किसानों के इस लड़ाकू जज्बे को सलाम

एक अक्टूबर को दिल्ली के गाजीपुर बार्डर पर रोके गए ‘किसान क्रान्ति मार्च’ में शामिल किसानों का सब्र का बांध दो अक्टूबर की दोपहर होने तक आखिर टूट ही गया. वे दिल्ली की सीमा पर अवरोध खड़े किए दिल्ली पुलिस और अर्ध-सैनिक बलों से भिड़ गए. दस दिनों से हरिद्वार से चला किसानों का यह शांतिपूर्ण मार्च आखिर दो अक्टूबर को दिल्ली के दरवाजे पर आकर पुलिस के साथ मुठभेड़ में बदल ही गया. पुलिस से भिड़ते समय किसानों की मांग सिर्फ इतनी थी कि उन्हें चौधरी चरणसिंह की समाधि ‘किसान घाट’ तक जाने दिया जाए, ताकि वे अपनी समस्याओं को देश के सामने रख सकें. किसानों को अगर एक अक्टूबर की रात किसान घाट जाने दिया गया होता, तो दिल्ली में न यातायात बाधित होने की कोई समस्या आती और न ही कानून व्यवस्था में कोई व्यवधान पैदा होता. क्योंकि किसान घाट दिल्ली की आबादी से अलग यमुना नदी के किनारे स्थित एक खुला क्षेत्र है. वहां किसानों की ज्यादा भीड़ जमा होने से भी दिल्लीवासियों को कोई दिक्कत नहीं होनी थी. फिर भी किसानों को किसान घाट जाने से क्यों रोका गया? यह समझना सबके लिए थोड़ा मुश्किल हो रहा है. पर किसानों ने पुलिस द्वारा छोड़े गए अश्रुगैस के गोलों, पानी की तेज बौछार और लाठियों का बहादुरी से मुकाबला किया. खबरों के अनुसार 35 किसान घायल हुए हैं और उनके दर्जनों वाहनों को पुलिस ने भारी नुकसान पहुंचाया है.

किसानों की इस संघर्षशील चेतना का न सिर्फ चौतरफा स्वागत हुआ है, बल्कि इस दमन के बाद आज पूरे देश की सहानुभूति उनके साथ है. किसानों के इस लड़ाकू जज्बे को हमारा भी सलाम! पर किसानों की इस संघर्षशील चेतना और लड़ाकू जज्बे ने उत्तर प्रदेश सरकार से लेकर केंद्र तक की सरकारों और खुद भारतीय किसान यूनियन टिकैत के नेतृत्व को भी, जिसके बैनर तले वे मार्च कर रहे थे, बेचैन कर डाला है. दिल्ली के गाजीपुर बार्डर पर दो अक्टूबर को किसानों और दिल्ली पुलिस के बीच जो छोटा सा संघर्ष दिखा, वह न तो केंद्र व राज्य सरकार के आकलन में था और न ही भारतीय किसान यूनियन टिकैत के नेतृत्व की योजना के हिस्से में. यह अपने नेतृत्व को पीछे छोड़कर देश के पीड़ित किसानों की खुद की स्वतंत्र पहल थी. किसानों के लिए यह समझना कठिन था कि उन्हें एक अक्टूबर से ही आधे रास्ते में छोड़कर उनका नेतृत्व, जिसकी वर्तमान सरकार से नजदीकियां जगजाहिर हैं, ऐसी क्या लम्बी वार्ता कर रहा है जो उन्हें किसान घाट पहुंचने से भी रोके हुए है. दरअसल एक अक्टूबर को यात्रा के गाजियाबाद पहुंचते ही राज्य व केंद्र सरकार किसान यूनियन से वार्ता करने लगी थी. जबकि अपने साढ़े चार साल के शासन काल में मोदी सरकार ने अब तक दिल्ली पहुंचे किसी भी आंदोलनकारी समूह से कभी वार्ता नहीं की है. यात्रा को दिल्ली सीमा पर रोक कर किसान यूनियन का शीर्ष नेतृत्व उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और देश के गृह मंत्री राजनाथ सिंह सहित राज्य व केंद्र के मंत्रियों के साथ लम्बी वार्ता में चला गया था. एक अक्टूबर से शुरू हुई वार्ता दो अक्टूबर सुबह तीन बजे तक चली और असफल रही. दो अक्टूबर को फिर सुबह दोबारा वार्ताओं का दौर चला, जिसे लम्बा खिंचता देख किसानों के सब्र का बांध टूट गया.

