असम के कार्बी आंग्लांग में दो लोगों की भीड़-हत्या के खिलाफ प्रतिवाद

कार्बी आंग्लांग के डोकमोका में गुवाहाटी निवासी दो नौजवानों – संगीतकार नीलोत्पल और उसके दोस्त व व्यवसायी अभिजीत – की भीड़ द्वारा पीट-पीट कर की गई हत्या ने पूरे देश को स्तब्ध और शोकाकुल कर दिया है. यह हत्या-कांड सोशल मीडिया पर ‘बच्चा-चोर’ के बारे में फैलाए गए अफवाहों के चलते झारखंड, तमिलनाडु, कर्नाटक और तेलंगाना में हुई ऐसी ही घटनाओं की लंबी श्रृंखला की नवीनतम कड़ी है.

इस भीड़ हत्या के खिलाफ प्रतिवाद में और मृतकों को न्याय की मांग करते हुए कार्बी स्टूडेंट्स एसोसिएशन, केएनसीए, ‘आसू’, ऐपवा तथा अन्य संगठनों ने दिफू में एक मोमबत्ती मार्च निकाला जो दिफू क्लब से शुरू होकर सेमसोनसिंग इंग्ती पार्क तक गया.

कई नागरिक समूहों और जन-आंदोलनों ने पूरे असम में इस तरह के प्रदर्शन आयोजित किए. प्रतिवादकारियों ने बताया कि इस घटना में पुलिस की भी संलिप्तता रही है – पुलिस ने इन नौजवानों को छुड़ाने की कोशिश नहीं की, जबकि हत्या-स्थल से महज 4 किलोमीटर की दूरी पर थाना स्थित है. बुद्धिजीवियों और विभिन्न संगठनों ने इस घटना की, तथा बच्चा-चोरों के बारे में अफवाह उड़ाने वाली ताकतों की भरोसेमंद जांच कराने की मांग की है.

प्रतिवादकारियों ने यह भी बताया कि केंद्र और असम की शासक पार्टी भाजपा अंधविश्वास, असहिष्णुता, संदेह और भीड़-हिंसा की संस्कृति को बढ़ावा दे रही है, जिससे तमाम नागरिकों के लिए खतरा पैदा हो रहा है. उन्होंने बताया कि अगर भाजपा और आरएसएस अल्पसंख्यकों व दलितों के खिलाफ भीड़ हिंसा और महिलाओं की नैतिक पहरेदारी को प्रोत्साहित करेंगे, तो यह आग न सिर्फ पड़ोसी के घर को, बल्कि पूरे समाज को जला डालेगी.

भाकपा(माले) ने अन्य संगठनों के साथ मिलकर चेतावनी दी है कि भाजपा और आरएसएस असमी जनता को कार्बी व बोडो समुदायों के खिलाफ खड़ा करने तथा नागरिकता संशोधन बिल (2016) के खिलाफ असम में चल रहे एकताबद्ध आंदोलनों को तोड़ने की साजिशें बंद करे.

इस राज्य में सोशल मीडिया पर ‘बच्चा-चोरी’ के बारे में फैलाई गई व्यापक अफवाहों ने ही डोकमोका में भीड़-हत्या को अंजाम दिया है. इसके पहले भी बच्चा-चोरी के भ्रम में पड़कर असम के शोणितपुर जिले में एक व्यक्ति की पिटाई की गई थी. असमिया समाज में बच्चा-चोरी का गहरा धंसा अवबोध कोई नई चीज नहीं है. प्रदेश के अधिकांश लोगों को याद होगा कि बचपन के शुरूआती दिनों में उन्हें अनुशासित करने के लिए उनके मन में यह डर पैदा किया जाता था कि अगर वे बदमाशी करना बंद नहीं करेंगे तो कोई बच्चा-चोर उन्हें उठा कर ले जाएगा. अगर इस तथ्य को देखें कि असम और कार्बी अंग्लांग में बच्चों की तस्करी एक कड़वी हकीकत है, तो यह समझना मुश्किल नहीं कि पंजुरी जैसे सुदूर गांव में बच्चा-चोरी की चेतावनी-भरी अफवाह का क्या असर हो सकता है. इस गांव में कोई स्थानीय अखबार भी मुश्किल से आता होगा. लेकिन अधिकांश लड़कों के हाथों में व्हाट्सऐप और फेसबुक के साथ मोबाइल फोन जरूर दिख जाएंगे. राज्य भर में बच्चा-चोरी के बारे में जो अफवाह फैलाई गई, उससे इस गांव में दहशत पैदा हो गई थी. जब अभिजीत और नीलोत्पल पंजुरी गांव पहुंचे, तो कुछ बच्चों ने उन्हें देखते ही दूसरे लोगों को कहना शुरू कर दिया कि काले रंग के स्कॉरपियो में दो बच्चा-चोर गांव में घुस आए हैं (अफवाहों में ऐसा ही जिक्र रहता है – काले वाहन में बच्चा-चोर !). मिनटों में यह खबर गांव भर में फैल गई और अत्यंत उत्तेजित भीड़ ने इन दो निर्दोष नौजवानों को पीट कर मार डाला.

