नागरिकता संशोधन विधेयक 2016: चोरी-छिपे गोलवलकर के भारत की ओर बढ़ता कदम

यह एक सुविदित तथ्य है कि संघ-भाजपा प्रतिष्ठान विचारधारात्मक रूप से धर्मनिरपेक्ष भारतीय गणराज्य की धारणा के प्रति बैर भाव रखता है. उनकी राष्ट्रवाद की अवधारणा हिंदू बहुसंख्यकवाद अथवा हिंदुत्व है, भारतीय पहचान की उनकी अवधारणा हिंदू वर्चस्ववादी पहचान है. ऐतिहासिक रूप से उन्होंने मनुस्मृति को ही अपने असली संविधान के रूप में स्वीकार किया है – राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के अंग्रेजी मुखपत्र ‘आर्गनाइजर’ ने 30 नवम्बर 1949 को अपने सम्पादकीय में इस बात पर विलाप किया था कि भारतीय संविधान, जिसे अभी-अभी स्वीकृत किया गया था, मनुस्मृति के आधार पर नहीं तैयार किया गया था. और अब, जब वे संविधान के खाके के अंदर बंधकर अपना काम चलाने को मजबूर हैं, तो वे हमेशा संविधान की भूमिका में व्याख्यायित उसकी आत्मा और उसके उद्देश्यों में तोड़-फोड़ करने के रास्ते खोजते रहते हैं, और उसमें से ‘धर्मनिरपेक्ष’ और ‘समाजवादी’ शब्दों को, जिन्हें 42वें संविधान संशोधन द्वारा स्पष्ट रूप से संविधान की भूमिका में शामिल किया गया था, हटाने पर तुले हैं. अनंत हेगड़े द्वारा खुल्लमखुल्ला तौर पर की गई घोषणा, कि भाजपा का मकसद संविधान में परिवर्तन करना है, पर भी लोगों का उतना ही व्यापक रूप से ध्यान गया है जितना वाजपेयी सरकार द्वारा संविधान समीक्षा आयोग का गठन करने के कदम की ओर गया था. मगर संविधान में तोड़फोड़ करने के सबसे महत्वपूर्ण कदम, यानी नागरिकता अधिनियम संशोधन विधेयक, 2016 की ओर लोगों का उतना ध्यान नहीं गया है. हमें असम के लोगों का कृतज्ञ होना चाहिये कि उन्होंने इस कुटिलता भरे विधेयक के खिलाफ जोरदार और स्पष्ट शब्दों में आवाज उठाई. और उनकी आवाज अब समूचे उत्तर पूर्व में गूंजने लगी है, जिसकी अनुगूंज समूचे भारत में सुनाई दे रही है.

इस विधेयक में पड़ोसी देशों से आकर भारत की नागरिकता प्राप्त करने के अभ्यर्थियों की एक नई कोटि को घुसाया गया है, जिनको 1955 के कानून के अनुसार 12 वर्ष की अनिवार्य अवधि के बजाय केवल छह वर्षों की अवधि में ही नागरिकता प्रदान की जा सकती है. मगर यह अनुग्रहपूर्ण बरताव केवल गैर-मुस्लिमों (खासकर अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान से आने वाले हिंदू, सिख, बौद्ध, पारसियों और ईसाइयों) तक ही सीमित रहेगा, और इस प्रकार नागरिकता के निर्धारण में एक भेदभावपूर्ण धार्मिक विवेचन के प्रावधान को घुसा दिया गया है. जाहिर है कि नागरिकता की आकांक्षा रखने वालों की अनुग्रह-सूची में से मुसलमानों को हटा दिया जाना सोचा-समझा कदम है जिसकी जड़ें इस्लाम-भीति में गहरी धंसी हुई है.

यहां हम आरएसएस के उस मॉडल को याद कर सकते हैं जो उन्होंने भारत के मुसलमानों के लिये निर्धारित किया था – जिसकी प्रेरणा खुले तौर पर उन्हें जर्मनी के नाजियों द्वारा यहूदियों के साथ किये गये बरताव से मिली थी. आरएसएस के द्वितीय सरसंघचालक गोलवलकर ने 1939 में लिखा था कि नाजी जरमनी में यहूदियों का सफाया अभियान “हिन्दुस्तान में हमारे लिये एक अच्छा सबक है जिसे सीखना और उसका फायदा उठाना चाहिये” और यह कि भारतीय मुसलमानों (जिन्हें उन्होंने “हिन्दुस्तान में विदेशी नस्लों” का नाम दिया था) को “क्या तो अनिवार्य तौर पर हिंदू संस्कृति और भाषा अपनानी होगी, हिंदू धर्म का आदर करना और उसके प्रति श्रद्धा रखना सीखना होगा, उन्हें हिंदू नस्ल और संस्कृति यानी हिंदू राष्ट्र का गौरवगान करना छोड़कर अन्य तमाम विचारों को त्यागना होगा और उन्हें हिंदू नस्ल में एकरूप हो जाने के लिये अपने स्वतंत्र अस्तित्व का त्याग करना होगा, वरना वे इस देश में तो रह सकते हैं, मगर उनको हिंदू राष्ट्र के सम्पूर्णतः अधीन रहना होगा, किसी चीज का दावा नहीं करना होगा और खुद को कोई भी सुविधा पाने के लायक नहीं समझना होगा, और नागरिकता के अधिकार के मामले में तो उन्हें बिल्कुल तरजीह नहीं मिलेगी.” (एम.एस. गोलवलकर, ‘वी ऑर अवर नेशनहुड डिफाइंड, 1939, पृ. 35-48). नागरिकता संशोधन विधेयक 2016 भारत के बारे में अम्बेडकर की स्वप्न-दृष्टि से कहीं दूर, गोलवलकर की भारत-दृष्टि की दिशा में चोरी-छिपे बढ़ाया गया एक कदम है.

