संविधान दिवस 2017 : आजादी, बराबरी और भाईचारे की स्वप्नदृष्टि की रक्षा करो!

26 नवम्बर 1949 को भारत का संविधान गृहीत होने के बाद से अड़सठ वर्ष बीत चुके हैं. हालांकि संविधान का गृहीत होना स्वाभाविक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण घटना थी, मगर आज जो बात खास तौर पर महत्वपूर्ण और प्रासंगिक महसूस होती है, वह है संविधान गृहीत होने से ठीक एक दिन पहले संविधान सभा के अंतिम सत्र में दिया गया डा. अम्बेडकर का भाषण. संविधान का मसविदा तैयार करने वाली कमेटी के अध्यक्ष के रूप में, उन लोगों ने जो कुछ हासिल किया था, अम्बेडकर ने महज उसका यशोगान नहीं किया, बल्कि अपने भाषण में उन्होंने संविधान की, और इसी कारण उस संविधान के आधार पर निर्मित होने वाले लोकतांत्रिक गणराज्य की, कमजोरियों को भी चिन्हित किया.

आज उस संविधान की कमजोरियां हमारे जमाने की मनहूस सच्चाई बन चुकी हैं. संविधान में मौजूद नियंत्रण और संतुलनकारी प्रावधान, शक्तियों का विभाजन, संस्थागत ईमानदारी, संसदीय रीति-नीति एवं प्रक्रियाएं, जिन्हें संसदीय लोकतंत्र के सुचारु रूप से चलने के लिये केन्द्रीय तत्व माना जाता है, आज सारे के सारे दांव पर लगे हैं. जबकि एक निरंकुश तानाशाह सरकार संविधान को पैरों तले कुचल रही है, वहीं सत्ता पर फासीवादी कब्जा हो जाने का खतरा गणराज्य के सामने मंडराने लगा है.

संविधान में वर्णित विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच शक्तियों के बारीक मगर सुपरिभाषित विभाजन को आज सुनियोजित ढंग से धुंए की दीवार से ढका जा रहा है और उसका उल्लंघन किया जा रहा है. सरकार ने ढेर सारे मनमाने कदम उठाने के लिये विधायी प्रावधानों का मखौल उड़ाते हुए ठेंगा दिखा दिया है, जिनमें सबसे विवादास्पद बात है आधार विधेयक को लोकसभा में वित्तीय विधेयक के रूप में पारित कराया जाना. सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय सुनाया था कि आधार कोई अनिवार्य दस्तावेज नहीं बल्कि स्वैच्छिक है, मगर जब कार्यपालिका सर्वोच्च न्यायालय के इस आदेश की घोर अवमानना करती जा रही है, तो न्यायपालिका सरकार को कठघरे में खड़ा करने के बजाय, तमाम मुद्दों को सुलझाये बिना ही, कार्यपालिका को अपनी मनमानी लागू करने की खुली छूट दिये जा रही है.

नोटबंदी और राफेल डील मंत्रिमंडलीय प्रणाली के सबसे बड़े उल्लंघन के दो विस्फोटक उदाहरण हैं, जिनमें प्रधानमंत्री ने कैबिनेट को ताक पर रखते हुए एकतरफा तौर पर सुदूर-प्रसारी परिणाम वाले फैसलों का खुद ऐलान कर दिया. नोटबंदी का एक साल बीत जाने के बावजूद देश अभी तक उसकी भारी आर्थिक और सामाजिक कीमत चुका रहा है, जबकि सरकार नोटबंदी के तथाकथित कल्पित फायदे गिनाने के लिये झूठ पर झूठ बोले जा रही है. कोई तीन दशक पहले 64 करोड़ रुपये के बोफोर्स घोटाले ने कांग्रेस के पतन को हरी झंडी दिखाई थी, मगर आज मोदी सरकार चरम घोटाले भरे राफेल सौदे का बचाव कर रही है, जिसका करार करने में नरेन्द्र मोदी ने सारी संस्थागत प्रणालियों को ताक पर रख दिया और रहस्यमय ढंग से फ्रांसीसी कम्पनी दसाउ के साथ किये गये सौदे की पूर्व की शर्तों को खारिज करके उसकी जगह अपनी सरकार द्वारा उसी कम्पनी से 36 लड़ाकू विमान खरीदने का नया सौदा तय कर लिया, जिसमें उन्होंने सार्वजनिक क्षेत्र की अनुभवी इकाई हिंदुस्तान एयरोनाॅटिक्स लिमिटेड की जगह पर अनिल अम्बानी की ग्रीनहाॅर्न रिलायंस डिफेन्स को संयुक्त उद्यम (ज्वायंट वेंचर) में साझीदार बना लिया है.

