तेभागा-तेलंगाना से नक्सलबाड़ी-भाकपा(माले) तक आंदोलन-पार्टी द्वंद्वात्मकता में एक अध्ययन

[ईपीडब्लू, अंक-52, संख्या-21, 27 मई 2017 में प्रकाशित अरिंदम सेन के लेख का थोड़ा संशोधित रूप]

नक्सलबाड़ी आंदोलन में शामिल तमाम लोगों की साझी अनुभूति को अभिव्यक्त करते हुए चारू मजुमदार ने भाकपा(माले) के गठन के कुछ महीने बाद लिखा:

“हमें याद रखना होगा, भारत की क्रांतिकारी जनता ने कम्युनिस्ट आंदोलन में बार-बार संघर्ष किया है, असीम आत्म-त्याग किया है, जीवन दान दिया है. पुन्नापरा-वायलार के वीर शहीदों ने, तेलंगाना के वीर योद्धाओं ने, भारत के हर राज्य के मजदूर-किसान योद्धाओं ने अनेक कुर्बानियों के जरिए जिस परंपरा को स्थापित किया है, उस परंपरा को हमें ही आगे ले जाना होगा, हम उन्हीं के उत्तराधिकारी हैं. जिस कम्युनिस्ट पार्टी के नाम से कय्यूर के वीर फांसी पर चढ़ गए, उसी कम्युनिस्ट पार्टी के हम प्रतिनिधि हैं. वही कम्युनिस्ट पार्टी आज भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) है.” 1

संशोधनवाद से आमूलचूल (रैडिकल) विच्छेद और शानदार क्रांतिकारी परंपराओं की निरंतरता – भारत के कम्युनिस्ट आंदोलन के संपूर्ण दौर के संदर्भ में ऐसी ही थी भाकपा(माले) की आत्म-अनुभूति- इसकी समझ थी कि तेभागा और तेलंगाना, इन दोनों आंदोलनों में मौजूद महती संभावनाओं को तलाशे बगैर उस दौर के पार्टी के नेतृत्व उनका परित्याग कर दिया, बल्कि कहिए कि उन्हें नष्ट कर दिया, जिसकी कतारों ने काफी ज्यादा जमीनी काम किया था. नक्सलबाड़ी के मामले में भी सीपीआई(एम) के नेतृत्व द्वारा ऐसा ही प्रयास किया गया, लेकिन इस बार वह (नेतृत्व) नाकाम हो गया, क्योंकि क्रांतिकारियों ने उसके फरमान के सामने घुटने नहीं टेके और उन्होंने, भारत में पहली बार, पहले एक पृथक राजनीतिक ग्रुप और फिर एक पार्टी बनाकर बोल्शेविक रास्ता अपना लिया.

खास तौर पर, नक्सलबाड़ी को महान तेलंगाना के – नक्सलबाड़ी के पहले की अवधि में भारतीय क्रांति के सर्वोच्च शिखर के – मशाल वाहक के बतौर देखा गया. निश्चय ही, इन दोनों ऐतिहासिक मील-पत्थरों में काफी चीजें एक समान थीं: कम्युनिस्टों का नेतृत्व: रीढ़-शक्ति के रूप में किसान-खासकर, भूमिहीन व गरीब किसान; “चीन का रास्ता” की संपुष्टि; और ऊपर से किसी ठोस योजना के बगैर जिला पार्टी नेताओं द्वारा दोनों की शुरुआत.

इन तमाम समानताओं के बावजूद एक महत्वपूर्ण फर्क था, और वह फर्क निर्णायक साबित हुआ. नक्सलबाड़ी के पहले “आठ दस्तावेज” आए और नक्सलबाड़ी के बाद एआइसीसीसीआर तथा भाकपा(माले) सामने आए; तेलंगाना (या तेभागा) में ऐसा कुछ नहीं हुआ था. तेलंगाना अपने-आप में एक प्रचंड दावानल था जिसने नक्सलबाड़ी उभार की तुलना में बहुत-बड़े भूभाग को अपनी चपेट में लिया था, उसमें जनता का जुझारूपन काफी ऊंचे स्तर तक पहुंच गया था और वह वृहत्तर समयावधि तक टिका भी रहा था; किंतु, धक्का और सशस्त्र संघर्ष की वापसी के बाद उसने कोई तात्कालिक पदचिन्ह नहीं छोड़ा, क्योंकि दर-हकीकत इसे संभालने लायक राष्ट्रीय स्तर पर कोई क्रांतिकारी संगठन नहीं था, न ही बनाया जा सका. यह सच है कि भाकपा के आंध्र सचिव मंडल ने जिला-स्तरीय कार्यकर्ताओं द्वारा छेड़े गए इस उभार को फौरन अपने नेतृत्व में ले लिया और उसने सही क्रांतिकारी लाइन स्थापित करने के लिए मजबूती से अंतः पार्टी संघर्ष भी चलाया. लेकिन यह संघर्ष उसी पार्टी के अंदर सफल नहीं हो सकता था, क्योंकि उसकी केंद्रीय कमेटी में दक्षिणपंथी अवसरवादी व मध्यमार्गवादी तत्वों तथा क्रांतिकारी तत्वों के बीच का शक्ति संतुलन उसके अनुकूल नहीं था – केंद्रीय कमेटी में पहले किस्म के लोग ही हावी थे. दूसरी ओर तेलंगाना की रैडिकल ताकतें एक पृथक पार्टी या क्रांतिकारी धड़े के बतौर खुद को संगठित करने के लिए तैयार नहीं थे. इसीलिए, काफी लंबे और अनिर्णायक विचारधारात्मक संघर्ष के बाद इस मध्यमार्गवादियों ने दक्षिणपंथी अवसरवादियों के समर्थन से 1951 में केंद्रीय कमेटी पर वास्तविक नियंत्रण कायम कर लिया, कृषि क्रांति के रास्ते को हमेशा के लिए छोड़ दिया, तथा कदम-ब-कदम पार्टी को गैर-क्रांतिकारी संसदीय रास्ते पर धकेलना शुरू कर दिया.