किसानों की जिन पंद्रह प्रमुख मांगों के लिए इस ‘किसान क्रांति मार्च’ को आयोजित किया गया था, उसमें स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को लागू किया जाए; आत्महत्या करने वाले किसानों के परिजनों का पुनर्वास हो; किसानों की कर्जमाफी; किसानों को बिजली मुफ्त में दी जाए; किसानों की फसलों की सरकारी खरीद की गारंटी; फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य लागत से पचास प्रतिशत जोड़कर मिले; बकाया गन्ना भुगतान ब्याज सहित अविलंब कराया जाए; दस साल पुराने डीजल वाहनों पर लगी रोक हटाई जाए; प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना का लाभ सीधे किसानों को दिया जाए; किसानों की न्यूनतम आमदनी सुनिश्चित हो; आवारा पशु व जंगली जानवरों से खेती को सुरक्षा मिले; खेती से जुड़े औद्योगिक उत्पादों से जीएसटी हटाई जाए; भारत में ज्यादा उत्पादित कृषि मालों का बाहर से आयात प्रतिबंधित किया जाए; किसानों को पांच हजार रुपया प्रतिमाह पेंशन दी जाए और मनरेगा योजना को कृषि कार्य से जोड़ा जाए आदि मांगें शामिल थीं. इतनी लम्बी वार्ताओं और पुलिसिया दमन झेलने के बाद भारतीय किसान यूनियन के नेता नरेश टिकैत और राकेश टिकैत केन्द्रीय कृषि कल्याण राज्य मंत्री गजेन्द्र शेखावत और उत्तर प्रदेश के गन्ना मंत्री सुरेश राणा के साथ शाम को किसानों के बीच आए. केन्द्रीय मंत्री ने जब सरकार द्वारा मानी गई सात मांगें दिल्ली बार्डर पर इन्तजार कर रहे किसानों को बताई तो किसानों के सब्र का बांध एक बार फिर टूट गया. किसानों ने एक स्वर में इस समझौते को नकार दिया और एक जूता उत्तर प्रदेश के गन्ना मंत्री सुरेश राणा पर फेंक दिया. किसानों ने वहीं धरने पर बैठे रहने का ऐलान कर अपने लड़ाकू तेवरों से दोनों सरकारों और किसान यूनियन के नेतृत्व को सकते में डाल दिया.

आंदोलनकारी किसानों को केन्द्रीय मंत्री की घोषणाओं में किसानों के साथ किए जा रहे धोखे की झलक साफ दिख रही थी. केंद्र व राज्य सरकार ने सभी किसानों की कर्जमाफी, किसानों को मुफ्त बिजली, गन्ने का बकाया भुगतान, पांच हजार रुपया किसान पेंशन, फसल बीमा में बदलाव, किसानों की न्यूनतम आय की गारंटी, फसलों की लागत में सी2$ के साथ पचास प्रतिशत मुनाफा और स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को लागू करने जैसी किसानों की प्रमुख मांगों को मानने से साफ मना कर दिया था. जिन मांगों को सरकार मानी गई मांग बता रही थी, उनमें से गेहूं की खरीद पर घोषित एमएसपी में सी2$ नहीं जोड़ा गया है. देश में ज्यादा उत्पादित कृषि मालों के बाहर से आयात को प्रतिबंधित करने और सभी कृषि उपज की सरकारी खरीद के वायदे को सरकार तब तक पूरा नहीं कर सकती जब तक वह विश्व व्यापार संगठन (डब्लूटीओ) से इस सम्बन्ध में किये करार और डब्लूटीओ के व्यापार सुगमता समझौता (जिस पर खुद मोदी सरकार ने किसानों के विरोध के बावजूद हस्ताक्षर किए) से बाहर नहीं निकल जाती. इसी तरह दस साल पुराने ट्रैक्टरों पर प्रतिबन्ध हटाने, मनरेगा योजना को कृषि कार्य से जोड़ने और कृषि में इस्तेमाल मशीनों व यंत्रों पर जीएसटी घटाने पर भी कोई ठोस निर्णय के बजाय सरकार का वायदा जुमला ही ज्यादा लग रहा था. ऐसे में किसानों का गुस्सा स्वाभाविक था. यह गुस्सा जितना सरकार के खिलाफ था उतना ही अपने नेतृत्व के खिलाफ भी था.

