क्या सरकार न्यायपालिका को प्रभावित कर रही है? संविधान और लोकतंत्र खतरे में

सर्वोच्च न्यायालय के चार वरिष्ठतम न्यायाधीशों द्वारा अभूतपूर्व रूप से प्रेस कान्फ्रेन्स बुलाये जाने ने संविधान के सामने खड़े भीषण संकट का पर्दाफाश कर दिया है. चार न्यायाधीशों ने मजबूरी में महसूस किया कि देश के नागरिकों को इसके बारे में सतर्क कर देना जरूरी है कि कार्यपालिका से न्यायपालिका की स्वतंत्रता के बुनियादी और महत्वपूर्ण संवैधानिक उसूल का उल्लंघन होने की संभावना सामने आ गई है. दूसरे शब्दों में, उन्होंने यह बताया कि भारत के मुख्य न्यायाधीश अपनी ‘मास्टर आॅफ द रोस्टर’ (कार्यसूची तय करने का अधिकारी) की शक्तियों का गलत इस्तेमाल करके संवेदनशील मुकदमों को ऐसी चुनिन्दा बेंचों को सौंप रहे हैं जिनसे उम्मीद है कि वे सरकार के पक्ष में ही फैसला देंगी.

अगर सरकार न्यायिक स्वतंत्रता में अपनी टांग अड़ाने और न्यायपालिका को अपने पक्ष में प्रभावित करने में सक्षम हो जाती है, तो यकीनन देश का लोकतंत्र खतरे में है. हम नहीं भूल सकते कि इमरजेन्सी के दौरान न्यायपालिका की इन्दिरा गांधी के प्रति वफादारी ही लोकतंत्र के संकट का सर्वाधिक गंभीर लक्षण था. इंदिरा गांधी ने 1973 में तीन वरिष्ठतम न्यायाधीशों को लांघकर एक ऐसे न्यायाधीश को भारत का मुख्य न्यायाधीश बनाया था जो इमरजेन्सी के दौरान भी इंदिरा गांधी के प्रति वफादार बना रहा. इन तीन न्यायाधीशों ने, जिन्होंने ऐतिहासिक केशवानंद भारती बनाम भारत सरकार मुकदमे में बहुमत से निर्णय दिया था कि संसद को संविधान की बुनियादी संरचना में संशोधन करने का अधिकार नहीं है, वरिष्ठता-क्रम में उन्हें लांघे जाने के विरोध में त्यागपत्र दे दिया. इमरजेन्सी के दौरान पांच न्यायाधीशों की संविधान-पीठ (कांस्टिट्यूशनल बेंच) के बहुमत ने एडीएम, जबलपुर बनाम शिवकांत शुक्ला मुकदमे में कुख्यात निर्णय सुनाया था कि इमरजेन्सी के दौरान नागरिकों के मौलिक अधिकारों को स्थगित किया जा सकता है. बेंच के फैसले से असहमति जाहिर करने वाले एकमात्र जस्टिस एच.आर. खन्ना ने 1977 में जाकर अगले मुख्य न्यायाधीश के चुनाव में खुद अपने वरिष्ठताक्रम को लांघे जाने के चलते त्यागपत्र दे दिया था. विरोध जाहिर करते हुए त्यागपत्र देने वाले इन सभी न्यायाधीशों को आज ऐसा ‘हीरो’ माना जाता है जिन्होंने सत्ता के सामने घुटने टेकने के बजाय संविधान की रक्षा करना श्रेय समझा था. आज जिन चार न्यायाधीशों ने जनता को अघोषित आपातकाल के खिलाफ सतर्क किया है, उनको भी वही सम्मान और वही सराहना मिलनी चाहिये जो उनके पूर्ववर्ती त्यागपत्र देने वालों को मिली है.

मोदी सरकार के पैरवीकार कहते हैं कि इन चार न्यायाधीशों द्वारा उठाये गये मुद्दे ‘अंदरूनी मामला’ और ‘पारिवारिक झगड़ा’ हैं जिनको सार्वजनिक रूप से जाहिर नहीं किया जाना चाहिये था और चाय के प्याले पर आपस में सुलझा लिया जा सकता था. लेकिन इससे बड़ा झूठ और कुछ नहीं हो सकता. अगर सरकार और शासक पार्टी अदालतों में अपने पक्ष में झुकने वाली न्यायिक बेंच गठित करने में समर्थ हैं, जो उनके खिलाफ फैसला नहीं देंगी, तो यह लोकतंत्र के लिये स्पष्ट रूप से खतरा है – और इस खतरे के बारे में जानना हर नागरिक का अधिकार है. कार्यसूची तय करने का अधिकारी होने के नाते भारत के मुख्य न्यायाधीश को अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करते समय पारदर्शी रीति-नीति और नियमों का पालन करना होगा.