इसके विपरीत, नक्सलबाड़ी भारत में कम्युनिस्ट आंदोलन के सबक और भारतीय समाज राज्य व क्रांति के चरित्र के साथ-साथ मौजूदा राजनीतिक परिस्थिति के सटीक मूल्यांकन के आलोचनात्मक संयोजीकरण (एसिमिलेशन) पर आधारित एक नई मार्क्सवादी-लेनिनवादी पार्टी बनाने की सचेत प्रक्रिया का नतीजा भी था और उत्प्रेरक भी. इसी रास्ते पर चलकर क्रांतिकारी कम्युनिस्टों ने उस प्रक्रिया को अंतिम मुकाम तक पहुंचाया जो 1964 के विभाजन से शुरू हुई थी; इसी चीज ने सुनिश्चित किया कि नक्सलबाड़ी की छोटी चिंगारी (वस्तुतः वह चिंगारी ही थी, क्योंकि उस खास इलाके के उभार को करीब तीन महीने में ही कुचल दिया गया था) दावानल बनकर भारत के अनेक हिस्सों में फैल गई.

आधारभूत आठ दस्तावेज
जब 1964 में भाकपा विभाजित हुई तो सीएम माकपा में शामिल हो गए – लेकिन उनका मकसद उनके शब्दों में “आधुनिक संशोधनवाद” और “मध्यमार्गवाद” के खिलाफ अंतः-पार्टी संघर्ष का एक नया दौर शुरू करना ही था. उन्होंने यह काम दस्तावेजों की एक श्रृंखला के जरिए संपन्न किया जो अंतः-पार्टी वितरण के लिए था. समग्र रूप से यह श्रृंखला “आठ दस्तावेज” के नाम से चर्चित हुई, जो जनवरी 1965 से अप्रैल 1967 के बीच लिखे गए थे.

इन दस्तावेजों में सीएम ने (अनेक महत्वपूर्ण विचारधारात्मक/सैद्धांतिक मुद्दों के साथ-साथ) जो बुनियादी राजनीतिक बात यह उठाई कि तमाम किस्म के मुद्दों पर स्वतःस्फूर्त जन आंदोलन की अंतहीन लहरों और देश के सभी हिस्से में बढ़ते जुझारूपन ने क्रूर राज्य दमन के सम्मुख भी यह रेखांकित कर दिया कि स्वतंत्र भारत में शासकों और शासितों के बीच पहला आम टकराव शुरू हो गया है. शासित जन अब पहले की तरह अब और अधिक समय तक नहीं रहना चाहता है, जबकि शासक समूह खाद्य संकट और अन्य ज्वलंत समस्याओं को सुलझाने में नाकाम होकर अब पुराने तरीके से कांग्रेस पार्टी के जरिए और अधिक शासन करने में असमर्थ हो गया है. वियतनाम, क्यूबा, चीन आदि देशों में उत्साहजनक घटनाक्रमों के साथ अंतरराष्ट्रीय परिस्थिति भी काफी अनुकूल हो गई है. अत्यंत उथल-पुथल भरा राजनैतिक माहौल संघर्ष के उच्चतर रूपों की, कम्युनिस्टों की और अधिक सचेत अगुवा भूमिका की तथा एक सच्ची क्रांतिकारी पार्टी की शक्ल में तदनुकूल संगठनात्मक गतिरोध-भंग की मांग कर रहा है – उन्होंने जोर दिया.

