औरंगाबाद में सांप्रदायिक उन्माद: भाजपा-आरएसएस का कारनामा; जिला प्रशासन, एमपी-विधायक भी दोषी

[विगत 25-26 मार्च 2018 को औरंगाबाद के एक इलाके में रामनवमी के मौके पर सांप्रदायिक हुड़दंगियों ने मुस्लिम मुहल्ले में दंगा-फसाद किया था- भाकपा(माले) की एक टीम ने वहां जाकर पूरे घटना-क्रम की जांच-पड़ताल की थी. पेश है टीम की रिपोर्ट – सं.]

ग्रैंड ट्रंक रोड पर बसा औरंगाबाद भाजपा के लिए दंगा-फसाद का प्रयोगस्थल बनता जा रहा है. सांसद और औरंगाबाद के स्थानीय विधायक भाजपा के ही जीते हुए हैं. सामंतों का दबदबा हमेशा बनाए रखने के लिए एक जाति विशेष के सामंती तत्व हमेशा कुछ-न-कुछ उत्पात मचाते रहते हैं. अब तो भाजपा-आरएसएस का रंग चढ़ते ही उन सामंती ताकतों का तेवर कुछ अलग ही हो गया है. पिछले साल ही इन उन्मादियों द्वारा उत्पात मचाने की कोशिश की गई थी. सामंती ताकतों के इशारे पर ही औरंगाबाद में आयोजित शांतिपूर्ण प्रदर्शन एवं सभा पर पुलिस द्वारा लाठी-गोली चलाई गई थी और माले के राष्ट्रीय नेता पूर्व विधायक का. राजाराम सिंह की बर्बरतापूर्वक पिटाई की गई थी और उन्हें जेल में बंद कर दिया गया था.

भाजपा का मुख्य निशाना नवाडीह व मुस्लिमों की दुकान
औरंगाबाद मुख्य बाजार की सड़क से उत्तर नवाडीह मुस्लिमों का संपन्न मुहल्ला है. यहां ज्यादातर लोग व्यवसाय, नौकरी एवं स्किल वर्क से जुड़े हुए हैं. लिहाजा, मुहल्ला साफ-सुथरा, अच्छे मकानों वाला एवं सुसंस्कृत दिखा. आरएसएस एवं भाजपा के लिए यह मुहल्ला आंख की किरकिरी बना रहता है. जबसे भाजपा ने अपना पांव पसारा है तब से वे इसी फिराक में रहते हैं कि कैसे उस मुहल्ला के लोगों को तबाह कर दिया जाए. इस बार भाजपा के एमपी एवं विधायक अपने दंगा-फसाद मिशन में ज्यादा सक्रिय दिखे. मुख्य बाजार में पहले रामनवमी की पूजा होती थी. जुलूस मुख्य बाजार के रास्ते गांधी मैदान पहुंचती थी. 2017 में 25-30 लोगों ने नवाडीह मुहल्ला में जुलूस निकाला था और कुछ उत्पात मचाने की कोशिश की थी. लेकिन कम संख्या होने के कारण वे बलवाई कुछ नहीं कर सके.

पुलिस-प्रशासन की एकतरफा कार्रवाई: दंगाइयों को खुली छूट:
25 मार्च 2018 को सोची-समझी साजिश के तहत भाजपा-आरएसएस के लोगों ने मोटरसाइकिल जुलूस निकाला और संकरी गल्ली होने के बावजूद नवाडीह मुहल्ला की तरफ मोड़ दिया. इस बार संख्या काफी थी; लिहाजा, आरएसएस को मौका मिल गया. जुलूस भूषण साव की मिल के पास पहुंच कर रुक गई. चौक होने के नाते वहां मुस्लिम लोग आते हैं और चाय-नाश्ता करते हैं. जुलूस आ रही थी तो देखने के लिए मुस्लिम लोग भी वहां इकट्ठा थे. भूषण साव आरएसएस का सदस्य भी है. उसके घर की छत से पूरी योजना के तहत ईंट एवं बोतल फेंका गया. आरएसएस व भाजपा वाले हल्ला करने लगे कि मुस्लिम लड़कों द्वारा ईंट फेंकी गई. बस क्या था, माहौल गरम हो गया. जुलूस में शामिल लोग मानो इसी का इंतजार कर रहे थे. जुलूस में शामिल लोगों ने मुस्लिम मुहल्ला पर हमला बोल दिया. वे ईंट-पत्थर चलाने लगे. कोई सुनने वाला नहीं था. पूजा समिति के लोगों द्वारा भी शांति के लिए कोई प्रयास नहीं किए गया; बल्कि उन्होंने आग में घी डालने का ही काम किया गया. एमपी-विधायक भी वहां लोगों को उकसाने में ही लगे हुए थे. मुस्लिम मुहल्ला के कुछ लोगों ने आत्मरक्षार्थ कुछ ईंटें भी चलाईं. पुलिस वहां भारी संख्या में पहुंच गई. पुलिस पदाधिकारी एमपी एवं विधायक के निर्देशों का पालन करते रहे. केवल मुस्लिम मुहल्ला की तरफ से फेंके गए ईंट-पत्थर का ही वीडियो व फोटो खींचते रहे. लेकिन उत्पात मचाने वाले बलवाइयों को पूरी छूट दे दी गई.