आक्रोशित किसानों के एक हिस्से ने सड़क पर ही धरना जारी रखा जबकि एक हिस्सा अपने को ठगा महसूस कर वापस अपने घरों को लौटने लगा. रात बारह बजे तक आंदोलनरत किसानों का बड़ा हिस्सा अपने घरों को लौट चुका था. अब हजारों के बजाय सैकड़ों की संख्या में ही संगठन के प्रमुख कार्यकर्ता और संगठन से जुड़े कुछ किसान वहां बचे रहे. स्थितियों को देखते हुए भारतीय किसान यूनियन टिकैत ने सरकार के साथ आन्दोलन को समाप्त करने के लिए धरना स्थल पर बचे हुए किसानों को रात में ही किसान घाट पहुंचा कर आन्दोलन खत्म करने पर सहमति बनाई. किसान घाट पहुंच कर रात डेढ़ बजे संगठन के अध्यक्ष नरेश टिकैत ने घोषणा की कि हमारा मकसद किसान घाट तक पहुंच कर अपनी बातों को कहना था जो अब पूरा हो गया है. इसलिए अब आन्दोलन समाप्त कर किसान अपने घरों को जाएंगे. इसके बाद सभी किसान वापस अपने घरों को लौट गए. आन्दोलन की इस तरह की समाप्ति से तात्कालिक तौर पर सरकार और भारतीय किसान यूनियन टिकैत ने राहत की सांस ली होगी, पर मोदी सरकार के खिलाफ किसानों का गुस्सा इससे खत्म होने बजाए और बढ़ा है. दिल्ली बार्डर पर किसानों पर हुए दमन के खिलाफ किसान संघर्ष की आग पूरे देश में फैल गयी है. अखिल भारतीय किसान महासभा ने किसानों पर हुए इस दमन के खिलाफ राष्ट्रव्यापी विरोध का आह्नान किया. इसके तहत उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, पंजाब, असम सहित देश के विभिन्न राज्यों में किसान महासभा के कार्यकर्ताओं ने तीन और चार अक्टूबर को विरोधस्वरूप प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पुतले फूंके. पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भी आक्रोशित किसानों ने इस दमन के खिलाफ कई जगह चक्का जाम कर अपना विरोध दर्ज किया. मेरठ में तीन अक्टूबर को ‘उत्तर प्रदेश किसान अधिकार समन्वय मंच’ की बैठक में दर्जनों किसान नेताओं ने इस दमन का विरोध करते हुए पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसान आन्दोलन को तेज करने का संकल्प लिया. इस दमन के बाद किसानों ने दिल्ली के द्वार पर आए किसानों का दमन करने वाली किसान-विरोधी मोदी सरकार को 2019 में सबक सिखाने का संकल्प लिया है. मंदसौर में किसान आन्दोलन के दमन के बाद चले धारावाहिक किसान आन्दोलन के बाद दिल्ली के द्वार पर हुए किसानों के इस दमन ने देश का ध्यान किसानों की पीड़ा की तरफ खींचा है. अभी 28-29 नवम्बर को दिल्ली में कई दिशाओं से किसानों का मार्च और 30 नवम्बर को दिल्ली में होने वाली विराट किसान रैली 2019 के लिए किसानों की निर्णायक भूमिका की जमीन तैयार करेगी. सभी किसान संगठनों और किसान संगठनों के समन्वयों को एकताबद्ध होकर 2019 के लोकसभा चुनावों में इस कारपोरेट परस्त, किसान-विरोधी भाजपा सरकार को उखाड़ फेंकने और मजदूर किसान हितैषी ताकतों को बड़े पैमाने पर संसद में पहुंचाने में अपनी भूमिका निभानी होगी.

– पुरुषोत्तम शर्मा

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