लाल किले पर डालमिया, नहीं मानेगा इण्डिया’

(भाकपा-माले महासचिव कॉ- दीपंकर भट्टाचार्य का वक्तव्य)

लाल किले को और पूरे देश की ऐतिहासिक धरोहरों को बचाने की इस लड़ाई में शामिल आप सभी साथियों को, दिल्ली के तमाम प्रबुद्ध नागरिकों को मेरा इंकलाबी सलाम। 161 साल पहले ये आज ही का दिन था 10 मई, जब हिन्दुस्तान में आजादी की जंग की शुरूआत हुई थी। जब पूरे देश में आजादी की चेतना मुखर होने लगी थी। जब इस देश के लोग गा रहे थे ‘हम हैं इसके मालिक, हिन्दुस्तान हमारा।’ हमारे संविधान में जिस संप्रभुता की धारणा है, संविधान पारित होने के सौ साल पहले इस देश के किसान, इस देश के नौजवान, इस देश के आम लोग गा रहे थे – ये देश हमारा है और हम इसके मालिक हैं। और आज हमें यहां आना पड़ा है यह कहने के लिये कि ‘लाल किला पर डालमिया, नहीं मानेगा इंडिया।’

आप देख रहे हैं कि हमारी सरकार लाल किले को रख-रखाव के नाम पर डालमिया समूह को सौंपने जा रही है। सरकार का कहना है कि हम इसे बेच नहीं रहे हैं, हम इसको लीज पर भी नहीं दे रहे हैं, हम महज रख-रखाव के लिये एक कंपनी को दे रहे हैं। यह कंपनी की कारपोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी के तहत है। सरकार की योजना है – एडॉप्ट द मॉनूमेंट। तो सारे स्मारकों को कंपनी वालों की गोद में दे दें, यही सरकार की पॉलिसी है। तो हम न सिर्फ डालमिया को लाल किला को देने जा रहे हैं बल्कि करीब-करीब सैकड़ों ऐसे स्मारकों की सूची तैयार है जिन्हें एक के बाद एक कंपनियों को दिया जायेगा। सरकार का कहना है कि यह पुरानी नीति है, जिसके क्रियान्वयन की यूपीए के जमाने से तैयारी चल रही है। पार्लियामेंट की कमेटी ने इसकी सिफारिश की है। हो सकता है कि ऐसी बात हो। बहुत पहले से इसकी तैयारी चल रही होगी, लेकिन सच्चाई तो आज सामने आई है। लाल किला कोई आम स्मारक नहीं है। जब 1857 की लड़ाई हो रही थी तो लोगों की भावना में आजादी का मुख्यालय था लाल किला। हमारे पूरे इतिहास में, आजादी की लड़ाई अांदोलन के इतिहास में समय-समय पर आजादी के अांदोलन के साथ इसका जो जुड़ाव है, किसी आम स्मारक के साथ वैसा जुड़ाव नहीं है। लेकिन मोदी सरकार के लोग इसको समझ नहीं सकते। क्योंकि, इस देश के इतिहास के साथ इनका कोई लगाव नहीं रहा है, कोई लेना-देना नहीं रहा है। रख-रखाव के नाम पर ये जो किया गया है, हमारे पर्यटन मंत्री बता रहे हैं कि लाल किले में डालमिया समूह वाले कुछ नहीं करेंगे। सिर्फ पब्लिक टायलेट बनाने का काम करेंगे। हम पूछना चाहते हैं कि तब ये पूरा स्वच्छ भारत अभियान किसलिये चल रहा है? टायलेट के नाम पर इतने सारे पैसे खर्च हो रहे हैं, अगर लाल किले में पब्लिक टॉयलेट के रख-रखाव के लिये डालमिया की जरूरत है तो सरकार किस बात के लिये है?

अब यह डालमिया कैसी कंपनी है? जैसे ही आप मुगलसराय के बाद बिहार में प्रवेश करते हैं वहां एक शहर है जिसका नाम है डालमियानगर। एक जमाने में बिहार में कुछ कल-कारखाने बने थे। यहां सीमेंट के कारखाने थे, डालडा के कारखाने थे और बहुत सारे कारखाने थे और डालमिया ने सरकार की जमीन लेकर अपने नाम पर नगर बसाया था। आज वो डालमियानगर पूरा वीरान पड़ा हुआ है। सारे कारखाने बंद हैं. लोगों को उसमें मजदूरी नहीं मिली. बिहार के अंदर आप देख सकते हैं डालमिया की कोई कारपोरेट विकास की, कोई औद्योगीकरण की दिशा नहीं रही, बल्कि बिहार को लूटने और बेरोजगार बनाने की साजिश रही है।