वहां धारा 144 लगा दिया गया. मुस्लिम मुहल्ला में भारी संख्या में अर्द्ध सैनिक बल भर दिए गए. पुलिस पदाधिकारी ने घटना की समीक्षा और शांति के लिए थाना में कुछ लोगों को बुलाया. नवाडीह मुहल्ला से वार्ड पार्षद खुर्शीद अहमद को थाना बुलवाया और उन्हें थाना में रखा. शांति के लिए दबाव बनाने की बात की, लेकिन दूसरी ओर आरएसएस व दंगाइयों को पूरी तरह से छूट दे दी गई. पुलिस ने एकतरफा कार्रवाई करते हुए 25 मार्च की रात मुस्लिम मुहल्ला में घुसकर दरवाजों को तोड़कर धर-पकड़ शुरू कर दिया.

शमशुल हक साहब की दुकान (किराना) की किवाड़ पुलिस ने तोड़ दी, जबकि उक्त समय घर में कोई पुरुष नहीं थे, कोई नौजवान भी वहां मौजूद नहीं था. शमशुल हक के घर की महिलाएं दुकान चलाती हैं. सरताज के घर का भी दरवाजा तोड़ दिया गया और कुछ मुस्लिम नौजवानों को गिरफ्तार किया गया.

25 मार्च 2018 को हुए तनाव में पुलिस ने मुस्लिम मुहल्ला को सुरक्षा के दृष्टिकोण से घेरे रखा, लेकिन दूसरी तरफ कार्रवाई भी इसी मुहल्ला में किया. 25 मार्च को ही वार्ड पार्षद खुर्शीद समेत आधा दर्जन से ज्यादा मुस्लिम नौजवानों को गिरफ्तार कर लिया गया. ज्यादातर गिरफ्तार लोग मजदूर हैं. कई घरों में तो चूल्हा बंद है. लोग मुहल्ला में इकट्ठा कर भोजन कराते हैं.

पुलिस की एकतरफा कार्रवाई ने दंगाइयों का मनोबल बढ़ा दिया. इसका नतीजा हुआ कि 26 मार्च 2018 को धारा 144 की परवाह किए बगैर उनका तांडव शुरू हो गया. धारा 144 का अनुपालन कराने के लिए मुस्लिम मुहल्ले में पुलिस की भारी बंदोबस्ती की गई, जबकि बाजार बलवाइयों के हवाले कर दिया गया. इतना ही नहीं पुलिस की गोली से कोई दंगाई घायल नहीं हुआ; लेकिन एम्बुलेंस ड्राइवर मो. नईम को पुलिस ने इसलिए गोली मार दी, क्योंकि वे पुलिस की इस एकतरफा कार्रवाई का विरोध कर रहे थे.

आगजनी-लूटपाट करने की छूट:
दंगाइयों ने चुन-चुन कर मुस्लिम समुदाय की दुकानों को निशाना बनाया. कई दुकानें लूट ली गईं और कई दुकानों में आग भी लगा दी गई. 50 से ज्यादा दुकानें जला दी गईं. लेकिन पुलिस मुस्लिम मुहल्ला में सुरक्षा के नाम पर पीडि़त समुदाय के पास कैंप किए रही. यह सब घटनाएं 25 मार्च की शाम में धारा 144 लगे होने के बावजूद दूसरे दिन 26 मार्च को हुईं. 144 धारा लगने के बाद जो दहशत का माहौल बना वह केवल मुस्लिम समुदाय के लिए सरकारी आतंक का माहौल रहा. आरएसएस एवं बीजेपी के लोगों को उत्पात मचाने का संकेत पुलिस की कार्रवाई ने स्पष्ट रूप से दे दिया था. 26 मार्च की घटना के लिए पुलिस-प्रशासन की पक्षपातपूर्ण भूमिका ही जिम्मेवार है.