खबर है कि न्यायाधीशों को यह ऐतिहासिक प्रेस कान्फ्रेन्स बुलाने की जरूरत अंततः तब महसूस हुई जब जस्टिस लोया की संदेहास्पद मौत से सम्बंधित याचिका आई. जस्टिस लोया की मौत से जुड़े सवालों के चलते एक बार फिर बेंच फिक्सिंग (सरकार के पक्ष में फैसला देने वाली बेंच का गठन) की सम्भावना उभरकर आई. सर्वोच्च न्यायालय ने आदेश दिया था कि सोहराबुद्दीन हत्याकांड की सुनवाई गुजरात में नहीं बल्कि महाराष्ट्र में की जाय, और उसकी सुनवाई शुरूआत से लेकर अंत तक एक ही न्यायाधीश द्वारा हो. मगर इस मामले की सुनवाई कर रहे जस्टिस जे.टी. उत्पट का अचानक सीबीआई न्यायालय में स्थानांतरण कर दिया गया. क्या उनका स्थानांतरण बेंच फिक्सिंग के लिये किया गया था? उनकी जगह जस्टिस लोया आये, और उनकी बहन के अनुसार बाम्बे हाइकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने उनको घूस की पेशकश करते हुए कहा था कि वे भाजपा के अध्यक्ष अमित शाह के पक्ष में फैसला दे दें. क्या घूस लेने से इन्कार करने के बाद जल्द ही हुई उनकी संदेहास्पद मौत भी बेंच फिक्सिंग की एक कपट चाल थी – यानी, इस मौत के जरिये एक ऐसे न्यायाधीश का रास्ता साफ करना था जिससे शासक पार्टी के नेता के पक्ष में फैसला सुनाने की ज्यादा उम्मीद की जा रही थी? तो फिर ऐसे संवेदनशील मुकदमे को भारत के मुख्य न्यायाधीश ने एक जूनियर न्यायाधीश के हवाले क्यों कर दिया, जिनका भाजपा सरकार का पक्ष लेना मशहूर है? यह तथ्य स्वागतयोग्य है कि अंततः मुख्य न्यायाधीश को उस जूनियर न्यायाधीश की अदालत से जस्टिस लोया के मुकदमे को वापस लेना ही पड़ा; और अब उम्मीद की जाती है कि इस मुकदमे को किसी अधिक विश्वसनीय बेंच के सुपुर्द किया जायेगा. लोया के छोटे पुत्र द्वारा बुलाई गई प्रेस कान्फ्रेन्स, जिसमें उन्होंने मीडिया और सामाजिक कार्यकर्ताओं से कहा कि वे लोया परिवार को अकेला छोड़ दें, यह गंभीर सवाल खड़ा करती है कि लोया परिवार पर उन सवालों के बारे में चुप्पी साधने के लिये किसने दबाव डाला, जिन सवालों को सबसे पहले लोया की सगी बहन और पिता ने उठाया था. इसके अलावा, सच्चाई यह है कि अगर किसी अपराध का संदेह हो तो यह अपराध समाज के खिलाफ होता है – किसी कथित पीड़ित के परिवार को यह तय करने का अधिकार नहीं होता कि इस अपराध की तफ्तीश की जाये या नहीं.