एक क्रांतिकारी पार्टी के निर्माण को इन दस्तावेजों में केंद्रीय कार्यभार के बतौर निर्धारित किया गया था. पहले के चंद दस्तावेजों के तेवर से लगता है कि उनमें तत्कालीन संगठन (माकपा) को ही क्रांतिकारी दिशा में रूपांतरित करने की चर्चा की गई हो. चूंकि पार्टी की कतारें और सामाजिक आधार अपने अनुभवों से ही सीखते हैं, लिहाजा वह तेवर धीरे-धीरे तीखा होता गया और छठे दस्तावेज (“संशोधनवाद के खिलाफ समझौताहीन संघर्ष चलाकर सच्ची क्रांतिकारी पार्टी का निर्माण ही आज का केंद्रीय कार्यभार है”, अगस्त 1966) और उसके आगे पार्टी नेतृत्व पर सीधा-सीधी हमला शुरू हो जाता है. इस रणनीति के चलते और दार्जीलिंग क्रांतिकारियों की अत्यधिक लोकप्रियता की वजह से, राज्य नेतृत्व उनके खिलाफ तत्काल कोई अनुशासनात्मक कदम नहीं उठा सका. और जब उन्होंने ऐसा किया, पानी सर से गुजर चुका था.

कृषि-क्रांति की अपनी रूप रेखा की व्याख्या करते हुए सीएम ने एक जीवंत मॉडल – “एक इलाके में एक चिंगारी” – निर्मित करने की जरूरत पर बल दिया, जो “भारत के विभिन्न कोनों में दावानल भड़का दे”2 और उन्होंने इस जमीनी काम में अपने कामरेडों का मार्गदर्शन भी किया. नक्सलबाड़ी सिद्धांत और व्यवहार के इसी अनुकरणीय एकीकरण का परिणाम था.

वसंत का वज्रनाद और एआइसीसीसीआर-भाकपा(माले)
मार्च 1967 की शुरुआत में इस ऐतिहासिक विद्रोह की वास्तविक उलटी गिनती शुरू हुई- 7 मार्च को – संयुक्त मोर्चा सरकार बनने के ठीक पांच दिन बाद, किसान और मजदूर कार्यकर्ताओं की एक संयुक्त बैठक को संबोधित करते हुए सीएम ने कहा –

“किसानों को चुपचाप देखकर हम सोच रहे हैं कि वे पानी की तरह ठंढे हैं. लेकिन उनकी छाती में हजारों साल से आग की भयंकर लपटें मौजूद हैं, उसे हम नहीं देख रहे हैं. वे पानी नहीं किरासन हैं – इसीलिए दियासलाई की एक काठी जलाओ, वह फौरन धधक उठेगी…”

उनका संदेश बिलकुल स्पष्ट था: परिस्थिति परिपक्व है, कृषि क्रांति शुरू करने का वक्त आखिरकार पहुंच चुका है-

इसे कैसे किया जाए, इसकी योजना बनाने के मद्देनजर खड़ीबाड़ी में रामबोला गांव के निकट एक खुले मैदान में 18-19 मार्च को “तराई किसान सभा” (बंगीय प्रादेशिक किसान सभा की एक इकाई) का एक कन्वेंशन आयोजित किया गया. इसके अत्यंत जीवंत विचार-विमर्श में कुछेक हजार किसान सक्रिय रूप से शामिल हुए और उन्होंने सामंती प्रभुत्व व बुर्जुआ कानूनी दांवपेंच को धता बताते हुए रैडिकल (आमूलगामी) भूमि सुधार शुरू करने, और इसके जरिए स्थानीय स्तर पर भ्रूण रूप में जन सत्ता स्थापित करने का संकल्प लिया. कानू सान्याल ने अपनी “तराई क्षेत्र में किसान आंदोलन की रिपोर्ट” में लिखा:

“… सिलिगुड़ी सब-डिविजन (अनुमंडल) किसान कन्वेंशन ने (1) गांव के हर मामले में किसान समितियों का प्राधिकार स्थापित करने, (2) जोतदारों और ग्रामीण प्रतिक्रियावादियों के प्रतिरोध को कुचलने के लिए संगठित व हथियारबंद हो जाने तथा (3) जमीन पर जोतदारों को इजारेदारीपूर्ण स्वामित्व को खत्म करने तथा किसान समितियों के जरिए नए सिरे से जमीन बांटने का आह्नान जारी किया.

मार्च के अंत से लेकर अप्रैल अंत तक की अवधि में लगभग सभी गांव संगठित हो गए इसके पहले, जहां किसान सभा की सदस्यता 5000 से ज्यादा नहीं हो पाती थी, वहीं इस बीच यह सदस्यता करीब 40,000 हो गई…. तूफान की गति से, इस डेढ़ महीने में, क्रांतिकारी किसानों ने सैकड़ों ग्रुप बैठकों के जरिए किसान समितियां बना लीं और इन समितियों को हथियारबंद गांव प्रतिरक्षा ग्रुपों में रूपांतरित कर दिया. एक शब्द में कहें तो उन्होंने 90 प्रतिशत ग्रामीण आबादी को संगठित कर लिया.

