लाल किला की नीलामी के खिलाफ लेखकों, बुद्धिजीवियों, संस्कृतिकर्मियों ने प्रतिरोध मार्च निकाला

1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम की 161 वीं बरसी पर 10 मई 2018 को लाल किले की नीलामी के खिलाफ दिल्ली के नागरिकों, सांस्कृतिक समूहों, लेखकों और सचेत बुद्धिजीवियों ने राजघाट से लाल किला तक एक सांस्कृतिक प्रतिरोध पदयात्रा निकाली. यह पदयात्रा शाम 5 बजे राजघाट से शुरू होकर फिरोज शाह कोटला मार्ग होते हुए लाल किला तक पहुंची.

पदयात्रा शुरू होने से पहले राजघाट के मुख्य गेट पर एक छोटी सी आम सभा का आयोजन हुआ जिसको कई बुद्धिजीवियों ने संबोधित किया. संगवारी थियेटर ग्रुप के गीतों के साथ इस पदयात्रा की शुरूआत हुई. पदयात्रा में आम नागरिक संगठन, अध्यापक, छात्र, सांस्कृतिक साहित्यिक संगठन, बुद्धिजीवी, कलाकार, इतिहासकार और कार्यकर्ता बड़ी संख्या में शामिल हुए. पदयात्रा में सरकार द्वारा लाल किले को डालमिया समूह को 5 सालों के लिए गोद दिए जाने के खिलाफ नारे लग रहे थे – ‘रखरखाव के नाम पर लाल किले का जन-विरोधी व्यवसायीकरण नहीं चलेगा’, ‘नीलामी के करार को रद्द करो’, ‘व्याख्या केंद्र के नाम पर इतिहास के साथ छेड़छाड़ नहीं चलेगी’, ‘लाल किला बचाओ! सरकार के व्यवसायिक मंसूबे को हराओ!’, ‘फिर से कंपनी राज नहीं चलेगा’.

ज्ञात हो कि पिछले दिनों मोदी सरकार ने लाल किला को डालमिया भारत समूह को रखरखाव के नाम पर 5 साल के लिए गोद दे दिया है. करार डालमिया भारत समूह को इस बात की छूट देता है कि वह लाल किले के भीतर महत्वपूर्ण जगहों पर अपनी कंपनी के विज्ञापनों को लगा सकता है. इतना ही नहीं वह पर्यटकों को लाल किले के इतिहास की जानकारी देने के लिए ‘व्याख्या केंद्र’ भी खोलेगा. अपनी जरूरत के हिसाब से वह निर्माण कार्य भी कर सकता है. यह करार 5 साल के लिए डालमिया समूह को मालिकाना हक भी देता है. इन सारी चीजों को देखते हुए सरकार की मंशा पर संदेह और गहरा हो जाता है. प्रदर्शनकारियों ने इस बात की आशंका जाहिर की कि व्याख्या केंद्र के नाम पर इतिहास की वास्तविक तस्वीर को बदलकर प्रस्तुत करने की कोशिश की जाएगी. क्योंकि भाजपा सरकार इतिहास के पुनर्लेखन और पुनर्पाठ की लगातार कोशिश कर रही है. ऐसा लगता है कि लाल किला की यह नीलामी भी इसी का हिस्सा है. यह बात तब और भी स्पष्ट तौर पर जाहिर हो जाती है जब यह तथ्य सामने आता है कि जिस डालमिया भारत समूह ने लाल किला को गोद लिया है उसके मालिक हरि मोहन डालमिया वही व्यक्ति हैं जो कभी विश्व हिन्दू परिषद् के अध्यक्ष हुआ करते थे.

प्रसिद्ध इतिहासकार और हेरिटेज के विशेज्ञ सोहैल हाशमी ने पदयात्रा शुरू होने से पहले गांधी समाधि के बाहर राजघाट पर लोगों को संबोधित किया. भाकपा(माले) के महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य भी सभा में शामिल हुए और उन्होंने लाल किले के सामने हो रही सभा को संबोधित करते हुए कहा कि “लाल किला देश की पहली जंगे आजादी का प्रतीक है. लाल किले से देश की जनता का भावनात्मक लगाव है. यह विशेष ऐतिहासिक धरोहर है. यह हमारी साझी लड़ाई और साझी विरासत का प्रतीक है. आज पूरा हिंदुस्तान कह रहा है ‘लाल किला पर डालमिया, नहीं मानेगा इण्डिया’.”