मुख्य बाजार में बलवाइयों-दंगाइयों को पूरी छूट मिल गई. वे तीन घंटे तक उत्पात मचाते रहे. तोड़-फोड़ व लूटपाट की गई तथा दुकानों और गैरेज में खड़े वाहनों को आग के हवाले कर दिया गया. एक समुदाय विशेष को अरबों रुपये का नुकसान का हुआ है. आरएसएस-बीजेपी वालों के इशारे पर दंगाइयों ने कब्रिस्तान को भी निशाना बनाया. हाल में दफन किए गए एक कब्र पर बलवाइयों ने भगवा झंडा गाड़ दिया. कब्र पर पेशाब किए गए. कब्रिस्तान में एक बकरी चर रह रही थी जिसे तलवार से कई टुकड़े कर दिए गए. मुसलमान के खिलाफ इतना जहर भरा गया था कि कम उम्र के लड़के भी उनके खिलाफ पाकिस्तानी होने के उत्तेजक नारे लगा रहे थे. कब्रिस्तान में सैकड़ों लोग घुसकर अगल-बगल वाले मकानों पर ईंट-पत्थर की वर्षा कर रहे थे. शीशे की खिड़कियां टूट गईं.

जिला प्रशासन एवं पुलिस की भूमिका:
25 मार्च 2018 को बलवाइयों के खिलाफ पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की. उस दिन केवल मुस्लिम समुदाय के नौजवानों एवं वार्ड पार्षदों की गिरफ्तारी की गई. एक बुजुर्ग जन्नत हुसैन अपने तीन बेटों के गिरफ्तार किए जाने पर थाना गए और पुलिस पदाधिकारी के सामने उनकी रिहाई की मिन्नतें कीं, लेकिन उनकी एक नहीं सुनी गई. जन्नत हुसैन की उम्र ज्यादा होने के कारण उन्हें छोड़ दिया गया था. अब जन्नत मियां के घर में भोजन जुटाने वाला कोई नहीं रह गया है. जन्नत हुसैन ने पुलिस के व्यवहार के बारे में रोते हुए बताया कि पुलिस ने उनसे कहा कि ‘जय बजरंग बली बोलने में क्या हो जाएगा, आप लोग क्यों नहीं बोलते हो.’ उन्होंने कहा कि वे ऐसा कत्तई नहीं बोलेंगे.

26 मार्च 2018 की घटना के बाद पुलिस ने दूसरे पक्ष के कुछेक लोगों की गिरफ्तारी की. लेकिन मुख्य आरोपी और उन्माद पैदा करने वालों को पकड़ने के बजाय उन्हें बचाया जा रहा है. सांसद और विधायक की प्रत्यक्ष भूमिका होने के बावजूद पुलिस उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं कर रही है. उल्टे, इसकी शिकायत करने वालों को ही पुलिस द्वारा मारा-पीटा जाता है.

समाज में अल्पसंख्यकों के खिलाफ नफरत फैलाने में पुलिस की वही भूमिका देखी जा रही है जो भूमिका आरएसएस व हिंदू संगठनों द्वारा अपनाई जाती है. पुलिस का कहर भी पीडि़त अल्पसंख्यकों पर ही टूटता है. अलबत्ता, कोरम पूरा करने के नाम पर पुलिस ने दूसरे पक्ष के कई निर्दोष छात्रों एवं नौजवानों को गिरफ्तार कर लिया.