महान लेनिन ने कहा था, ‘क्रांति जन समुदाय का त्यौहार होती है’. इसके वास्तविक अर्थ को हमलोगों ने तराई किसानों के संघर्ष के दौरान साकार होते देखा….3

यह संघर्ष शनैः-शनैः मजबूत होता गया, हालांकि माकपा नेतृत्व ने अपने ‘दुस्साहसवादी’ कामरेडों को हथियार छोड़ देने के लिए समझाने की हरचंद कोशिश भी की. लेकिन ये लोग अविराम गति से चलते रहे और 24 मई को एक झड़प में आदिवासी किसानों के द्वारा चलाए गए तीरों से एक पुलिस इंस्पेक्टर मारा गया तथा दो अन्य अधिकारी घायल हो गए. पश्चिम बंगाल की संयुक्त मोर्चा सरकार – जिसमें माकपा सबसे बड़ा घटक दल था और, ज्योति बसु जिसमें उप-मुख्य मंत्री व गृह मंत्री थे – ने अगले ही दिन इसका बदला लिया. हथियारबंद अर्धसैनिक बलों ने समूचे इलाके को घेर लिया, महिलाओं के शांतिपूर्ण प्रतिवाद मार्च पर गोलियां चलाईं और आठ महिलाओं, एक पुरुष व अपनी मां की पीठों पर बंधे दो शिशुओं को मार दिया. और अब, पार्टी नेतृत्व ने इन क्रांतिकारियों को पार्टी से निकालने में कोई देर नहीं की.

नक्सलबाड़ी उभार के बर्बर दमन – और वह भी एक ‘वामपंथी’ सरकार द्वारा – तथा किसान योद्धाओं व कम्युनिस्ट क्रांतिकारियों द्वारा खड़े किए गए साहसिक प्रतिरोध ने माकपा के अंदर व्यापक विरोध को जन्म दिया. नक्सलबाड़ी के साथ एकजुटता व्यक्त करते हुए हर स्तर पर क्रांतिकारी तबकों ने हाथ मिला लिया और स्थानीय/आंचलिक स्तरों पर विरोधी ग्रुप बना लिए. इन ग्रुपों ने अपने बीच नेटवर्क बनाना शुरू किया और मई 1968 में ‘कम्युनिस्ट क्रांतिकारियों की अखिल भारतीय समन्वय समिति’ (एआइसीसीसीआर) का गठन किया गया. इसने विचारधारात्मक राजनीतिक समझदारी विकसित करने और विभिन्न राज्यों में इसके घटक ग्रुपों को सफलतापूर्ण मार्ग निर्देशन के लिए एक उपयुक्त मंच मुहैया करा दिया. विचारधारा और राजनीति की नींव डालने तथा दो वर्षों के क्रांतिकारी व्यवहार का अनुभव हासिल करने के बाद 22 अप्रैल 1969 को भाकपा(माले) का निर्माण किया गया. गौरतलब है कि भारतीय परिस्थिति में माओ त्सेतुंग विचारधारा को लागू करने की अपनी समूची तत्परता और उत्साह के बावजूद इस नई पार्टी ने अपने को मार्क्सवादी-लेनिनवादी कहा (माओवादी नहीं), ताकि वह नव (सोवियत) संशोधनवाद के खिलाफ संघर्ष के दौरान विभिन्न देशों में उभर रही मार्क्सवादी-लेनिनवादी धारा के एक अभिन्न अंग के बतौर अपनी पहचान बुलंद कर सके. मई 1970 में कोलकाता में गुप्त तरीके से पहला पार्टी महाधिवेशन (कांग्रेस) आयोजित किया गया. इसमें 21-सदस्यीय केंद्रीय कमेटी का विधिवत चुनाव किया गया, और सीएम इसके महासचिव बनाए गए.

विद्रोह
भाकपा(माले) के गठन ने पार्टी कतारों और मेहनतकश जनता को काफी उत्प्रेरित किया. देश के चारों कोनों में – त्रिपुरा से लेकर केरल तक और पंजाब से लेकर तमिलनाडु तक – क्रांतिकारी किसान संघर्ष फूट पड़े; जबकि श्रीकाकुलम, देबरा-गोपीबल्लभपुर और बीरभूम जैसे इलाके कृषि क्रांति की अग्रिम चौकियों, और कुछ मामलों में तो गुरिल्ला युद्ध के अर्ध-मुक्त क्षेत्रें, के बतौर सुर्खियों में आ गए.

पुराने समाज की नींव पर जोरदार प्रहार करने वाले इस क्रांतिकारी सामंतवाद विरोधी संघर्ष के साथ संपूर्ण विचारधारात्मक-राजनीतिक अधिसंरचना कांपने लगी. चारू मजुमदार के आह्नान-“अंततः वह दिन आ गया है जब हमें सैकड़ों-हजारों शहीदों के खून के कर्ज का हिसाब-किताब बराबर कर लेना है और साम्राज्यवादियों तथा प्रतिक्रियावादी शोषक वर्गों को उखाड़ फेंकना हैय”- ने युवा भारत में तूफान भर दिया. शहरों और महानगरों में नए किस्म के सत्ता-प्रतिष्ठान विरोधी छात्र-युवा आंदोलन उभर पड़े तथा भारी तादाद में छात्रों ने बुर्जुआ शिक्षा प्रणाली के खिलाफ विद्रोह कर दिया. जब ये नौजवान अपने तरीके से – बल्कि, कुछ मामलों में दुस्साहसवादी तरीके से – क्रांति का उत्सव मना रहे थे, तब सीएम खुद उनसे मिले और उन्होंने उनके सामने “सिर्फ एक कार्यभार: मजदूरों व भूमिहीन-गरीब किसानों के पास जाओ और उनके साथ एकरूप हो जाओ, एकरूप हो जाओ और एकरूप हो जाओ”4 पेश किया.