जहां सरकार और खास तौर पर प्रधानमंत्री सारी शक्तियों को एक छोटे से गुट के हाथों केन्द्रित करते जा रहे हैं, वहीं नागरिकों के अधिकारों और आजादियों में सुनियोजित ढंग से कटौती की जा रही है और उनका लोप किया जा रहा है. अत्याचारी कानून आफ्स्पा (सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून) को न्यायिक व्यवस्था के परे जोर-जबर्दस्ती और हिंसा करने की ढाल के बतौर इस्तेमाल किया जा रहा है, इसके अलावा केन्द्र सरकार एवं विभिन्न भाजपा-शासित राज्य सरकारें नियमित रूप से सामाजिक कार्यकर्ताओं को जेल भेजने के लिये राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (एनएसए) का इस्तेमाल कर रही हैं (मसलन असम में किसान नेता अखिल गोगोइ और उत्तर प्रदेश में दलित नेता चन्द्रशेखर आजाद आजकल एनएसए के तहत जेल में कैद हैं). फिर ये सरकारें असहमति का दमन करने के लिये कुख्यात राजद्रोह कानून का भी सहारा ले रही हैं (जेएनयू के छात्र नेताओं को राजद्रोह के आरोप में जेल भेजा गया था). खोजपूर्ण पत्रकारिता का दमन करने के लिये पत्रकारों को डराने-धमकाने तथा उन्हें हैरान-परेशान करने के लिये औपनिवेशिक जमाने के एक और कानून – मानहानि का मुकदमा ठोकने – का भी इस्तेमाल किया जा रहा है. चाहे अडानी द्वारा प्रतिष्ठित इकनाॅमिक एंड पाॅलिटिकल वीकली को धमकी देने का सवाल हो या जय अमित शाह के पक्ष में पूरी सरकार के खड़े हो जाने तथा अग्रगण्य डिजिटल मैगजीन ‘द वायर’ को डराने-धमकाने की कोशिश हो – मानहानि का मुकदमा जोर-जबर्दस्ती धमकाने का भरोसेमंद औजार साबित हो रहा है.

संविधान एवं लोकतंत्र की संस्थागत आत्मा एवं ढांचे में क्रमशः अधिक से अधिक तोड़फोड़ मचाने के साथ साथ हम कानून के शासन पर भी खुला हमला देख रहे हैं. खुद राज्य और पतित राजनीतिक माहौल के द्वारा प्रोत्साहित किये जाने के फलस्वरूप गौरक्षकों का आतंकवाद लगातार जारी है. ठीक जैसे पहलू खान की घटना को दुहराया जा रहा हो, इस तरह हमने उसी राजस्थान राज्य में गौरक्षक आतंकवादियों द्वारा एक और हत्या – उमर मोहम्मद की हत्या देखी. दिल्ली के निकट भीड़ भरे रेलगाड़ी के डब्बे के अंदर नौजवान जुनैद की चाकू घोंप-घोंप कर की गई हत्या यह दिखलाती है कि हत्यारे गिरोह को हत्या के लिये तथाकथित गौ-हत्या या फिर गोमांस खाने के आरोप की भी जरूरत नहीं पड़ती.
भीड़-गिरोहबंदी द्वारा इस प्रकार दिन-दहाड़े की गई हत्याएं एवं असहमति जाहिर करने वाले लेखकों एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं को निशाना बनाकर की गई हत्याएं, नफरत और भय के एक ऐसे माहौल में हो रही हैं जिसको शासक संघ-भाजपा प्रतिष्ठान के मंत्रियों एवं नेताओं का खुलेआम संरक्षण हासिल है. किसी फिल्म के निर्देशक और प्रमुख अभिनेत्री का सिर काटकर लाने पर ईनाम की खुलेआम घोषणा की जाती है और इस पर किसी किस्म की प्रशासनिक या न्यायिक व्यवस्था द्वारा हस्तक्षेप नहीं किया जाता है. लेकिन दूसरी ओर यकीनन, राष्ट्रीय जांच एजेन्सी (एनआईए) और किसी राज्य की सबसे ऊंची अदालत (हाईकोर्ट) तक अंतर्धामिक विवाह बंधन को खारिज करने दौड़ पड़ते हैं, और यहां तक कि देश का सर्वोच्च न्यायालय भी हदिया द्वारा अपना धर्म और अपने जीवन-साथी को चुनने की आजादी के तर्कपूर्ण निवेदन की असंदिग्ध शब्दों में पुष्टि नहीं करता, और इसके बजाय उससे अपने माता-पिता के संरक्षकत्व में किसी हाॅस्टल में रहने का निर्देश देता है! न्यायपालिका की सर्वोच्च पीठों द्वारा इस प्रकार शर्मनाक ढंग से चुप्पी बरतना और ढुलमुल रवैया अपनाना ही भारत में संवैधानिक गणतांत्रिक व्यवस्था की उन कमजोरियों को बढ़ाने में मददगार हो रहा है, जिन कमजोरियों के बारे में डा. अम्बेडकर ने अपनी दुश्चिंता को संविधान ग्रहण करने के ठीक पहले इतनी महान भविष्यदृष्टि से अभिव्यक्त कर दिया था.