भाजपा के लिये 1947 में हुआ भारत का बंटवारा इतिहास का कोई फैसलाकुन, बंद अध्याय नहीं है: वह तीखा साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण और दोषपूर्ण द्विराष्ट्र सिद्धांत, जो उस पीड़ादायक अध्याय की लाक्षणिक विशिष्टता था, आज भी संघ ब्रिगेड द्वारा धर्मनिरपेक्षता और साम्प्रदायिक सद्भाव की हर धारणा के खिलाफ चलाये जा रहे जिहाद में उनके लिये पकी-पकाई राजनीतिक खुराक का काम कर रहा है. हाल ही में कैराना और नूरपुर के उपचुनाव से पहले संघ ब्रिगेड ने अलीगढ़ मुस्लिम युनिवर्सिटी के छात्र संघ कार्यालय में टंगी जिन्ना की तस्वीर को मुद्दा बनाकर एक जहरीला और विभाजनकारी टकराव पैदा करने की कोशिश की थी, और उसके जवाब में केवल एएमयू के छात्रों एवं गन्ना किसानों की अत्यंत शक्तिशाली और संकल्पबद्ध दावेदारी की वजह से ही संघ गिरोह का वह प्रयास नाकाम हो सका था. आरएसएस ने कभी इस तथ्य के साथ समझौता नहीं किया है कि विभाजन के बाद भी भारत ने हमारे विशाल और विविधतापूर्ण देश के मूलभूत सिद्धांतों के रूप में धर्मनिरपेक्षता और बहुलतावाद को अपनाना उचित समझा. आरएसएस इस तथ्य को कभी पचा नहीं पाया कि विभाजन की जबर्दस्त खींच-तान के बावजूद दसियों लाख मुसलमानों ने द्विराष्ट्र सिद्धांत को कभी भी स्वीकार नहीं किया और नफरत, पूर्वाग्रह, अविश्वास और हिंसा के वातावरण को धता बताकर भारत में ही बसे रहे. नागरिकता संशोधन विधेयक, 2016 देश को विभाजन की साम्प्रदायिक आग में फिर से झोंकने का एक और प्रयास है.

यह विधेयक खास तौर पर असम और त्रिपुरा राज्यों के लिये एक बड़े खतरनाक धक्के के रूप में सामने आया है. यह विधेयक कार्यतः असम समझौते को खारिज कर देता है, जिस समझौते के अनुसार तय किया गया था कि जो लोग 24 मार्च 1971 की कट-ऑफ डेट के बाद असम में आये हैं उनकी शिनाख्त की जायेगी और उन्हें वापस उनके देश भेज दिया जायेगा. अब अगर यह नागरिकता संशोधन विधेयक कानून में तब्दील हो जाता है, तो वह असम में जनसंख्या के नाजुक संतुलन को बिगाड़ने वाला एक और जबर्दस्त आघात होगा. पड़ोस के राज्य त्रिपुरा की मूल जनजाति, जिन्हें उनके अपने ही राज्य में बाहर से आकर बसे लोगों ने इसी बीच अल्पसंख्यक बना दिया है, उनके लिये स्वाभाविक रूप से यह और अधिक चिंता का विषय है कि बाहर से आकर और बड़ी तादाद में लोग त्रिपुरा में बस जायेंगे. त्रिपुरा के जनजातीय संगठनों ने सर्वप्रथम इस खतरे को ताड़ लिया था और फरवरी 2017 में ही त्रिपुरा बंद का आह्नान किया था. और अब उत्तर पूर्व के अन्य राज्यों ने भी इस आशंका की तपिश को महसूस कर लिया है.