डालमिया को आज अगर लाल किला दिया जा रहा है, तो जाहिर सी बात है कि उसके पीछे महज कारपोरेट लॉजिक नहीं है, साथ-साथ पूरी तरह विचारधारात्मक लॉजिक है। ये ‘डालमिया’ संघ परिवार के अपने पूंजीपति हैं। डालमिया ग्रुप के पैट्रियार्क विष्णु हरि डालमिया, जो आज 90 साल से ज्यादा उम्र के हैं, विश्व हिन्दू परिषद के अध्यक्ष रह चुके हैं। ये बाबरी मस्जिद को गिराने की पूरी मुहिम की अगुआई में रहे हैं। और इसीलिए आज लाल किला उन्हीं को दिया जा रहा है।

बात कुछ और नहीं, दरअसल लाल किला इनकी नजर में महज एक ‘इस्लामिक मॉन्यूमेंट’ है, वो महज एक मुगल पीरीयड का स्मारक है। लाल किला हो, कुतुबमीनार हो, ताजमहल हो – ये तमाम (केवल इस देश के मंदिरों को छोड़कर) जितनी भी खूबसूरत इमारतें हैं, उन इमारतों के प्रति इनके मन में नफरत है। ये जानते भी नहीं हैं इन इमारतों के बारे में. तो भारत को बांटने, हमारे इतिहास को पूरी तरह से बरबाद करने, बदनाम करने की जो पूरी साजिश चल रही है, ये उसी साजिश का हिस्सा है। उसी साजिश का हिस्सा है अलीगढ़ मुलिम विश्वविद्यालय में जिन्ना की तस्वीर के नाम पर वहां के छात्रों को प्रताडि़त करना। आज जामिया मिलिया इस्लामिया में हिन्दू और मुसलमान के नाम पर छात्रों को बांटने की पूरी साजिश चल रही है। इसी साजिश के तहत लाल किले को भी बरबाद करने की कोशिश हो रही है।

साथियो, यह जो लड़ाई हमने शुरू की है, ये महज इतिहास और धरोेहर को बचाने की लड़ाई नहीं है, आजादी की भावना और इतिहास को बचाने की लड़ाई है। आज देश के अंदर हमारी उस आजादी की भावना, उसके सारे मूल्य, उसकी प्रस्थापना खतरे में है। इसलिये हम समझते हैं कि आज पूरे देश में तानाशाही को रोकने, फासिज्म को शिकस्त देने की जो बड़ी लड़ाई शुरू हुई है, यह इस लड़ाई का एक हिस्सा है और जरूर इस लड़ाई में हम कामयाब होंगे। ये लड़ाई जीतनी ही होगी क्योंकि अगर यही परिपाटी चल निकली तो हो सकता है कि कल हमको पता चलेगा कि कुतुब मीनार पेटीएम के हाथ में चला गया। हमारे देश में तो लोग कह रहे हैं कि पार्लियामेंट अब अंबानी के हाथ में चला गया है। हमारे देश में एक के बाद एक बड़ी इमारतों को, हमारे देश के तमाम संसाधनों को कंपनियों के हाथ में और इन नागपुर वालों के हाथ में देने की जो साजिश चल रही है उस साजिश को जरूर हमलोग शिकस्त देंगे। हमारी जो ये एकता है, ये एकता और मजबूत हो और ये संदेश दिल्ली से पूरे देश में जाये।

आज हम देख रहे हैं सुबह से देश के कोने-कोने से यह आवाज उठ रही है ‘लाल किले पर डालमिया, नहीं सहेगा इंडिया’। ये आवाज आज पूरे देश के छात्र-नौजवानों की आवाज है। उन किसानों की आवाज है जो आज अपनी जमीन बचाने के लिए लड़ रहे हैं, जो फसल की सही कीमत के लिये लड़ रहे हैं, जो खुदकुशी के खिलाफ लड़ रहे हैं। ये वही किसान हैं जो अपने देश के इतिहास को बचाने की लड़ाई में हमारे साथ हैं। ये लड़ाई हम सबकी मिली-जुली लड़ाई है। जरूर हमारे सामने जो दुश्मन है वह बहुत खतरनाक है क्योंकि वह सत्ता के बल पर पूरे देश में तबाही मचा रहा है, पूरे देश में तहस-नहस करना शुरू कर दिया है, तोड़-फोड़ करना शुरू कर दिया है। और इसीलिये इस तबाही के खिलाफ, इस बरबादी के खिलाफ, इस तांडव के खिलाफ जो लड़ाई है ये बड़ी लड़ाई है। भगत सिंह-अम्बेदकर के इस मुल्क में, 1857 के इस मुल्क में, हम भी जरूर इस कठिन लड़ाई में कामयाब होंगे। फासीवाद को शिकस्त देंगे। इस देश में जम्हूरियत को, इस देश की पूरी गंगा-जमनी तहजीब को हमेशा-हमेशा के लिये सुरक्षित बनायेंगे, मजबूत बनायेंगे। आनेवाले दिनों में इस लड़ाई को हमलोग दिल्ली से लेकर पूरे देश में और आगे बढ़ायें, मजबूत करें. इसी अपील के साथ सभी साथियों का बहुत-बहुत शुक्रिया, इंकलाब जिंदाबाद!

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