जहां भारत में लोकतंत्र के इन महत्वपूर्ण पहरेदारों और स्तम्भों की भूमिका चिंतनीय रूप से निष्क्रिय और आत्मसमर्पणकारी बनी हुई है, वहीं विडम्बना है कि पड़ोसी देश पाकिस्तान में, जिसे संसदीय लोकतंत्र का दुर्ग तो कत्तई नहीं कहा जा सकता, वही संस्थाएं अपेक्षाकृत कहीं बहुत ऊंचे दर्जे का साहस और सक्रियता प्रदर्शित कर रही हैं. पनामा और पैरेडाइज पेपर्स पर भारत में षड्यंत्रमूलक ढंग से चुप्पी बरती जा रही है, बावजूद इसके कि इन पेपर्स में बड़ी तादाद में प्रमुख-प्रसिद्ध और शक्तिशाली हस्तियों के नाम दर्ज हैं, मगर वहीं पाकिस्तान में किसी छोटे-मोटे अधिकारी को नहीं, यहां तक कि प्रधानमंत्री को भी गद्दी से निकाल बाहर किया गया है!

इस चिंताजनक माहौल में आशा की एकमात्र किरण जनता के लगातार डटकर चलाये जा रहे संघर्षों से मिल रही है. नवम्बर में दिल्ली में देश भर से आये मजदूरों एवं किसानों की कई विशाल-विशाल जन-संसदों का आयोजन किया गया. सामान्य स्थिति में नवम्बर महीने में ही संसद अपना शीतकालीन सत्र आरम्भ करती है. ट्रेड यूनियनों और किसान संगठनों ने नवम्बर के महीने में अपने केन्द्रीय कार्यक्रमों का आह्नान इसी आशा में किया था कि संसद उनकी मांगों के प्रति थोड़ी संवेदनशीलता दिखलायेगी. मगर इस बार दिल्ली में हम सिर्फ जन-संसदों का ही नजारा देख सके क्योंकि भाजपा ने गुजरात के महत्वपूर्ण चुनाव से पहले किसी भी किस्म के संसदीय सवाल-जवाब का सामना करने या जवाबदेही दिखलाने से कन्नी काटना ही बेहतर समझा. जब सत्ताधारी शक्तियां संसदीय संस्थाओं से कतराकर बच निकल रही हैं और उनको क्षतिग्रस्त कर रही हैं, तो आइये, हम जनता की दावेदारी को हर सम्भव तरीके से और भी ऊंची मंजिल पर ले जायें. किसी संप्रभुता सम्पन्न, लोकतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष, समाजवादी गणतंत्र में आजादी, बराबरी और भाईचारे की संवैधानिक स्वप्नदृष्टि को शासकों के तानाशाही-भरे मंसूबों के रहमो-करम पर नहीं छोड़ा जा सकता.

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