प्रमुख उच्च शिक्षा संस्थानों पर मोदी सरकार के हमले

मोदी सरकार ने शुरूआत से ही देश में उच्च शिक्षा के प्रमुख संस्थानों को ध्वस्त करने की योजना चला रखी है – वह जेएनयू से दिल्ली विश्वविद्यालय तक और हैदराबाद केंद्रीय विवि से लेकर ‘टिस्स’ (टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल सायंसेस) तक. पिछले कुछ महीनों में भाजपा-आरएसएस द्वारा इस किस्म के हमले काफी तेज हो गए हैं. उनकी यह स्पष्ट योजना है कि देश में हाशिये पर खड़े समुदायों के लिए उच्च शिक्षा के दरवाजे बंद कर दिए जाएं, क्योंकि ये ही वे चंद उच्च शिक्षा संस्थान हैं जहां सुलभ और गुणवत्तापूर्ण उच्च शिक्षा प्रदान की जाती है. सरकार इन विश्वविद्यालयों को मिटा देने की हरचंद कोशिश कर रही है, क्योंकि ये आलोचनात्मक चिंतन और परस्पर विरोधी विश्व-दृष्टिकोणों के केंद्र रहे हैं और यहां से शासक निजाम की छात्र विरोधी व जन विरोधी नीतियों को चुनौतियां मिलती रही हैं.

जेएनयू – हमला और जवाब
भाजपा-आरएसएस और उनके द्वारा नियुक्त कुलपति ने लगभग दो साल पहले जो हमले शुरू किए थे, वे अब भी नए जहरीले तेवर के साथ जारी हैं. हमने एमफिल-पीएचडी कोर्स में भारी सीट कटौतियां देखी हैं; हम आरक्षण में कटौती, तथाकथित ‘स्वायत्तता’ व ‘अनिवार्य उपस्थिति’ जैसी मनमानी व अलोकतांत्रिक नीतियों का थोपा जाना, हॉस्टल फीस में अनावश्यक तौर पर भारी वृद्धि और यौन उत्पीड़न का गंभीर आरोप झेल रहे एक संघी फैकल्टी सदस्य (शिक्षक) का विवि प्रशासन द्वारा शर्मनाक बचाव, आदि देख रहे हैं. सीट में बड़ी कटौती के साथ-साथ 2017-18 में शोध कार्य में भर्ती के लिए संविधान-प्रदत्त 50 प्रतिशत के अनिवार्य आरक्षण की जगह कुल सीटों के सिर्फ 20-75 प्रतिशत पर ही आरक्षण दिया गया. सुलभ उच्च शिक्षा पर अंतिम चोट करते हुए भाजपा सरकार ने हाल ही में जेएनयू जैसे प्रमुख विश्वविद्यालयों में अपना हास्यास्पद ‘स्वायत्तता’ मॉडल लाद दिया है, जिसके चलते फीस में काफी वृद्धि होगी, ‘सेल्फ फायनेंसिंग’ (खुद से वित्त-प्रबंध) का चलन बढ़ेगा- छात्रों के एडमिशन और शिक्षकों की बहाली के मौके कम हो जाएंगे तथा आरक्षण व सामाजिक न्याय का दायरा सिकुड़ जाएगा.

लेकिन जेएनयू के छात्र समुदाय और आइसा-नीत छात्र संघ ने पुलिस की बर्बरता, दमन, कानूनी धमकियां और एफआइआर आदि झेलते हुए साहस के साथ इन सभी हमलों का मुकाबला किया. जेएनयू ने ऐतिहासिक ‘उपस्थिति बहिष्कार’ आंदोलन देखा, जिसमें साफ कहा गया कि जेएनयू में छात्र जरूरत से ज्यादा उपस्थित रहते हैं, लेकिन हम इस तरह की अनिवार्यता की बेडि़यों में नहीं बंधना चाहते हैं. उपस्थिति पत्र पर दस्तखत करने की अनिवार्यता लादने के खिलाफ बोलने का ‘अपराध’ करने के लिए छात्र संघ के सदस्यों व विद्यार्थियों पर आर्थिक जुर्माना, दंड और मानहानि के आरोप लादे गए. 23 मार्च को कई यौन उत्पीड़नों के आरोपी शिक्षक के निलंबन की मांग पर वहां के शिक्षकों-छात्रों के द्वारा जेएनयू कैंपस से संसद मार्ग तक निकाले गए ‘लांग मार्च’ पर वाटर कैनन का इस्तेमाल किया गया, लाठी-चार्ज किया गया और वर्दीधारी पुलिसकर्मियों ने छात्राओं के कपड़े फाड़ कर उनके साथ अभद्र हरकतें कीं. लेकिन इन सब चीजों से जेएनयू की संघर्षशील मानसिकता में कोई गिरावट नहीं आई और लैंगिक रूप से न्यायपूर्ण, लोकतांत्रिक व समावेशी कैंपस के लिए संघर्ष नए तेवर के साथ जारी है.