इस घटना के ठीक बाद सबसे खतरनाक और विभाजनकारी विचार फैलाने का प्रयास किया गया कि आदिवासी लोग हिंसक और असभ्य होते हैं, और इसीलिए उनलोगों ने असमी नौजवानों को मार डाला. सोशल मीडिया पर इसी किस्म के उत्तेजक बयानों की झड़ी लग गई. जब पूरे राज्य भर के लोग ‘नागरिकता संशोधन बिल’ के खिलाफ आन्दोलन कर रहे हैं और जब एनआरसी का अंतिम मसौदा आने ही वाला है, ऐसे नाजुक दौर में आदिवासियों और गैर-आदिवासियों के बीच झड़पों से असम जल जाएगा. यहां यह मौजूं सवाल उठता है: अगर ऐसी झड़पें सचमुच होने लगें तो इससे किसका फायदा होगा ? जाहिर है, उन्हीं का फायदा होगा जो नागरिकता बिल के पक्ष में खड़े हैं. तब, क्या हम इस संभावना को खरिज कर सकते हैं कि सोशल मीडिया पर अफवाह और उकसावा फैलाने का काम उन्हीं सांप्रदायिक ताकतों का है, जो असम में नागरिकता बिल का समर्थन करते हैं और जो पूरे देश में सोशल मीडिया पर झूठी खबरें उड़ाने के लिए बदनाम रहे हैं.

इसी उत्तेजना-भरे माहौल में भीड़-हिंसा के खिलाफ शांति, एकता और सद्भाव का संदेश फैलाने के मकसद से गुवाहाटी में सांस्कृतिक प्रतिवाद दिवस का आयोजन किया गया. यह सांस्कृतिक प्रतिवाद विशेषतः इसलिए भी महत्वपूर्ण था, क्योंकि भीड़ हिंसा के शिकार नौजवान उभरते संगीतकार ही थे.

अंधविश्वास के विरोध में और अखंडता, शांति तथा सद्भाव का संदेश फैलाने के उद्देश्य से अनेक प्रसिद्ध व सम्मानित कलाकारों और गायकों ने यह कार्यक्रम संगठित किया था. असम के प्रख्यात गायक और अखिल असम जन सांस्कृतिक परिषद के कार्यकर्ता लोकनाथ गोस्वामी ने इस कार्यक्रम का संचालन किया. अन्य अनेक गायकों के साथ-साथ उन्होंने भी अपना सबसे लोकप्रिय गीत भी गाया. मनीषा हजारिका ने भी इस कार्यक्रम में हिस्सा लिया और आदिवासी तथा गैर-आदिवासी समुदायों के बीच शांति व एकता बनाए रखने का आह्नान किया. इनके अलावा जेपी दास. कुला बरुआ, समर हजारिका जैसे प्रसिद्ध कलाकारों ने भी अपने गीत पेश किए. इन गायकों के गीतों से प्रेरित होकर चित्रकारों ने कई चित्र भी बनाए. असम के नामी चित्रकार रविराम ब्रह्मा ने अपनी कूंची चलाकर पेंटिंग प्रदर्शनी का उद्घाटन किया. चंपक बोरबोरा, ज्ञानेन बरकाकती, नितुपर्णा राजवंशी सरीखे लोकप्रिय चित्रकारों, कलाकारों और कार्टूनिस्टों ने भी अंधविश्वासों और विभाजनकारी राजनीति के खिलाफ एकताबद्ध संघर्ष चलाने का संदेश दिया.

गुवाहाटी में जून के बरसाती मौसम में भी इस कार्यक्रम में काफी लोग इकट्ठा हुए थे. वहां उपस्थित जन समूह ने अंधविश्वास के खिलाफ और शांति व एकता के लिए असम में निरंतर सांस्कृतिक आंदोलन चलाने का संकल्प लिया.

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