ट्रम्प द्वारा येरुशलम को इजरायल की राजधानी घोषित करने की भर्त्सना करें : भाकपा-माले

अमरीकी राष्ट्रपति ट्रम्प की यह घोषणा कि उनका प्रशासन येरुशलम को इजरायल की राजधानी के बतौर स्वीकार करता है, और उसने अपने दूतावास को तेल अवीव से येरुशलम ले जाने की योजना बनाई है, वास्तव में इजरायल द्वारा फिलस्तीन पर अवैध कब्जे को वैधता प्रदान करने की कोशिश है. इस फैसले की सारी दुनिया ने सही तौर पर तीखी निंदा की है, जिसमें संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के कई सदस्य देश भी शामिल हैं, जिन्होंने सुरक्षा परिषद की आपातकालीन बैठक में इस फैसले की भत्र्सना की है.

इस घोषणा ने अमरीका के चेहरे पर ओढ़ी हुई फिलस्तीन और इजरायल के बीच ‘निष्पक्ष मध्यस्थ’ की नकाब उतार दी है, और इस सच्चाई का पर्दाफाश कर दिया है कि अमरीका कभी भी ‘दो राज्यों की शक्ल में समाधान’ अथवा किसी ‘शांति प्रक्रिया’ का इच्छुक नहीं था बल्कि हमेशा उसने फिलस्तीनी जनता के प्रति इजरायल की नौबस्ती-उपनिवेशवाद (फिलस्तीनी इलाकों में इजरायलियों को बसाने और वहां कब्जा जमा लेने) और रंगभेद की नीतियों पर अमल में मदद की है और उसे प्रोत्साहित किया है.
राष्ट्रपति ट्रम्प की यह घोषणा अंतर्राष्ट्रीय कानून के तहत निहायत गैर-कानूनी है. संयुक्त राष्ट्रसंघ की सुरक्षा परिषद के 1947 के एक प्रस्ताव में येरुशलम को अंतर्राष्ट्रीय क्षेत्र के रूप में मान्यता दी गई थी जिसको एक विशेष दर्जा प्राप्त है. इजरायल ने इस प्रस्ताव का उल्लंघन करते हुए 1948 में हुए नकबा (प्रलयंकारी विध्वंस), जिसमें यहूदीवादी मिलिशिया ने कोई 7 लाख फिलस्तीनियों को फिलस्तीन से जबर्दस्ती निकाल बाहर किया था, के बाद हुए अरब-इजरायल युद्ध के दौरान इजरायल ने पश्चिमी येरुशलम पर कब्जा जमा लिया. 1967 में इजरायल ने छह दिनों तक चले युद्ध के बाद पूर्वी येरुशलम पर भी कब्जा जमा लिया. 1980 में इजरायल ने एक कानून पारित किया जिसमें इजरायल की राजधानी के बतौर ‘सम्पूर्ण एवं एकीकृत येरुशलम’ की घोषणा की गई थी, और उसने येरुशलम में इजरायली आबादी को बसाने की प्रक्रिया तेज कर दी. 1980 में पारित संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के एक प्रस्ताव में इजरायल की कार्यवाहियों को यह कहते हुए अवैध घोषित किया गया कि ‘जिन कदमों से येरुशलम के पवित्र शहर का भौगोलिक, आबादी-सम्बंधी और ऐतिहासिक चरित्र तथा उसका दर्जा बदल दिया गया है, उन्हें निरस्त घोषित किया जाता है और वे युद्ध-काल में नागरिकों की सुरक्षा सम्बंधी चतुर्थ जिनेवा कन्वेंशन का खुल्लमखुल्ला उल्लंघन हैं, और साथ ही ये कदम मध्य-पूर्व में सर्वव्यापी, न्यायपूर्ण और स्थायी शांति कायम करने की राह में गंभीर बाधा बन गये हैं.’

अब कई दशकों से इजरायल ने फिलस्तीनियों को येरुशलम में राज्यहीन व्यक्तियों में तब्दील कर दिया है, जिनको ‘रेजिडेन्सी परमिट’ जारी किये गये हैं, जिनको इजरायली राज्य कभी भी अपनी मर्जी से निरस्त कर सकता है और करता भी है, और इजरायली बस्तियां बसाने के लिये फिलस्तीनी घरों को उजाड़ देता है. ट्रम्प की घोषणा इस किस्म के परिमिटों को निरस्त किये जाने तथा इजरायली बस्तियां बसाने के कदम को आगे बढ़कर वैधता प्रदान करेगी – जो अंतर्राष्ट्रीय कानून के तहत युद्ध-अपराध हैं. जैरेड कुशनर, जो ट्रम्प का दामाद होने के साथ-साथ उनका सलाहकार भी है, एक ऐसी संस्था का सह-निर्देशक है जो इन अवैध ढंग से बसाई गई इजरायली बस्तियों को आर्थिक सहायता मुहैया करती है.