जिला प्रशासन पर सबसे बड़ा सवाल यह है कि उसने 26 मार्च को हिंदुत्ववादी लोगों को जुलूस निकालने की इजाजत कैसे दे दी? 25 मार्च की उन्मादपूर्ण घटनाओं के बाद जब धारा 144 लगा दी गई थी और पूरे शहर को एलर्ट कर दिया गया था, तब फिर 26 मार्च को जुलूस निकालने की इजाजत क्यों दी गई ? स्पष्टतः, जिला प्रशासन विधायक एवं सांसद के दबाव में आ गया. इतना ही नहीं, स्थानीय विधायक एवं सांसद के दबाव में प्रशासन ने दंगा में संलिप्त और खुलेआम गुंडागर्दी करने वाले अपराधियों के नाम प्राथमिकी में दर्ज भी नहीं किए, उन्हें गिरफ्तार करने की तो बात ही दूर है. पुलिस-प्रशासन की भूमिका बिल्कुल एकतरफा रही है और दंगा भड़काने में उसका भी हाथ रहा है. जिला प्रशासन ने जान-बूझकर नवाडीह मुहल्ला में जुलूस निकालने की इजाजत दे दी; जबकि हर वर्ष मुख्य मार्ग से होते हुए गांधी मैदान में जुटान होता था.

जांच टीम: भाकपा (माले) की एक राज्यस्तरीय जांच टीम ने 6 अप्रैल 2018 की सुबह प्रभावित इलाके का दौरा किया. जांच टीम में भाकपा(माले) के अरवल जिला सचिव का. महानंद, राज्य कमेटी सदस्य का. रामबली यादव व जितेंद्र यादव, इंसाफ मंच के राज्यस्तरीय नेता व वरिष्ठ वकील का. सुहैल अख्तर, शाह साद, औरंगाबाद के जिला सचिव जनार्दन प्र. सिंह, योगेंद्र पासवान, चंद्रमा सिंह और बिरजू कुमार शामिल थे.

जब नवाडीह मुस्लिम मुहल्ला में जांच टीम पहुंची तो मुहल्ले में पूरा सन्नाटा था. सभी घरों के दरवाजे बंद थे. इक्के-दुक्के लोग आ जा रहे थे, लेकिन वे रुकने को तैयार नहीं थे. कुछ लोगों से बात हुई तो वे इतना सहमे हुए थे कि कुछ बताने को तैयार नहीं थे. ऐसा लगा कि मुहल्ला से बिना कुछ जाने-समझे लौटना पड़ेगा. हमलोग कोशिश करते रहे. सरताज के घर के पास गए, दरवाजा खुलवाया तो घर से महिला एवं एक लड़की आईं. कोई पुरुष नहीं थे. कुछ नौजवान एक गली में खड़े होकर आपस में बात कर रहे थे. उन लोगों को भाकपा(माले) की जांच टीम के बारे में बताया गया. दो-चार लोग और आ गए, उन्हें यकीन हुआ कि हमलोग कोई जासूस अथवा उत्पाती लोग नहीं हैं.

उन्होंने कुर्सी, पानी एवं बिस्कुट-चाय का इंतजाम किया और फिर घर-घर जाकर लोगों से मिलवाया भी. इफ्तखार खां ने बताया कि आप लोगों से कोई इसलिए नहीं बात कर रहा था कि नेता लोग हैं, कहीं मामला और गडबड़ न हो जाए. उन्होंने बताया कि आप लोगों के पूछने के अंदाज से ही पता चल गया कि आप वोट वाली पार्टी नहीं हैं.

जांच टीम को नवाडीह के पीडि़त लोगों ने बताया कि सबसे पहले यहां पहुंचने वालों में आप लोग ही हैं. नवाडीह के लोगों को बताया गया कि 23-30 मार्च तक पार्टी के राष्ट्रीय महाधिवेशन में सभी नेतृत्वकारी लोग पंजाब गए हुए थे. वहां से लौटते ही हम आप लोगों के बीच आए. नवाडीह के लोगों को बाद में समझ आया कि ये लोग ‘माले’ वाले हैं और हमारे अपने ही हैं.

जांच टीम ने शाम में पत्रकारों के बीच विस्तार से पूरी घटना की चर्चा की और इस पूरे घटना-क्रम के लिए सांसद-विधायक एवं जिला प्रशासन को जिम्मेवार ठहराया. साथ ही, निर्दोष लोगों को बिना शर्त रिहा करने, डीएम-एसपी पर कार्रवाई करने, दोषी एमपी-विधायक एवं अन्य उत्पाती लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कर उन्हें गिरफ्तार करने की मांग की.

और पढ़ें

ऊपर जायें
%d bloggers like this: