बतर्ज गुजरात, कर्नाटक में खाई भाजपा ने चोट – भाजपा को पूरे देश में निर्णायक चोट जरूरी

कर्नाटक के विधानसभा चुनाव के बारे में मीडिया की सर्वोत्कृष्ट खबरें भी जितना बता पाई थीं, कर्नाटक चुनाव के नतीजे उससे कहीं ज्यादा बहु-स्तरीय साबित हुए हैं. सच मायनों में यह चुनावी लड़ाई कई सीटों पर त्रिकोणीय साबित हुई है, जिसके परिणाम स्वरूप ऐसी लुभावनी त्रिशंकु विधानसभा सामने आई है जिसका पूर्वानुमान कोई भी एक्जिट पोल नहीं कर सका था. जहां भाजपा बहुमत के लिये आवश्यक संख्या से काफी कम सीटें हासिल कर सकी है, वहीं गैर-भाजपा पार्टियाें ने मिलकर एक चुनावोत्तर गठबंधन बना लिया है जिसे अच्छा खासा बहुमत हासिल है. अगर संवैधानिक प्रक्रियाओं और रीति-नीति का पालन किया गया तो भाजपा का 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले कर्नाटक के किले को फिर से हासिल हासिल करने का सपना झूठा साबित हो जायेगा. अगले कुछेक दिनों में कर्नाटक में चाहे जो भी नजारा सामने आये, कर्नाटक के चुनाव न सिर्फ अगले लोकसभा चुनावों की लड़ाई के लिये एक निर्णायक प्रस्थान बिंदु सिद्ध हुए हैं बल्कि वे इसी लड़ाई के लिये अत्यंत उपयोगी प्रस्तुति-पर्व का मापांक साबित हुए हैं.

कर्नाटक के संदेश को समझने की कोशिश करने से पहले हमें कुछेक तथ्यों और आंकड़ों को फिर से याद करना जरूरी होगा. इस चुनाव की तुलना 2013 में हुए विधानसभा चुनाव से करना बेकार है, क्योंकि उन दिनों भाजपा के अंदर फूट थी. सन् 2013 में बी.एस. येद्दियुरप्पा ने कर्नाटक जनता पक्ष (केजेपी) नाम से अपनी एक नई पार्टी बना ली थी, जब उनके ऊपर भ्रष्टाचार का आरोप लगा था और उनको मुख्यमंत्री पद से हटा दिया गया था, और उनकी पार्टी को कुल वोटों का लगभग 10 प्रतिशत हिस्सा हासिल हुआ था जिससे उनको छह सीटें भी मिली थीं. एक अन्य भाजपा नेता बी. श्रीरामुलु ने भी एक दूसरी पार्टी बडवरा श्रमिकरा रायतरा कांग्रेस पार्टी (बीएसआरसीपी) के नाम से चुनाव लड़ा था और उन्हें 2-7 प्रतिशत वोटों के साथ 4 सीटें भी मिली थीं. भाजपा के मौजूदा प्रदर्शन की तुलना या तो 2014 में हुए लोकसभा चुनाव में, जब भाजपा कर्नाटक में फिर से एकताबद्ध हो चुकी थी, प्राप्त वोटों से करना, या फिर उससे पहले 2008 में हुए विधानसभा चुनाव से तुलना करना ज्यादा फायदेमंद होगा, जब एकताबद्ध और चढ़ती ताकत के बतौर भाजपा पहली बार कर्नाटक में सत्तारूढ़ हुई थी. वर्ष 2008 में भाजपा को 110 सीटें हासिल हुई थीं, जो इस चुनाव में हासिल सीटों की संख्या से छह ज्यादा है, और 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को 132 विधानसभा क्षेत्रों में बढ़त हासिल थी और उसे कुल वोटों का 43 फीसदी हिस्सा हासिल हुआ था. इस बार भाजपा को मिली 104 सीटें और उसे हासिल लगभग 36 प्रतिशत वोट 2014 के चरम शिखर से स्पष्ट रूप से गिरावट को दर्शाता है.