ट्रम्प की घोषणा से पहले कुशनर ने सार्वजनिक रूप से वादा किया था कि ट्रम्प प्रशासन सऊदी अरब के उत्तराधिकारी शहजादे सलमान के सहयोग से इजरायल और फिलस्तीन के बीच एक ‘शांति-समझौते’ में मध्यस्थता कर रहा है. फिलस्तीनी नेताओं ने इसी बीच जाहिर कर दिया है कि प्रस्तावित ‘समझौता’ इजरायली कब्जे को वैध ठहराने का ही एक प्रयास है: जिसका मकसद है फिलस्तीन को संप्रभु राज्य का दर्जा देने और परस्पर-संलग्न फिलस्तीनी क्षेत्र पर कायम उसके नियंत्रण को मान्यता देने से इन्कार करना, इसके बजाय फिलस्तीनी आबादी को वापस ‘बंतुस्तानों’ – रंगभेद की नीति पर आधारित इजरायली क्षेत्रों से घिरे फिलस्तीनी आबादी के क्षेत्रों – में बदल देना, और फिलस्तीन के पूर्वी येरुशलम को अपनी राजधानी बनाने के अधिकार से इन्कार करना. ट्रम्प की घोषणा इस ‘शांति प्रक्रिया’ में खलल होने के बजाय इस किस्म के प्रस्तावों के साथ पूर्णतः मेल खाती है, जो फिलस्तीनी जनता के लिये किसी भी किस्म के न्याय और सम्मान की अवहेलना है.

दुनिया की अधिकांश सरकारों ने येरुशलम को इजरायल द्वारा अवैध रूप से कब्जा किये गये क्षेत्र के सिवाय और कुछ मानने से इन्कार कर दिया है, और ट्रम्प की घोषणा ने उनको वैश्विक स्तर पर अलगाव में डाल दिया है. इस पृष्ठभूमि में भारत सरकार द्वारा येरुशलम को इजरायल की राजधानी मानने की ट्रम्प की घोषणा की भत्र्सना करने से इन्कार किया जाना मोदी सरकार के अमरीकी प्रशासन की गुलामी करने का सबूत है. इस घोषणा की भर्त्सना करने से कतराकर मोदी सरकार भारत की विदेश नीति को अमरीकी हितों के हुक्म का गुलाम बनने दे रही है. मोदी सरकार और भाजपा एवं आरएसएस भारत को एक फासीवादी हिंदू राष्ट्र में तब्दील करने के अपने लक्ष्य में यहूदीवादी इजरायल को एक अनुकरणीय माॅडल मानते हैं. मगर यह तथ्य कि ऐसी सरकार भी येरुशलम को इजरायल की राजधानी बनाने का खुला समर्थन नहीं दे पा रही है (इसके बजाय सरकार ने बस कोई सीधी टिप्पणी करने से बच निकलने की कोशिश की है और फिलस्तीन के प्रति भारत की ‘स्वतंत्र एवं सुसंगत’ स्थिति से प्रतिबद्धता को दुहराया है). इस सच्चाई को प्रकट कर देता है कि उसको फिलस्तीन पर इजरायली कब्जे का समर्थन करने लायक भारत की जनता का जनादेश नहीं हासिल है!
ट्रम्प की घोषणा के बाद इजरायली कब्जे में पड़े वेस्ट बैंक, कब्जे में पड़े पूर्वी येरुशलम और गाजा पट्टी में फिलस्तीनियों ने ‘विक्षोभ दिवस’ मनाते हुए भारी प्रतिवाद कार्यक्रम आयोजित किये हैं. इसी बीच इजरायल ने हमास के अड्डों को निशाना बनाने के नाम पर गाजा पट्टी पर बमबारी की है, जिसमें दो लोग मारे गये हैं और 25 फिलस्तीनी नागरिक घायल हुए हैं जिनमें छह बच्चे हैं, जिनमें एक छह महीने का बच्चा है.

फिलस्तीन और भारत की जनता का उपनिवेशवाद-विरोधी प्रतिरोध संघर्ष और आपसी एकजुटता का एक लम्बा साझा इतिहास है. वर्ष 2017 कुख्यात ‘बैलफोर घोषणा’ का शताब्दी वर्ष है, जिस घोषणा के जरिये ब्रिटिश उपनिवेशवादियों ने फिलस्तीन को ‘यहूदियों का राष्ट्रीय वासस्थान’ बनाने का वादा किया था. औपनिवेशिक शक्ति के बतौर ब्रिटेन को कोई वैध या नैतिक अधिकार नहीं था कि वह फिलस्तीन यहूदियों को सौंप दे. इसी खुल्लमखुल्ला औपनिवेशिक घोषणा के परिणामस्वरूप अंततः इजरायल की स्थापना हुई. भाकपा (माले) की केन्द्रीय कमेटी भारत की जनता का आह्नान करती है कि वे इजरायली कब्जे के खिलाफ फिलस्तीनी प्रतिरोध के पक्ष और एकजुटता में उठ खड़े हों और भारत सरकार से मांग करें कि वह ट्रम्प प्रशासन की येरुशलम को इजरायल की राजधानी मानने की घोषणा का प्रतिवाद करे.

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