सरकार इस विधेयक को जायज ठहराने के लिये पड़ोसी देशों में अत्याचार का सामना कर रहे लोगों को भारत में शरण देने का बहाना कर रही है. ठीक है, लेकिन मौजूदा हालात में तो हमारे पड़ोस में सबसे ज्यादा अत्याचार का सामना तो रोहिंग्या समुदाय कर रहे हैं, और कोई म्यांमार में जनसंहार अभियान चलाकर कोई चालीस हजार रोहिंग्या लोगों को खदेड़कर भगा दिया गया है, जिन्होंने भारत में शरण ली है. लेकिन मोदी सरकार और संघ ब्रिगेड उन्हें पकड़-पकड़कर वापस भेजने को आमादा हैं. आरएसएस स्वामी विवेकानंद और शिकागो में दिये गये उनके ऐतिहासिक भाषण का हवाला देते नहीं थकते. क्या वहां विवेकानंद ने नहीं कहा था कि “मुझे ऐसे राष्ट्र का निवासी होने का गर्व है जिसने धरती के तमाम धर्मों के और तमाम राष्ट्रों के सताये गये और विस्थापित किये गये शरणार्थियों को अपने यहां शरण दी है”? लेकिन भारत सरकार आज इन सताये गए भिन्न-भिन्न धर्मों के लोगों के प्रति जो भेदभावपूर्ण रवैया अख्तियार कर रही है, वह विवेकानंद द्वारा सूत्रबद्ध किये गये मानववाद की भावना से निर्देशित नहीं है बल्कि संकीर्णतावाद और इस्लाम-भीति द्वारा निर्देशित है, जिसका आदेश उन्हें अमरीका और इजरायल के प्रति बढ़ती रणनीतिक ताबेदारी के चलते मिला है.

सच है कि नागरिकता संशोधन विधेयक भारत को इजरायल के नक्शे-कदम पर पुनर्निर्मित करने की ओर संचालित है. ठीक जैसे औपनिवेशिक और यहूदीवादी (जिओनिस्ट) परियोजनाओं ने “यहूदियों की वैश्विक पितृभूमि” के रूप में इजरायल की स्थापना की थी, वैसे ही हिंदू वर्चस्ववादी भारत को “हिन्दुओं के स्वाभाविक स्वदेश” के बतौर पेश करना चाहते हैं. इजरायल और फिलस्तीन में रहने वाले अरब लोगों के प्रति इजरायली सरकार का बरताव (उनको चरम नस्ली जनसंहार का शिकार बनाना) वह मॉडल है जिसको संघ परिवार अपनी हिंदू राष्ट्र की स्वप्नदृष्टि के तहत भारत में रहने वाले अल्पसंख्यकों के प्रति अपनाना चाहता है. उन्हें कौन बतायेगा कि नेपाल नामक एक और देश ऐसा है जहां भारत की तुलना में जनसंख्या में हिंदुओं का अनुपात कहीं ज्यादा है, और हिंदुओं के लिये इस किस्म का कोई एक स्वाभाविक स्वदेश नहीं है? और यह कि किसी लोकतांत्रिक गणराज्य में, जिसके नागरिक ऐतिहासिक रूप से बहुतेरे धर्मों का पालन करते रहे हैं, कोई भी एक समुदाय उस देश पर अन्य समुदायों से बड़ा और ज्यादा “स्वाभाविक” दावा पेश नहीं कर सकता?

यह विधेयक प्रस्ताव करता है कि अगर यह पाया गया कि कोई विदेश में बसा भारतीय नागरिकता (ओवरसीज सिटीजन ऑफ इंडिया या ओसीआई) कार्ड वाला किसी भारतीय कानून का उल्लंघन कर रहा है तो उसका पंजीकरण रद्द कर दिया जायेगा. यह तो बिल्कुल गोलमोल और ऐसा व्यापक प्रावधान है जिसका इस्तेमाल छोटे-मोटे उल्लंघनों के मामले में भी किया जा सकता है. इस प्रावधान से सत्ताधारी सरकार को यह अधिकार मिल जायेगा कि वह भारत की कानूनी किताबों में मौजूद ढेर सारे अत्याचारी कानूनों में से किसी भी कानून का इस्तेमाल करके विदेशों में बसे भारतीय नागरिकों में से जो लोग असहमति जाहिर करें उनका चुन-चुनकर पंजीकरण रद्द कर दे, जबकि भारत के बैंकों की आर्थिक लूट करने वाले लोगों को – मसलन ललित मोदी, विजय माल्या और नीरव मोदी – बिना किसी दंड भय के न्याय से बच निकलने और विदेश भाग जाने का अवसर दे दे.

कुल मिलाकर, नागरिकता संशोधन विधेयक 2016 हमारे संवैधानिक गणराज्य के बुनियादी चरित्र में तोड़फोड़ करने का एक घिनौना प्रयास है, जिसको अवश्य की खारिज करना होगा.

– दीपंकर भट्टाचार्य

[यह लेख मूल रूप से 16 जून 2018 के नेशनल हेराल्ड में प्रकाशित हुआ था]

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