‘टिस्स’ – दीर्घकालिक छात्र आंदोलन की जीत
फरवरी महीने में टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल सायंसेज प्रशासन ने कमजोर तबकों के छात्रों के लिए फंड में भारी कटौती कर दी. वहां के छात्रों ने दो महीने तक लंबा प्रतिवाद आंदोलन चलाकर वहां एक समिति गठित करवाई जो इस मामले की जांच-पड़ताल करेगी और छात्रवृत्ति वितरण के पुराने मॉडल को ही पुनर्बहाल करने की अनुशंसा देगी.

उच्च शिक्षा संस्थानों को नष्ट करने की योजना और कैंपसों में उठते प्रतिरोध
जेएनयू और ‘टिस्स’ अपवाद की घटनाएं नहीं हैं – मोदी सरकार उच्च शिक्षा प्रणाली को नष्ट करने तथा हमारे शिक्षण संस्थानों को मिलने वाले वित्तीय समर्थन और वहां मौजूद सामाजिक न्याय के हर प्रावधान को खत्म करने पर तुली हुई है. 2015 में सरकार ने गैर-‘नेट’ छात्रवृत्ति को रोक दिया था, लेकिन व्यापक छात्र आंदोलन के दबाव में उसने अपना यह कदम वापस लिया. 2016 से यूजीसी के लिए वित्तीय सहायता में 50 प्रतिशत की कमी कर दी है और 5 मई 2016 के यूजीसी नोटिफिकेशन के नाम पर एमफिल-पीएचडी सीटों में भारी कटौती कर दी. सरकार ने यूजीसी द्वारा वर्ष में दो बार लेने वाली ‘नेट’-जेआरएफ परीक्षाओं को सालाना बना देने की कोशिश की. हाल ही में, कई विश्वविद्यालयों को निर्देश दिया गया है कि वे अपना 30 प्रतिशत फंड खुद से अर्जित करें, जिससे फीस में अनिवार्य वृद्धि होगी और सेल्फ-फायनेंसिंग पाठ्य-क्रमों के लिए दरवाजे खुल जाएंगे.

जब सरकार उच्च शिक्षा व्यवस्था को ध्वस्त करने के लिए एक के बाद दूसरी विनाशकारी नीतियां बना रही हैं, तो इसका मुकाबला करने और अपने कैंपसों के अस्तित्व को बचाने के लिए देश के आम छात्रों का साहस और संकल्प अंधेरे में रोशनी की तरह चमक उठा है. पिछले वर्ष भारतीय विज्ञान शिक्षा और शोध संस्थान (आइआइएसईआर), मोहाली में फीस वृद्धि और छात्रवृत्ति पाने के लिए अर्हता मानदंड में अतार्किक वृद्धि के खिलाफ विशाल प्रतिवाद देखने को मिले. उत्तराखंड के एक मेडिकल कॉलेज में जब फीस में भारी वृद्धि की घोषणा की गई, तो वहां छात्रों का विशाल उभार देखा गया. इस पूरी छमाही में, दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र और शिक्षक छात्र-विरोधी शिक्षा-विरोधी 30 प्रतिशत फार्मूले के खिलाफ सड़कों पर उतर पड़े.

देश भर के छात्र न केवल सुलभ व समावेशी उच्च शिक्षा के लिए लड़ रहे हैं, बल्कि वे मोदी सरकार की लोकतंत्र-विरोधी, महिला-विरोधी साजिशों के खिलाफ भी आवाज बुलंद कर रहे हैं. कठुआ और उन्नाव की भयावह बलात्कार घटनाओं के तुरंत बाद छात्र-नौजवानों ने मुखर व स्पष्ट संदेश दिया कि यह देश सरकार के हर महिला-विरोधी जन-विरोधी कदम का प्रतिरोध करेगा. छात्र-नौजवान मोदी शासन की तानाशाहीपूर्ण साजिशों के खिलाफ उठ खड़े हो रहे हैं. आइए, हम इस देशव्यापी प्रतिरोध को और तेज व तीखा बना दें !

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