कर्ज के बोझ की चिंता में नारद राय ने की आत्महत्या : माले

 

भाकपा-माले विधायक सुदामा प्रसाद के नेतृत्व में उच्चस्तरीय जांच टीम ने किया शिवहर का दौरा.

किसानों की समस्याओं से केंद्र-पटना की सरकारों का कोई सरोकार नहीं.
पटना 16 मार्च 2018

भाकपा-माले के विधायक सुदामा प्रसाद, अखिल भारतीय किसान महासभा के बिहार राज्य अध्यक्ष विशेश्वर प्रसाद यादव, मुजफ्फरपुर के माले व इंसाफ मंच के नेता आफताब आलम, होरिल राय, परशुराम पाठक, सूरज कुमार सिंह आदि नेताओं की संयुक्त टीम ने आज दिनंाक 16 मार्च को शिवहर के तरियानी ब्लाॅक के राजाडीह गांव का दौरा किया, जहां मक्के की फसल में दाना नहीं आने की वजह से निराश किसान नारद राय ने आत्महत्या कर ली थी.

 

 

भाकपा-माले जांच टीम ने कहा है कि नारद राय की आत्महत्या महाजनी व बैंक के बोझ के तले दबे भारत के किसानों के दर्द का चारित्रिक उदाहरण है. इस प्रकार की घटनाएं कल तक महाराष्ट्र व राज्य के दूसरे हिस्से में सुनाई पड़ती थीं, लेकिन अब वे हमारे राज्य में भी आम हो गई हैं. बिहार में तो हालत और भी खराब होते जा रही है. यहां जमीन पर काम करने वाले बटाईदार किसानों को किसी भी प्रकार की सुविधा नहीं मिलती और कृषि के नाम पर जो भी सुविधा उपलब्ध है, उसे भूस्वामी हड़प ले रहे हैं. जिसकी वजह से बटाईदारों की हालत दिन-प्रतिदिन खराब होते जा रही है.

नारद राय तकरीबन डेढ़ बिगहा जमीन पर 25 मन प्रति बिगहा के हिसाब से बटाई पर खेती करते थे. बीज वगैरह के लिए उन्होंने स्थानीय सूदखोरों से भारी ब्याज पर पैसा लिया था. सुरेश चैधरी की दुकान से उन्होंने मक्के की बीज 300 रु. किलो खरीदी थी. बीज किस कपंनी का था, ये पता नहीं लग सका, क्योंकि अक्सर दुकानदार इसका बिल नहीं दिया करते. एक तरफ जहां बीज 300 रु. किलो मिलता है, वहीं जब बाजार में मक्का आता है, तो उसका भाव 10-15 रु. किलो होता है.

पिछले वर्षों की तरह इस बार भी बीज नकली निकला और उसमें दाना नहीं आया. इससे निराश नारद राय ने 13 मार्च केा जहर खा ली और 14 मार्च को मुजफ्फरपुर में उनकी मृत्यु हो गई. उनकी आर्थिक स्थिति बेहद ही तंग है. उनके पास महज 8 कट्ठा अपनी जमीन है. पांच लड़के हैं. दो हरियाणा में प्राइवेट नौकरी करते हंै, बाकि तीन पंजाब में ईंट भट्ठा पर मजदूरी का काम करते हैं. यही स्थिति गांव के तकरीबन अधिकांश बटाईदार किसानों की है.

गांव में प्रवेश करने के बाद सन्नाटा का माहौल था. कोई इस घटना पर बोलने को तैयार नहीं था. नारद राय की पत्नी बेसुध पड़ी थीं, सो उनसे कोई बात नहीं की जा सकी. बाद में पता चला कि गांव का मुखिया पति किसानों पर चुप रहने का दबाव बनाए हुए है. दबंग लोग गरीबों पर इस बात का दबाव बना रहे हैं कि वे कहें कि नारद राय की मृत्यु पारिवारिक झगड़े के कारण हुई. गांव में अभी तक कोई भी सरकारी अधिकारी पीड़ित परिजन का हाल लेने नहीं पहुंचा. स्थानीय जदयू विधायक सुनीता सिंह चैहान भी नहीं पहुंची है. नारद राय के परिजन को कोई सरकारी मुआवजा तो नहीं ही मिला, 20 हजार का पारिवारिक लाभ योजना भी नहीं मिला है.

जब माले विधायक सुदामा प्रसाद ने डीएम, एसपी, सीओ आदि अधिकारियों से बात करने की कोशिश की, तो किसी भी अधिकारी से कोई बात न हो सकी. गरीबों के प्रति तो सरकारी अधिकारियों का रुख सबको पता है, जनप्रतिनिधियों के प्रति भी अधिकारियों का रवैया बेहद संवेदनहीन दिखा.

बाद में कुछेक किसानों से जांच टीम के सदस्य बातचीत करने में सफल रहे. रामकृपाल राय, कल्पेश ठाकुर, कन्हैया राम, विनेश चैधरी, संध्या देवी, सीता देवी आदि बटाईदार किसानों ने बताया कि सबकी हालत एक ही जैसी है. पिछले साल बाढ़ की वजह से फसल पूरी तरह बर्बाद हो गया, लेकिन आज तक उन्हें कोई मुआवजा नहीं मिला. उलटे जमीन मालिकों को मुआवजा मिल गया. 6 महीना से गांव में गरीबों को राशन नहीं मिला है. अधिकांश किसानों के पास घर के नाम पर झोपड़ियां हैं और गांव की हालत बेहद चिंताजनक है.

जांच टीम ने मांग की है कि नारद राय के परिजन को तत्काल 10 लाख रु. का मुआवजा दिया जाए तथा उन कंपनियों पर सख्त कार्रवाई की जाए जो किसानों के भविष्य के साथ मजाक कर रहे हैं. उन्होंने बटाईदार समेत सभी किसानों पर से हरेक प्रकार के कर्ज की अविलंब माफी की भी अपनी मांग दुहराई.

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