इन आंकड़ों से एकदम साफ पता चलता है कि कर्नाटक के चुनाव को राज्य सरकार के खिलाफ आक्रोश और केन्द्र में सत्तारूढ़ मोदी सरकार को समर्थन के सीधे-सरल आख्यान के बतौर कत्तई नहीं देखा जा सकता है. अगर अंतिम परिणाम उल्लेखनीय रूप से ‘सत्तारूढ़-विरोधी’ कारक को प्रतिबिम्बित करता है, जो कांग्रेस और उसके तथाकथित रूप से मजबूत और लोकप्रिय मुख्यमंत्री के खिलाफ प्रभावी हुआ, तो फिर इस चुनाव में, जिसमें किसी भी हद तक जाकर अशालीन व उग्र भाषणों से चुनाव अभियान चलाया गया, और भाजपा की कुख्यात चुनाव-मशीनरी तथा ‘जादुई’ प्रबंध कुशलता के बावजूद, भाजपा का बहुमत की संख्या को हासिल न कर पाना, या फिर कहिये कि मोदी-युग से पहले के सर्वोत्तम प्रदर्शन को भी दुहराने में नाकामी को भी मोदी सरकार के खराब प्रदर्शन, नाकामी और वादाखिलाफी के प्रति जनता के बढ़ते मोहभंग, और उसकी नफरत भरी, जातिवादी, साम्प्रदायिक और महिला-विरोधी हिंसा की राजनीति को खारिज किये जाने की उल्लेखनीय अभिव्यक्ति के बतौर भी देखना होगा.

यह दुहरा ‘सत्तारूढ़-विरोधी’ रुझान ही संभवतः जनता दल (एस) के मजबूत प्रदर्शन को सर्वोत्तम रूप से व्याख्यायित करता है, हालांकि उनकी संख्या भी 2013 के स्तर से कुछ गिरी ही है. जैसा कि पहले से ही अनुमानित था, भाजपा ने कर्नाटक के समुद्रतटीय अंचल में भारी जीत हासिल की, क्याेंकि यह अंचल संघ-भाजपा के साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण और नफरत व अफवाहें फैलाने के प्रयोगों के लिये स्थानीय प्रयोगशाला बनकर उभरा है, और कर्नाटक के शहरी क्षेत्र में भी भाजपा को परम्परागत ढंग से बढ़त हासिल रही है, मगर सबसे आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि वह मैसूर अंचल में भी एक प्रमुख प्रतिद्वंद्वी बनकर उभरी, जहां अब तक हमेशा जेडी(एस) और कांग्रेस का ही वर्चस्व रहता आया है. चुनाव से पहले सिद्धारमैया की लिंगायतों को अल्पसंख्यक दर्जे की मान्यता देने की सिफारिश, कन्नड़ पहचान के गौरव को याद करके उभारने का प्रयास और अहिंडा (जो दलित-पिछड़ा-अल्पसंख्यक सामाजिक गठजोड़ का कन्नड़ में संक्षिप्त नाम है) गठजोड़ को सुदृढ़ करने जैसी ‘स्मार्ट’ रणनीतिक चालों के बारे में काफी कुछ लिखा जा रहा था. जाहिर है कि इन चालों से उन्हें कोई खास फायदा नहीं मिला, और उनका कोई नतीजा निकला तो यह कि उतनी ही मजबूत प्रतिक्रिया भी उनके खिलाफ पैदा हो गई.

गुजरात चुनाव के बाद राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस के पुनरुत्थान सम्बंधी जो अनुभूति पैदा की गई थी, उसे कर्नाटक में यकीनन एक धक्का लगा है. यह पूर्वधारणा कि राहुल गांधी अपनी धार्मिक आस्था के सार्वजनिक प्रदर्शन की मदद से ग्रहणयोग्य हिंदू नेता के रूप में उभरे हैं, वास्तविकता से कहीं ज्यादा कपोल-कल्पित है. रोजगार, बेहतर जिंदगी, सम्मान और अपना भविष्य – युवाओं के सामने सबसे महत्वपूर्ण व जरूरी मुद्दों के इर्द-गिर्द युवाओं की सशक्त गोलबंदी, और हार्दिक, अल्पेश और जिग्नेश जैसे युवा नेताओं द्वारा चलाया गया जोशीला चुनाव प्रचार अभियान – इसने ही गुजरात में कांग्रेस के पक्ष में शक्तिशाली हलचल पैदा की थी. वह चीज तो कर्नाटक में गंभीर रूप से अनुपस्थित थी. कर्नाटक से जो दूसरा सबक मिलता है वह है कारगर चुनावी गठबंधन बनाने की जरूरत. यह कहना मुश्किल होगा कि क्या कांग्रेस और जेडी(एस) के बीच चुनाव-पूर्व गठबंधन भी साकार हो सकता था, मगर तमाम विपक्षी शक्तियों के बीच व्यापक आपसी समझदारी कायम होना भाजपा को 2019 में सत्ता में वापस आने से रोकने के लिये अनिवार्यतः आवश्यक शर्त है.

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