असहमति बना अपराध: मोदी सरकार का लोकतंत्र पर ताजातरीन हमला

भीमा-कोरेगांव आंदोलन से सम्बंधित झूठ-मूठ के गढ़े गये आरोपों के आधार पर पांच नेतृत्वकारी कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी और प्रधानमंत्री की तथाकथित हत्या की योजना मोदी सरकार द्वारा अपने खिलाफ सवाल उठाने वाली असहमति की आवाजों को अपराध कहकर चुप करा देने का ताजातरीन प्रयास है.

गिरफ्तार किये गये ये पांच व्यक्ति हैं: लेखक और दलित अधिकार कार्यकर्ता सुधीर ढावले, नागपुर के एक जाने-माने अधिवक्ता सुरेन्द्र गाडलिंग, सामाजिक कार्यकर्ता और विस्थापन के मुद्दों पर शोधकर्ता महेश रावत, नागपुर विश्वविद्यालय में अंग्रेजी साहित्य विभाग की अध्यक्ष शोमा सेन और राजनीतिक बन्दी अधिकार कार्यकर्ता रोना विल्सन.

शुरू से कहा जाय तो पुणे की पुलिस ने दावा किया कि ये पांचों गिरफ्तार कार्यकर्ता इस साल की शुरूआत में भीमा-कोरेगांव में मनाये गये समारोह और उससे सम्बंधित हिंसा की योजना के रचयिता थे. इस आरोप में सैकड़ों छिद्र हैं. सर्वप्रथम, भीमा-कोरेगांव का समारोह पूर्णतया संवैधानिक और कानूनी था: यह एक सार्वजनिक समारोह थी जिसे सार्वजनिक रूप से घोषित कमेटी द्वारा संगठित किया गया था. इसके खिलाफ हिंसा को आरएसएस के पूर्व सदस्य संभाजी भिडे एवं भाजपा और शिव सेना के नेता रह चुके मिलिन्द एकबोटे के नेतृत्व में अंजाम दिया गया था, और इस हिंसात्मक कृत्य को पुलिस का समर्थन हासिल था.

गिरफ्तारियों के बाद पुणे की पुलिस ने दावा किया है कि इन गिरफ्तार कार्यकर्ताओं में से एक के लैपटॉप में उनको एक चिठ्ठी मिली है जिसमें “राजीव गांधी हत्याकांड की स्टाइल में हत्या की योजना”  की तर्ज पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की हत्या के एक प्लॉट की रूपरेखा बताई गई है, और उसमें दलित आंदोलन के जाने माने नेताओं, जैसे प्रकाश अम्बेडकर और जिग्नेश मेवानी, के साथ-साथ जेएनयू के कार्यकर्ता उमर खालिद के नामों का भी उल्लेख है. पुलिस ने इस चिठ्ठी का इस्तेमाल उपरोक्त कार्यकर्ताओं के खिलाफ निरंकुश अत्याचारी यूएपीए कानून लगाने में किया है. कई विशेषज्ञों ने इसी बीच इस चिठ्ठी की प्रामाणिकता के प्रति संदेह प्रकट किया है, जिसे पुलिस ने मीडिया को भी जारी कर दिया है. कई फोरेन्सिक (अपराध सम्बंधी वैज्ञानिक जांच) विशेषज्ञों और वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों ने टिप्पणी की है कि माओवादी कभी भी अपने असली नाम का इस्तेमाल करते हुए चिठ्ठी नहीं लिखते, और न ही वे कभी शस्त्रें की विशेषताएं अथवा अन्य कोई विस्तारित बात लिखते हैं. इस चिठ्ठी में घटिया किस्म से गढ़े जाने के पूरे निशानात मौजूद हैं कि इस चिठ्ठी का एकमात्र उद्देश्य विभिन्न आंदोलनों एवं उनके कार्यकर्ताओं पर कीचड़ उछालना है. किसी अदालत में होने वाले मुकदमे में इस चिठ्ठी का कोई महत्व नहीं होगा – मगर फिर भी इसका इस्तेमाल मीडिया की अदालत में आंदोलनों एवं कार्यकर्ताओं के बारे में संदेह पैदा करने के लिये तो किया ही जा रहा है.

वित्तमंत्री अरुण जेटली ने इन पांच कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी के बाद ट्वीट किया है कि “अर्ध-माओवादी भारतीय लोकतंत्र के सामने गंभीर खतरा हैं.” भाजपा और संघ एवं उनके पालतू मीडिया घराने, उन तमाम कार्यकर्ताओं एवं आंदोलननों के प्रति, जो भारत के संविधान की रक्षा कर रहे हैं, दबे-कुचले और शोषित तबकों के अधिकारों को बुलंद करते हैं, और मोदी सरकार के खिलाफ सवाल उठा रहे हैं, उनके प्रति संदेह पैदा करने और उन पर कीचड़ उछालने के लिये “शहरी नक्सल” और “अर्ध-माओवादी” जैसी गोलमोल शब्दावली का इस्तेमाल करते हैं. जैसा कि कई टिप्पणीकारों ने मंतव्य किया है, वास्तव में एक “पूर्णतया फासीवादी” सरकार ही कार्यकर्ताओं पर “अर्ध-माओवादी” का ठप्पा लगाने की कोशिश कर रही है.

लम्बे अरसे से माओवाद के खिलाफ तथाकथित युद्ध दरअसल अपनी जमीन, जंगल और सम्मान के लिये लड़ रहे आदिवासी समुदायों के ऊपर आतंक ढाने का बहाना रहा है – और अब उनकी कोशिश है कि जनवादी अधिकारों पर किये जा रहे इस हमले के दायरे के अंदर शहरी कार्यकर्ताओं को भी कैसे लाया जाय.

यहां याद रखना होगा कि मोदी के खिलाफ तथाकथित हत्या की योजनाओं के झूठमूठ गढ़े गये दावों का काफी लम्बा ट्रैक रिकार्ड रहा है – जिसके समर्थन में कभी कोई तथ्य नहीं मिला, लेकिन उनका इस्तेमाल मोदी की छवि को निखारने और उनके प्रति सहानुभूति पैदा करने के लिये जरूर हुआ है. जब मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे तब इस किस्म की हत्या की योजनाओं के झूठे दावों की पुष्टि के लिये पुलिस द्वारा नकली मुठभेड़ों को भी अंजाम दिया गया था.

मगर लगता है कि इस बार सरकार और भाजपा द्वारा राजनीतिक पूंजी बटोरने के लिये तथाकथित हत्या की योजना को दुहने का प्रयास बेकार ही जा रहा है. भाजपा के अपने सहयोगी शिव सेना से लेकर एनसीपी के नेता शरद पवार तक, और गुजरात में पटेल आंदोलन के नेता हार्दिक पटेल तक, विभिन्न हस्तियों ने पुलिस की थ्योरी पर संदेह जाहिर किया है और यहां तक कि उसका यह कहकर मजाक भी उड़ाया है कि यह तो सामने आ रहे विधानसभा चुनावों और अगले साल के लोकसभा चुनाव नजदीक आने के समय एक असफल सरकार द्वारा थोड़ी-बहुत सहानुभूति बटोरने का आखिरी बचा, हताशा भरा दांव है.

भारत का वह हर इन्सान जिसे देश के लोकतंत्र से वास्ता है, उसे इन पांच कार्यकर्ताओं को अविलम्ब रिहा करने और उनके खिलाफ सारे आरोपों को वापस लेने की मांग पर उठ खड़ा होना होगा. हम जानते हैं कि अगर हम आज नहीं बोले, जब फासीवादी ‘दूसरों’ के लिये आ रहे हैं, तो कल, जब फासीवादी हमारे लिये आयेंगे तो हमारे पक्ष में बोलने वाला कोई बचा न होगा. भारत के लोग भाजपा की सरकारों का पर्दाफाश करना जारी रखेंगे, जो तमाम मोर्चों पर जनता के अधिकारों पर हमले कर रही हैं.

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