सैकड़ों और हजारों की संख्या में छात्र, नौजवान, बुद्धिजीवी और सांस्कृतिक कार्यकर्ता इस आंदोलन में कूद पड़े, जिनमें महिलाएं भी अच्छी-खासी संख्या में शामिल थीं. उनमें से बहुतेरे लोगों ने शहरी जीवन की सुविधाओं को पीछे छोड़ दिया और वे किसानों, आदिवासियों, गिरिजनों व अन्य मेहनतकशों के सबसे उत्पीडि़त तबके के बीच रहने लगे. चूंकि पार्टी ने अपनी समस्त ऊर्जा और ध्यान ग्रामीण कार्य पर केंद्रित कर रखा था, इसीलिए अगुवा मजदूरों को उत्साहित किया गया कि वे ट्रेड यूनियन कार्य को आम मजदूरों के भरोसे छोड़ दें और वे खुद कृषि क्रांति को तेज करने के लिए गांवों के अपने वर्ग-संश्रयकारियों के साथ जा मिलें. मुख्यतः मध्यम वर्ग व किसान पृष्ठभूमि से, और अच्छी संख्या में मजदूर वर्ग के बीच से भी, सैकड़ों पेशेवर क्रांतिकारी भूमिगत कम्युनिस्ट पार्टी की रीढ़ बनकर उभर उठे. आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल और देश के कई अन्य हिस्सों में क्रांतिकारी जन संस्कृति का भारी प्रस्फुटन देखा गया जो रैडिकल किसान आंदोलन की उफनती लहरों से प्रेरणा ग्रहण कर रही थी.

इसी तरह से एक रैडिकल सामाजिक उथल-पुथल, एक प्रो-ऐक्टिव एकजुटता आंदोलन – जो अपनी व्यापकता व तीव्रता में अभूतपूर्व और बेमिसाल था – विकसित हुआ, और इसमें हर तबके के लोग इसमें मौजूद तमाम खतरों के बावजूद शामिल हुए और प्राय: खुद प्रमुख संघर्ष में भाग लेने लगे. इन सबने, खासकर नौजवानों की जोशीली भागीदारी ने इस आंदोलन को अत्यधिक शक्ति प्रदान की तथा पार्टी निर्माण के लिए मूल्यवान सामग्री मुहैया कराई.

भटकाव और धक्का
द्रुत गति से आंदोलन के तीव्र व विस्तृत होने से उसी के अनुरूप पार्टी के राजनीतिक सुदृढ़ीकरण और सांगठनिक दिशाबद्धता की भी जरूरत सामने आ गई. लेकिन ये काम नहीं हो पा रहा था; बल्कि हुआ इसका उलटा.

राजनीतिक धरातल पर, यह नवजात पार्टी जल्द ही अति-वामपंथ के “बचकाना मर्ज” से ग्रसित हो गई. बेशक सबसे विवादित मुद्दा वर्ग-शत्रुओं का सफाया ही था. सीएम के लिए – जो तेभागा आंदोलन के एक कार्यकर्ता रहे थे और जिन्होंने स्वयं इस सफाए को वर्ग-घृणा के स्वतःस्फूर्त विस्फोट तथा उत्पीडि़त किसानों के लिए एक मुक्तिदायी अनुभव के बतौर देखा था – इसका यह मतलब हर्गिज नहीं था कि जनसमुदाय की भूमिका को खारिज कर दिया जाए और केवल कुछेक अगुवा किसानों पर भरोसा कर लिया जाए. बल्कि इसमें, कुछ सफलता के साथ, व्यापक जन गोलबंदी से जुड़कर हथियारबंद संघर्ष शुरू करने की बात निहित थी. कुछ पाकेटों (छोटे इलाकों) में इसने किसान स्क्वाडों के निर्माण, जन-उभारों व कृषि सुधार उपायों को अंजाम दिया. (इस प्रकार हासिल मूल्यवान अनुभवों ने बाढ़ में आंदोलन के 1972 के बाद के दौर में भोजपुर-पटना तथा कुछेक अन्य क्षेत्रों में काफी समय तक टिके रहने वाले हथियारबंद किसान संघर्ष के निर्माण में मदद पहुंचाई). लेकिन अनेक क्षेत्रों में सफाया को गलत ढंग से एक “मुहिम” के बतौर चलाया गया, जिसमें काफी विवेकहीन व गैर-जरूरी हत्याएं भी हो गईं. इस वजह से किसानों के वर्ग संघर्ष से एक हद तक अलगाव हुआ और फलतः दुश्मनों के लिए उन इलाकों को ध्वस्त करना अपेक्षाकृत आसान हो गया. उपयुक्त उच्चतर रूपों के लिए प्रयास करते हुए ठोस परिस्थिति के अनुसार संघर्ष के विभिन्न रूपों को संयोजित करने के लेनिनवादी सिद्धांत – जिसे “आठ दस्तावेज” में बुलंद किया गया था – से गंभीर विचलन करते हुए आंदोलन की एक खास अवस्था और कुछेक इलाकों के लिए उपयुक्त संघर्ष के एक रूप (आम तौर पर सशस्त्र संघर्ष तथा खास तौर पर सफाया) को हमेशा और हर जगह के लिए लागू होने योग्य – यहां तक कि जरूरी – रूप के बतौर आम बना दिया गया. इस प्रकार, भारत जैसे विशाल देश में क्रांति के असमान विकास को नजरअंदाज कर दिया गया. इन सब ने और अन्य गंभीर गलतियों ने मिलकर पार्टी-आंदोलन को अत्यधिक नुकसान पहुंचाया.

इन भटकावों की जड़ें विभिन्न गैर-सर्वहारा रवैयों और आत्मगत भूलों में निहित थीं, जैसे कि क्रांतिकारी परिस्थिति को बढ़ा-चढ़ा कर आंकना तथा क्रांतिकारी शक्तियों की तैयारी के स्तर का सही मूल्यांकन न कर पाना, भारतीय क्रांति में विलंब के प्रतिक्रिया स्वरूप एक खास किस्म का उतावलापन, आदि-इत्यादि. इसके अलावा ‘वाम’ भटकाव के प्रति एक ढीला-ढाला रवैया भी मौजूद था, क्योंकि अपने निर्माण काल से ही यह पार्टी सुधारवादी/दक्षिणपंथी अवसरवाद को मुख्य खतरा – तमाम व्यावहारिक अर्थों में, एकमात्र खतरा – समझने की आदी थी.

सीएम ने जब इनमें से कुछ प्रवृत्तियों5 को पहचाना, तो उन्होंने इसे सुधारने की कोशिश की, लेकिन भाकपा(माले) के प्रथम महाधिवेशन में उनके ही सूत्रीकरण – “वर्ग संघर्ष, अर्थात सफाया हमारी सभी समस्याओं को हल करेगा” – ने ‘सफाया मुहिम’ की अतियों के लिए सैद्धांतिक औचित्य प्रदान किया और इस प्रकार इसे ज्यादा नुकसानदेह बना दिया. रोचक बात यह है कि इस खास मसले पर भी उन्होंने इन अतियों के बारे में अपने कामरेडों को बारंबार आगाह किया, और जब उन्हें लगा कि इससे आंदोलन को क्षति हो रही है तो वे अपने को सुधारते/बदलते भी दिखे. केवल एक उदाहरण के बतौर देखिये कि उन्होंने मार्च 1971 में क्या कहा:

हम उसी की हत्या करते हैं, जो किसानों की राजनीतिक सत्ता की स्थापना की राह में रोड़ा बनकर खड़ा होता है – चाहे वह किसी भी वर्ग का हो; अर्थात ये हत्याएं राज दखल के लिए हत्याएं हैं. समूचे वर्ग की कभी हत्या नहीं की जा सकती है. संघर्ष और हत्या एक नहीं समझना चाहिए.

… वर्ग संघर्ष की बुनियादी बात है राजसत्ता दखल करना. वर्ग संघर्ष की बुनियादी बात हत्या नहीं है, यद्यपि कि सफाया वर्ग संघर्ष का उच्चतर रूप है. पहली बातचीत में मालूम होता है कि यह फर्क मामूली है; लेकिन व्यवहार में जाने पर देखा जाता है कि यह फर्क गंभीर चरित्र का है.”6

बहरहाल, भूल सुधारने से संबंधित ये विचार समूचे पार्टी ढांचे में नहीं फैल सके. इसके अनेक कारणों में से एक कारण था 1970-दशक में संगठन की खास्ता स्थिति. इसका भूमिगत ढांचा बनाया गया था; लेकिन राजनीतिक पुलिस द्वारा हमेशा पीछा किए जाने के हालात में पार्टी कमेटियों की नियमित बैठक करने तथा ऊपरी व निचली कमेटियों के बीच सजीव संपर्क बरकरार रखने में वह संगठन हमेशा पर्याप्त रूप से मजबूत व सक्षम साबित नहीं हो सका. अंतः पार्टी बहसें सही ढंग से संचालित नहीं की जा सकीं और सामूहिक कामकाज की प्रक्रिया क्षतिग्रस्त हुई. विशेष कर, पश्चिम बंगाल में नई जुझारू ताकतें भारी मात्रा में शामिल हुईं, लेकिन उन्हें पर्याप्त वैचारिक-राजनीतिक प्रशिक्षण नहीं दिया जा सका, और न ही उन्हें कम्युनिस्ट पार्टी के बुनियादी ढांचों में उचित ढंग से संगठित ही किया जा सका. इसका नतीजा यह हुआ कि राजनीतिक केंद्रीयता कमजोर पड़ गई; हालांकि जमीनी स्तर की गतिविधियां जारी रहीं, लेकिन उचित मार्ग निर्देशन के अभाव में और प्रायः गलत ढंग से.