तथ्य दिखलाते हैं कि भारत के मुख्य न्यायाधीश को केवल लोया के मुकदमे को सौंपने के मामले में ही जवाब नहीं देना है. मेडिकल काॅलेज घूस कांड में आरोपी व्यक्तियों के जो फोन रिकाॅर्ड सीबीआई द्वारा टैप किये गये, उसकी प्रतिलिपि में इलाहाबाद और दिल्ली के कई न्यायाधीशों को घूस की पेशकश का हवाला है. खुद मुख्य न्यायाधीश ने सर्वोच्च न्यायालय की उन तमाम बेंचों की अध्यक्षता की थी जिन्होंने प्रसाद एजूकेशन ट्रस्ट द्वारा चलाये जा रहे ग्लोकल मेडिकल काॅलेज और सुपर स्पेशलिटी अस्पताल एवं शोध संस्थान के पक्ष में फैसला सुनाया है. मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता में पांच न्यायाधीशों की एक बेंच ने न सिर्फ उस याचिका को खारिज कर दिया जिसमें मांग की गई थी कि वे खुद को इस घोटाले से जुड़े मुकदमों की सुनवाई से अलग रखें, बल्कि इस बेंच ने जस्टिस जे. चेलामेश्वर और जस्टिस एस. अब्दुल नजीर के इस फैसले को भी खारिज कर दिया कि मेडिकल काॅलेज घूसखोरी कांड से जुड़े न्यायिक भ्रष्टाचार से सम्बंधित एक याचिका की सुनवाई पांच वरिष्ठतम न्यायाधीशों की संविधान बेंच करे. भारत के मुख्य न्यायाधीश ने सीबीआई को इलाहाबाद हाइकोर्ट के जस्टिस नारायण शुक्ला के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की इजाजत भी नहीं दी, जबकि सीबीआई के पास काफी सबूत थे जो इस तथ्य की ओर इशारा करते थे कि उक्त न्यायाधीश ने मेडिकल काॅलेज से घूस ली है.

कई अन्य महत्वपूर्ण मुद्दे – जो भारत की जनता के मौलिक अधिकारों से सम्बंधित हैं और शासक पार्टी के राजनीतिक भाग्य के लिये भी अत्यधिक रुचि और महत्व के हैं – सर्वोच्च न्यायालय के यहां लम्बित हैं, जिनमें आधार का मामला और अयोध्या सम्बंधी मुकदमा भी शामिल हैं. यह सर्वाधिक महत्वपूर्ण है कि चार वरिष्ठतम न्यायाधीशों द्वारा जाहिर की गई चिंताओं का समाधान हो, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि न्यायिक प्रक्रिया पारदर्शी, पक्षपातहीन और न्यायपूर्ण हो और दिखाई भी पड़े.
अभी तक भारत के मुख्य न्यायाधीश की ओर से देश को यह यकीन दिलाने के लिये कोई कदम नहीं उठाया गया है, न इस बात का इशारा दिया गया है कि उनके वरिष्ठ सहकर्मियों ने जो चिंताएं जाहिर की हैं उनका समाधान किया जा रहा है. वास्तविक तथ्य यह है कि जिन चार न्यायाधीशों ने असहमति जाहिर की है उन्हें भारत के मुख्य न्यायाधीश द्वारा उस संविधान बेंच से बाहर कर दिया गया है जिसको आधार का मामला समेत कई लम्बित मुकदमों का निपटारा करना है. जस्टिस लोया की मौत से सम्बंधित सवाल भी बाकी रह गये हैं. यह अनिवार्यतः आवश्यक है कि जस्टिस लोया की मौत की निष्पक्ष जांच का आदेश दिया जाये, और साथ ही सर्वोच्च न्यायालय की कार्यसूची के निर्धारण में पारदर्शी रीति-नीति अपनाई जाय. ये सवाल केवल भारत के मुख्य न्यायाधीश से सम्बंधित नहीं हैं – सवाल मोदी सरकार के इरादों और कार्यवाहियों के बारे में हैं. यह जाहिर बात है कि भारत के हर संस्थान में – विश्वविद्यालय, अदालतें, जांच एजेन्सियां, भारतीय रिजर्व बैंक, चुनाव आयोग, मीडिया में – दो पक्षों के बीच संघर्ष चल रहा है: एक ओर वे हैं जो संविधान को बुलंद कर रहे हैं और दूसरी ओर वे जो मोदी सरकार के हित में संविधान में तोड़-फोड़ कर रहे हैं. भारत की जनता को असहमति जाहिर करने वाले चार न्यायाधीशों के पक्ष में डटकर खड़ा होना होगा और साथ ही उन तमाम लोगों के साथ खड़ा होना होगा जो हर क्षेत्र में संवैधानिक और लोकतांत्रिक रीति-नीति की रक्षा कर रहे हैं.

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