जनवादी लेखक संघ के अध्यक्ष असगर वजाहत ने सभा को संबोधित करते हुए कहा कि “सारे मध्यकालीन मुस्लिम इमारतों के प्रति भाजपा सरकार का रवैया उपेक्षापूर्ण है. वह उसका सरकारी संरक्षण नहीं करना चाहती है. इसीलिए लाल किले के साथ भी वह यही कर रही है.” जन संस्कृति मंच के दिल्ली इकाई के सचिव राम नरेश राम ने सभा को संबोधित करते हुए कहा कि “लाल किला कोई बीमार कंपनी नहीं है जिसको सुधारने के लिए इसे निजी हाथों में देने की जरूरत है. डालमिया के हाथों में लाल किला को सौंपने का सरकार का तर्क बेबुनियाद है. जब लाल किले की वर्तमान आय इतनी है कि उसका रखरखाव उसी से किया जा सकता है तो फिर इसे डालमिया को सौपने का क्या औचित्य है. करार में जो बातें हैं उससे यह स्पष्ट है कि सरकार का यह फैसला सिर्फ रखरखाव के लिए नहीं बल्कि वह इसे निजी हाथों में देकर इतिहास के साथ मनमानी छेड़छाड़ करेगी. देश भर के नागरिकों से यह अपील है कि सरकार के इस फैसले के खिलाफ जगह जगह अभियान चले.” दलित लेखक संघ के महासचिव कर्मशील भारती ने कहा कि “हमारे देश की विरासत लाल किला को गिरवी रखने का जो प्रयास किया है इससे इनकी देश के प्रति और देश की धरोहर लाल किले के प्रति मानसिकता का पता चलता है. ब्रिटेन के लोग भी भारत में व्यापार करने ही आए थे और उन्होंने देश को गुलाम बना लिया. यह प्रयास भी कुछ ऐसा ही है. यह फैसला एक तरह से देशद्रोह का काम है. किले से हमारा भावनात्मक जुड़ाव है इसलिए सरकार का यह फैसला गलत है.’

भाकपा के मैमूना मुल्ला ने कहा कि सरकार निजीकरण के अपने परिचित उद्देश्य के चलते ही ऐसा फैसला ले रही है. हमारा लाल किला प्रथम स्वाधीनता संग्राम का प्रतीक है. सेंटर फॉर दलित आर्ट एंड लिटरेचर के कमल किशोर कठेरिया, आइसा की राष्ट्रीय अध्यक्ष सुचेता डे ने भी सभा को संबोधित किया. सभा का संचालन करते हुए अनहद के ट्रस्टी ओवैस सुल्तान खान ने कहा कि “आज भारत अल्ट्रा राइट विंग कार्पाेरेट की घेरेबंदी में है. लोग, इतिहास, विरासत, स्मारक और आजीविका सभी फासीवादी सांप्रदायिक हमले के शिकार हैं. हम इसे सह नहीं सकते. लाल किला हमारी राष्ट्रीय संप्रभुता का प्रतीक है. हमारे पूर्वजों ने ईस्ट इण्डिया कंपनी और ब्रिटिश औपनिवेशिक साम्राज्य के कंपनी राज के खिलाफ लड़ा और हम घृणा, कट्टरता और हिंसा की विभाजनकारी राजनीति के खिलाफ भी लड़ेंगे, सरकार के इस फैसले से कार्पाेरेट कंपनियों को एक नया कंपनी राज स्थापित करने की इजाजत मिल जाएगी. इसलिए हम कह रहे हैं – ‘फिर से कंपनी राज नहीं चलेगा.’

इस प्रतिरोध मार्च में आइसा, अमन बिरादरी, सेंटर फॉर दलित लिटरेचर एंड आर्ट, दलित लेखक संघ, डेमोक्रेटिक टीचर्स फ्रंट, डी.टी.आई., इप्टा, जन संस्कृति मंच, जनवादी लेखक संघ, प्रगतिशील लेखक संघ, एस.एफ.आई, के.वाई.एस, ऐपवा, ऐक्टू, प्रतिरोध का सिनेमा समेत तमाम संगठन शामिल हुए.

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