बहरहाल, अपनी तमाम कमियों के बावजूद इस आंदोलन ने आजादी के बाद पहली बार शासक वर्गों की सत्ता को गंभीर चुनौती जरूर दी थी. स्वभावतः, इंदिरा गांधी के नेतृत्व में अपनी कतारों को एकजुट करने और राजनीतिक पहलकदमी फिर से हासिल कर लेने के बाद उन लोगों ने प्रतिशोध मूलक जवाबी कार्रवाई शुरू कर दी. परिस्थिति में इस भारी बदलाव को देखते हुए – जब प्रतिक्रांति हमलावर हो उठी और वामपंथी आंदोलन के क्रांतिकारी व संसदीय, दोनों धड़ों को 1970-दशक की शुरुआत में धक्के झेलने पड़े थे – सीएम ने अपने अंतिम लेख में पार्टी के सामने साझा दुश्मन – केंद्र व राज्यों में कांग्रेसी सरकारों – के खिलाफ मेहनतकश जनता, खासकर वामपंथी पार्टियों के प्रभाव वाले श्रमजीवी जन समुदाय, के जुझारू संयुक्त मोर्चे की शक्ल में संगठित ढंग से पीछे हटने की नीति पेश की:

“अपने देश में सशस्त्र संघर्ष के एक स्तर पर पहुंचने के बाद हमने धक्का खाया है. ….

“आज हमारा कर्तव्य है व्यापक बुनियादी जनता के बीच पार्टी निर्माण के काम को आगे बढ़ाना और संघर्ष के आधार पर जनता के व्यापकतम हिस्से के साथ संयुक्त मोर्चा कायम करना. कांग्रेसी राज के खिलाफ व्यापक संयुक्त मोर्चा कायम किया जा सकता है. आज ‘वामपंथी’ पार्टियां, आम जनता पर कांग्रेस जो जुल्म कर रही है, उसके खिलाफ संघर्ष में नेतृत्व नहीं दे रही हैं. इन सारी पार्टियों के मजदूरों, किसानों और मेहनतकश जनता को अपने पार्टी नेतृत्व के खिलाफ विक्षोभ है. एकताबद्ध संघर्ष के आधार पर हमें इनके साथ एकता बनाने की कोशिश करनी होगी. यहां तक कि एक समय जो हमसे दुश्मनी करते थे, वे भी विशेष परिस्थिति में हमारे साथ एकताबद्ध होने के लिए आएंगे. इन सारी ताकतों के साथ एकताबद्ध होने के लिए हृदय की विशालता रखनी होगी. … जनता का स्वार्थ ही आज एकताबद्ध संघर्ष की मांग करता है. जनता का स्वार्थ ही पार्टी का स्वार्थ है.”7

दिशा तो सही तरीके से निर्धारित की गई, लेकिन योजनाबद्ध व व्यवस्थित ढंग से पीछे हटने के काम को संगठित नहीं किया जा सका, और 28 जुलाई 1972 को सीएम की शहादत के बाद पार्टी-आंदोलन धीमा होते-होते रूक गया.

प्रति क्रांति को विजय-श्री मिल गई, किंतु विद्रोह की भावना जिंदा रही. उभार की अवधि में जो चट्टान-जैसी मजबूत उपलब्धि मिली – संशोधनवाद के साथ पूर्ण विच्छेद पर आधारित क्रांतिकारी कम्युनिस्ट पार्टी का अभ्युदय और कृषि क्रांति पर अविचल केंद्रीकरण – वह भी हवा में विलीन नहीं हुई. लगातार जारी दमन के सम्मुख देश के अनेक हिस्सों में सैकड़ों संगठक और कार्यकर्ता स्थानीय/आंचलिक स्तरों पर इसकी मशाल को जलाए रखने की कोशिश कर रहे थे और साथ ही साथ, राष्ट्रीय स्तर पर भी आंदोलन को पुनर्जीवित करने के रास्ते तलाश रहे थे. अब, यह प्रक्रिया जो जटिल व दीर्घकालिक थी, टकरावों से भरी और प्रायः थका देने वाली थी – कई कई पार्टियों/गुटों/संगठनों के निर्माण के रूप में अपने अंजाम तक पहुंच रही थी, जो अपने बीच इस आंदोलन के विभिन्न आयामों का प्रतिनिधित्व करते प्रतीत हो रहे थे.

