड़कियों और महिलाओं के लिए सबरीमाला मंदिर में प्रवेश निषेध को अवैध करार देते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने सही तौर पर कहा कि धार्मिक परंपराओं और आचार-विचार को बहाना बनाकर महिलाओं की संवैधानिक समानता और अधिकारों का उल्लंघन नहीं किया जा सकता है. तीन तलाक वाले फैसले का श्रेय लेने की कोशिश करने वाली भाजपा सबरीमाला फैसले का हिंसक विरोध करके अपने दुहरे मानदंड और महिला अधिकारों के प्रति सम्मान के घोर अभाव को ही उजागर कर रही है. भाजपा महिला अधिकारों के बहाने से सिर्फ सांप्रदायिक पूर्वाग्रह और हिंसा फैलाने पर तुली रहती है – वह ‘तीन तलाक’ को अपराधपूर्ण कार्रवाई बता रही है और ‘लव जेहाद से महिलाओं को बचाने’ के नाम पर अंतरधार्मिक विवाहों पर हमले कर रही है. दरअसल, ये लोग ‘हिंदुत्व’ राजनीति के नाम पर प्रतिगामी पितृसत्तात्मक व्यवहारों और यहां तक कि यौन हिंसा तक का बचाव करते रहते हैं.

जाति या लिंग के आधार पर मंदिरों में अथवा अन्य धार्मिक स्थलों पर जाने से रोकना असंवैधानिक और भेदभावमूलक है. मनुष्य अपने खुद के मूल्यों को अपने ईश्वरों पर आरोपित करता है और पितृसत्तात्मक मूल्य, जो स्त्रियों पर पुरुषों की यौन-इच्छाएं थोपते हैं, वास्तविक जीवन में महिलाओं को बेहद नुकसान पहुंचाते हैं. सबरीमाला की एक पुजारिन और एक नवयुवती की माता ने सर्वोच्च न्यायालय में दायर अपील में सही कहा है कि इस न्यायालय के फैसले के खिलाफ दायर याचिका में हिंदुत्व ग्रुपों द्वारा दिए गए तर्क न केवल लड़कियों और महिलाओं के लिए, बल्कि जिस अयप्पा ईश्वर को वे (अपवित्र होेने से) बचाना चाहते हैं, उस ईश्वर का भी अपमान करते हैं. उन श्रद्धालु महिला ने बताया कि छोटी लड़कियों या महिलाओं की उपस्थिति या उन्हें देखने से अयप्पा का ब्रह्मचर्य भंग हो सकता है – यह तर्क यही संदेश देता है कि लड़कियां और महिलाएं यौन-वस्तुएं हैं जिन्हें देखने से ही पुरुषों और ईश्वरों में समान रूप से यौन-इच्छा “भड़क” जाती है. यह तर्क देकर, कि छोटी लड़की या महिला की मौजूदगी से ईश्वर भी अपनी यौन-इच्छा को काबू में नहीं रख सकेंगे, सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का विरोध करने वाले लोग पुरुषों को बलात्कार और यौन शोषण का बहाना और लायसेंस मुहैया करा रहे हैं. सबरीमाला मंदिर बोर्ड के एक सदस्य के इस वक्तव्य से भी यही बात जाहिर होती है कि मंदिर में महिलाओं के प्रवेश से सबरीमाला “यौन पर्यटन” का अखाड़ा बन जाएगा. विडंबना तो यह है कि सबरीमाला में महिलाओं के प्रवेश को रोकने के लिए जिन औरतों को गोलबंद किया जा रहा है वे अधिकांशतः उन्हीं उत्पीडि़त समुदायों से आती हैं जिन्हें ब्राह्मणवादी परंपराओं के खिलाफ संघर्ष करना पड़ा है जो परंपराएं इन समुदायों की महिलाओं को अपने स्तन ढंकने पर भी प्रतिबंध लगाती हैं.

यह भी भर्त्सनीय है कि केरल में कांग्रेस पार्टी भी सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को बुलंद करने वाली वहां की एलडीएफ सरकार पर हमला करने में भाजपा का साथ दे रही है. कांग्रेस पार्टी भाजपा पर निशाना साधने के लिए ‘संविधान बचाओ’ नारे का इस्तेमाल करती है – तब, वह महिलाओं के संविधानसम्मत अधिकारों व समानता पर हमला करने में भाजपा का साथ क्यों दे रही है? महिला-समानता के इस बुनियादी लोकतांत्रिक प्रश्न पर भाजपा के साथ कांग्रेस की ऐसी अवसरवादी एकता से संविधान को बचाने और फासीवाद का प्रतिरोध करने की लड़ाई ही कमजोर होती है.

 

सबरीमाला और अयोध्या मसले पर भाजपा-आरएसएस नेताओं की धमकियां संविधान का हिंसक उल्लंघन हैं

अगर केरल की राज्य सरकार सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर लगे निषेध को हटाने के सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को लागू करना जारी रखती है तो भाजपा अध्यक्ष ने खुलेआम सरकार के खिलाफ हिंसा का समर्थन किया है और इसे दुष्प्रेरित भी किया है.

शाह ने कहा कि कोर्ट को ऐसे फैसले नहीं सुनाने चाहिए जिन्हें लागू न किया जा सके; और उन्होंने चेतावनी दी कि अगर केरल की माकपा नीत सरकार ने सबरीमाला में महिलाओं के प्रवेश को रोकने के लिए हिंसा भड़काने वालों को गिरफ्तार किया तो भाजपा कार्यकर्ता सरकार को ‘उखाड़ फेंकेंगे.’

शाह की टिप्पणी ने यह स्पष्ट कर दिया है कि सबरीमाला मंदिर में जाने की कोशिश करने वाली महिला श्रद्धालुओं पर हमले और हिंसक पथराव और यहां तक कि वहां मौजूद महिला पत्रकारों पर हमले के लिए भाजपा और आरएसएस काफी हद तक जिम्मेवार हैं. केरल में अपना समर्थन आधार बढ़ाने की उम्मीद में ही वे ऐसा कर रहे हैं. सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को लागू करने का अपना कर्तव्य पालन पूरा करने के लिए वे लोग सरकार को अपने हमले का निशाना बना रहे हैं.

सर्वोच्च न्यायालय और संविधान के प्रति भाजपा की हिंसक अवहेलना इस न्यायालय में चल रहे अयोध्या मामले में उसकी स्थिति से भी उजागर होती है. अयोध्या सुनवाई के स्थगन के बाद कई भाजपा नेताओं ने वही बात दुहराई जो आरएसएस-प्रमुख मोहन भागवत ने हाल में कही है, यानी कि जिस जगह पर बाबरी मस्जिद को ढहाया गया, उसी जगह पर राम मंदिर बनाने के लिए मोदी सरकार न्यायालय की प्रक्रिया को दरकिनार करते हुए अध्यादेश लाए. एक आरएसएस नेत्री साध्वी प्राची ने और भी स्पष्ट कहा – उन्होंने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों को धता बताते हुए बाबरी मस्जिद तोड़ी गई थी, इसी प्रकार राम मंदिर भी बनाया जाएगा, चाहे न्यायालय इसे पसंद करे या न करे !

भाजपा और आरएसएस के ऐसे राजनीतिक वक्तव्य “हिन्दू धार्मिक भावनाओं” की अभिव्यक्ति नहीं हैं – ये फासिस्ट हिंसा के एक बहाने के बतौर धर्म के इस्तेमाल की कोशिशें हैं. यहां हम स्मरण कर सकते हैं कि मुस्लिम धार्मिक नेतृत्व और इस समुदाय ने ‘तीन तलाक’ को प्रतिबंधित करने और हाजी अली दरगाह में महिलाओं के प्रवेश के हक में कोर्ट के फैसलों का कोई हिंसक विरोध नहीं किया है. सबरीमाला और अयोध्या मुद्दों पर हिंसक विरोध “धार्मिक” नहीं, बल्कि राजनीतिक चरित्र के हैं – वोट के लिए प्रतिगामी पितृसत्तात्मक और सांप्रदायिक भावनाओं को भड़काने की कोशिशें ही एकमात्र राजनीति है जिसे भाजपा आज तक करती आई है.

मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों का रक्षक बनने का दावा करने वाली मोदी सरकार का असली चेहरा तब सामने आ गया, जब दाऊदी बोहरा समुदाय के आध्यात्मिक गुरू सैयदना मुफद्दल सैफुद्दीन के साथ प्रधान मंत्री मोदी की मुलाकात के ठीक बाद सरकार ने इस समुदाय की लड़कियों की ‘कफ्ज’ (जननेंद्रिय को काटने) की प्रथा पर प्रतिबंध के लिए अपना समर्थन वापस ले लिया. इससे साबित होता है कि मोदी सरकार को हिंदू या मुस्लिम महिला के अधिकारों से कोई वास्ता नहीं है. वे तो बस, अपनी प्रतिगामी फासीवादी राजनीति को आगे ले जाने के लिए महिलाओं के अधिकारों को कुर्बान करने और वहां तक कि उनके अधिकारों पर हमला करने के लिए भी हर समय तैयार रहते हैं.

भाकपा(माले) भारत के अवाम का आह्नान करती है कि वे सबरीमाला और अयोध्या मुद्दे पर संविधान और सर्वोच्च न्यायालय के खिलाफ हिंसा भड़काने की भाजपाई कोशिशों को खारिज करें और उसका प्रतिरोध करें.

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