निष्कर्ष
आंदोलन के प्रथम चरण (1967-72) की यह संक्षिप्त समीक्षा दर्शाती है कि नक्सलबाड़ी का अनूठापन और भारतीय जनता के संघर्ष में इसका खास योगदान इस तथ्य में निहित था कि इसके बारे में सिर्फ एक और किसान विद्रोह के बतौर नहीं, बल्कि एक व्यापकतर परियोजना के बतौर सोचा गया था और वास्तव में ऐसा ही साबित भी हुआ. यह परियोजना थी: एक क्रांतिकारी कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना करना और इसके नेतृत्व में कृषि क्रांति को धुरी बनाकर, इलाकावार सत्ता दखल के रास्ते पर चलते हुए, नव-जनवादी क्रांति को पूरा करने के लिए पहला मुकम्मल प्रयास चलाना.

सीएम की दृष्टि में (जैसा कि “आठ दस्तावेज” व उनके अन्य लेखन से लेकर अंतिम लेख तक से स्पष्ट होता है) इस पूरी प्रक्रिया की मुख्य कड़ी थी कम्युनिस्ट पार्टी; और इतिहास के वास्तविक घटनाक्रम भी यही सिद्ध करते हैं. निर्माण-प्रक्रिया-से-गुजरती-पार्टी ने ऐसे समय में नक्सलबाड़ी शुरू किया, जब भारतीय जनता की संघर्षशील मानसिकता अपने शिखर पर थी. इसे शुरू करने का खास समय भी महत्वपूर्ण था – संयुक्त मोर्चा सरकार बनने के ठीक बाद, जो अभी-अभी कांग्रेसी तर्ज पर दमन ढाने की स्थिति में नहीं थी, और इससे इस संघर्ष को आगे बढ़ने का थोड़ा समय मिल गया. और जब अंततः इसे कुचलने के लिए अर्ध-सैनिक बलों को तैनात किया गया, तो सिर्फ एक इलाके में लड़ाई पर सब कुछ दांव लगा देने के बजाए नए-नए क्षेत्रों में आंदोलन को निर्मित व विस्तारित करने के बुद्धिमत्तापूर्ण फैसले ने पार्टी निर्माण के लिए आधार-शिला मुहैया कराई, और अपनी बारी में इस पार्टी ने आंदोलन के विस्तार और तीव्रीकरण में भारी योगदान दिया. लेकिन, इसका उलटा तब हुआ जब पार्टी के राजनीतिक भटकावों और सांगठनिक समस्याओं के चलते आंदोलन को गंभीर क्षति पहुंची और खुद वह पार्टी टुकड़ों-टुकड़ों में बिखर गई. इस जोरदार धक्के के बाद भी पार्टी/इसके धड़ों के पुनर्निर्माण पर ही आंदोलन का पुनर्जीवन निर्भर कर रहा था. आज, जब हम नक्सलबाड़ी के 50 वर्षों पर नजर दौड़ाते हैं, तो आंदोलन-पार्टी द्वंद्वात्मकता ही बीसवीं सदी और 21वीं सदी में भी भारतीय क्रांति की गत्यात्मकता को समझने की मुख्य कड़ी प्रतीत होती है.

पाद-टिप्पणियां:
1. “भारत के क्रांतिकारी किसान संघर्ष के अनुभवों का निचोड़ निकाल कर आगे बढ़ें (04-12-1969)”
2. “1965 किस संभावना का संकेत दे रहा है ?” (पांचवां दस्तावेज, 1965)
3. उपरोक्त
4. “छात्रों और नौजवानों से पार्टी का आह्नान” (अगस्त 1969)
5. इस प्रकार, उन्होंने “संशोधनवाद की ठोस अभिव्यक्तियों के खिलाफ संघर्ष करें” (सितंबर, 1969) में लिखा,
6. “मागुरजान के बाद किसी बैठक में दिए गए भाषण से लिया गया नोट”
7. “जनता का स्वार्थ ही पार्टी का स्वार्थ है” (जून 1972)

“बुर्जुआ विचारधारा का असर उस तथ्य से जो स्पष्ट होता है कि हम आदमी से ज्यादा हथियार पर भरोसा करने लगते हैं. …बुर्जुआ विचारधारा की दूसरी अभिव्यक्ति है ऐक्शन को बढ़ा चढ़ाकर कर महत्व देना जबकि राजनीतिक प्रचार को कोई महत्व न देना. चेयरमैन माओ ने इसे ही ‘सैन्यवाद’ कहा है….”

बाद में पार्टी संगठन को मजबूत करो” (अक्टूबर 1971) में सीएम ने कहा. “संघर्ष जैसे जैसे आगे बढ़ता है. राजनीतिक काम का भी महत्व भी बढ़ता जाता है. सोच की एक प्रवृत्ति यह है कि राजनीतिक काम बहुत हो चुका, इसीलिए अब सैनिक काम प्रधान हो गया है. खोकन (असीम चटर्जी . अ.सेन) और उनके सहयोगियों द्वारा पेश दस्तावेज में यह स्पष्ट रूप से कहा गया है. यह भटकाव संघर्ष को आगे नहीं बढ़ने देगा, यह संघर्ष की ताकतों को कमजोर करता है… की संघर्ष की हर अवस्था में राजनीतिक काम हमारा प्राथमिक कार्यभार रहेगा.”

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